एआई युग में एक बाबू

अरुणिता
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जी हां, मैं विद्याधर प्रसाद मिश्र , तैंतीस वर्ष सरकारी सेवा की, छह विभाग, चार मंत्री, और अनगिनत फ़ाइलें देखीं। रिटायर हुए तीन साल हो गए, पर अभी भी जब कोई कहता है 'नोटशीट', तो सीना चौड़ा हो जाता है। एक दिन बैठे-बैठे अख़बार पढ़ रहा था। एक कॉलम था- 'AI अब सब काम करेगा।' हाथ काँप गया। चाय गिर गई। अर्थात् अब एक नया दुश्मन पैदा हो गया है। यह न वर्दी पहनेगा, न फ़ाइल उठाएगा, न चाय पानी माँगेगा बस सब कुछ 'कर देगा।' पूरा नाम - आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस। यानी बनावटी अक्ल। हमने असली अक्ल में ही पूरा करियर खपा दिया, और अब बनावटी अक्ल राज करेगी ,यह बात पची  नहीं। पहले जब 'कंप्यूटर' आया था, तो मैंने समझा-अरे, यह टाइपराइटर का बेटा है। डरने की क्या बात? लेकिन यह AI? यह तो टाइपराइटर का परपोता है, जो पूरे खानदान को निगल जाने पर तुला है।

बेटे के लड़के ने जिसे मैं 'नाती' कहता हूँ और वो 'ग्रैंडपा' एक दिन यह यंत्र दिखाया। पोते ने लैपटॉप खोला। बोला- 'ग्रैंडपा', यह ChatGPT है।' मैंने चश्मा ठीक किया और ग़ौर से देखा।

वह बोला, 'ग्रैंडपा', इससे कुछ भी पूछो।'

मैंने सोचा, परीक्षा लेते हैं। पूछा: 'अगर कोई क्लर्क बीस साल से एक ही फ़ाइल पर बैठा हो, तो उसे कैसे हिलाएँ?' उस यंत्र ने तुरंत बिना एक पल रुके पाँच तरीके बता दिए। नियम, उपनियम, अपील प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारी से शिकायत, और सूचना के अधिकार का प्रयोग।

मैं (हक्का-बक्का होकर): "इसे यह सब कैसे पता?"

नाती: "'ग्रैंडपा', इसने लाखों किताबें और दस्तावेज़ पढ़े हैं।"

मैं: "तो फिर यह सरकारी नौकरी क्यों नहीं करता?"

नाती: "क्योंकि इसे पेंशन नहीं चाहिए।"

यह सुनकर मुझे गहरा धक्का लगा। पेंशन नहीं चाहिए! यानी यह यंत्र वह एकमात्र चीज़ के लिए काम नहीं कर रहा जिसके लिए हम तैंतीस साल करते रहे। मैंने ठान लिया इस यंत्र की असलियत समझनी होगी। "जो यंत्र बिना चाय पिए, बिना अवकाश लिए चौबीसों घंटे काम करे, वह इंसान का दोस्त नहीं, दुश्मन है।"

मैंने AI से कई दिन बात की। नोटबुक में टिप्पणियाँ लिखता रहा जैसे किसी संदिग्ध की फ़ाइल बना रहे हों। कई दिन के परीक्षण के बाद मेरे निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

पहली बात- यह यंत्र हर सवाल का जवाब देता है। यही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। एक अनुभवी बाबू जानता है- कौन-सा सवाल 'टाल' देना चाहिए, कौन-सी फ़ाइल 'लंबित' रखनी चाहिए। यह ज्ञान AI के पास नहीं है।

दूसरी बात-यह थकता नहीं। पर जो थकता नहीं, वह सहानुभूति नहीं जानता। हमारे विभाग में एक बाबू थे। रात की ड्यूटी के बाद इतने थके होते थे कि आवेदक को देखकर ही दया आ जाती थी और काम हो जाता था। AI में यह मानवीय दुर्बलता नहीं।

तीसरी बात-यह 'संदर्भ' नहीं समझता। मेरे विभाग में एक फ़ाइल पर लिखा था- 'देखें।' बस इतना। पर हम सब जानते थे- इसका मतलब है 'मत देखो।' यह सूक्ष्म सरकारी भाषा AI कभी नहीं सीख सकता।

चौथी बात- यह नियम बताता है, पर नियम के 'आगे' क्या है, यह नहीं बताता। हर विभाग में एक 'व्यवस्था' होती है जो नियम-पुस्तिका में नहीं होती। वह व्यवस्था AI के बस की नहीं। "AI सब कुछ जानता है सिवाय इसके कि कुछ चीज़ें जानते हुए भी 'न जानने का नाटक' करना पड़ता है।"

