न जाने किस 'ख़ास' दिन के इंतज़ार में,
हम ज़िंदगी की सबसे अच्छी चीज़ें,
बस बचा कर रख लेते हैं।
अलमारी के सबसे अंधेरे कोने में टंगी,
वो एक नई और महँगी सी शर्ट,
महीनों दबी रह जाती है इस आस में...
कि जब कोई बेहद खास मौका आएगा, तब इसे पहनेंगे।
बंद अलमारियों में सजे,
वो काँच के बेहद खूबसूरत बर्तन,
तरस जाते हैं किसी के हाथों की गर्माहट को...
कि कोई खास मेहमान आएगा, तब इनमें चाय परोसी जाएगी।
हम सिर्फ चीज़ें ही नहीं बचाते,
हम बचा लेते हैं अपनी सबसे बेफिक्र हँसी,
कि जब सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी,
तब एक दिन जी भरकर हँसेंगे।
हम बचा लेते हैं अपने हिस्से का सुकून,
कि बस यह एक ज़िम्मेदारी और पूरी हो जाए,
फिर आराम से अपनी ज़िंदगी जिएंगे।
पर फिर एक दिन... अचानक से एहसास होता है,
कि वो खास शर्ट रखे-रखे पुरानी हो गई,
वो काँच के खूबसूरत बर्तन बिना इस्तेमाल हुए ही चटक गए,
और वो बेफिक्र हँसी...
तयशुदा मंज़िलों तक पहुँचते-पहुँचते, कहीं पीछे ही छूट गई।
हम भूल गए थे...
कि ज़िंदगी कोई लोहे की तिजोरी नहीं थी,
जिसमें पलों को और खुशियों को,
कल के लिए सहेज कर रखा जाता।
ज़िंदगी तो एक बहती हुई नदी थी,
जिसे बस अंजुली में भरकर, उसी वक़्त पी लेना था।
यह 'खास दिन' का इंतज़ार,
ज़िंदगी का सबसे थका देने वाला सराब है।
क्योंकि जो आज है, और जो अभी है...
दरअस्ल बस वही हमारा है।
सार्थक कायस्थ