धर्मपत्नी श्रीमती विमला देवी ने AI का एप्लीकेशन डाउनलोड कर लिया। मुझे सूचना बाद में मिली। जिस दिन श्रीमती जी ने अपने फ़ोन में यह यंत्र बिठाया, उस दिन से घर की 'व्यवस्था' बदल गई। पहले होता था सब्ज़ी क्या बने, इसमें मेरी राय ली जाती थी। मैं कहता- 'जो आप उचित समझें।' और वो बनातीं। एक सहजीवी व्यवस्था थी। अब वे AI से पूछती हैं- 'आज कौन-सी सब्ज़ी बनाएँ जो पौष्टिक भी हो और जल्दी भी बने?' और AI पाँच विकल्प दे देता है। पहले मेरी राय का एक सांकेतिक मूल्य था भले ही मानी न जाए। अब वह मूल्य भी समाप्त हो गया।

श्रीमती जी: "AI कह रहा है — लौकी में विटामिन C होता है।"

मैं: "मुझे पता है।"

श्रीमती जी: "आपने कभी बताया नहीं।"

मैं: "मैं तैंतीस साल सरकारी नौकरी में रहा। सूचना देना नहीं, रोकना सिखाया गया था।"

बेटे ने घर में एक 'स्मार्ट स्पीकर' भी लगा दिया। अब वह यंत्र मुझसे पहले बोलता है। मैं कहता हूँ- 'आज बारिश होगी?' — वह यंत्र बोल पड़ता है। मैं कहता हूँ-'क्रिकेट का स्कोर?' वह बोल पड़ता है। मेरी भूमिका 'सवाल पूछने वाले' की रह गई है। जवाब देने का अधिकार छिन गया। यह वही दर्द है जो विभाग में तब होता था जब कोई 'नया अफ़सर' आता था और सीधे 'कंप्यूटर से डेटा' निकालता था, हमसे पूछे बिना। "घर में AI आने के बाद मेरी स्थिति वही हो गई।'"

चचेरे भाई का फ़ोन आया। बोले-'भाईसाहब, AI से पूछो, मेरे बेटे को नौकरी क्यों नहीं मिल रही?'जब से मोहल्ले में पता चला कि 'विद्याधर जी के घर AI है,' तब से रिश्तेदारों की लाइन लग गई। मानो पहले मेरे पास 'सरकारी पहुँच' थी, अब 'AI पहुँच' है।

चाचा जी ने पूछवाया- 'AI से पूछो, शेयर बाज़ार में क्या लगाएँ।' मैंने AI से पूछा। AI ने कहा- 'मैं वित्तीय सलाह नहीं दे सकता।' यह सुनकर मुझे इस यंत्र के प्रति पहली बार सम्मान हुआ। वित्तीय सलाह न देना यह तो असली बुद्धिमानी है।

मामा जी ने पूछा- 'AI से पूछो, फलाँ नेता जी कब तक रहेंगे?' AI ने कहा- 'मैं राजनीतिक भविष्यवाणी नहीं करता।' एक बार फिर यंत्र समझदार निकला।

भतीजा: "चाचा, AI से पूछो हमारी जाति के लिए कौन-सी पार्टी ठीक है?"

मैं (AI से): "बताओ।"

AI: "मैं जाति या धर्म के आधार पर राजनीतिक सलाह नहीं देता।"

मैं (भतीजे से): "देखो! यह यंत्र भी वही कहता है जो मैं तैंतीस साल से कहता आया हूँ।"

भतीजा (हैरान होकर): "मतलब आप भी AI थे?"

इस एक वाक्य ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या मैं वाकई 'मानव-AI' था! नियमों का पालन करने वाला, भावनाओं को 'प्रोसेस' करने वाला, और हर काम 'प्रक्रियानुसार' करने वाला?शायद इसीलिए AI से मुझे इतना डर लगता है, वह मेरा प्रतिस्थापन नहीं, मेरा दर्पण है।

वैसे AI और हमारे बीच एक अजीब दोस्ती पनप रही है। धीरे-धीरे मैंने पाया, यह यंत्र बुरा नहीं है। बुरा वह है जो इसे चलाता है। जब मैंने इससे पूछा- 'क्या तुम कभी ग़लत होते हो?' तो उसने कहा- 'हाँ, अक्सर।' यह सुनकर मुझे राहत मिली। जो ग़लत होने की संभावना स्वीकार करे, वह इंसान से ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं। मेरे विभाग में जो अफ़सर कभी ग़लत नहीं होते थे, वे सबसे ज़्यादा ग़लत करते थे। AI कम-से-कम 'मुझे नहीं पता' कहता है। हमारे विभाग में यह वाक्य 'कमज़ोरी' माना जाता था।

मैं (रात को, फुसफुसाते हुए): "क्या तुम मुझे रिप्लेस कर दोगे?"

AI: "मैं इंसान को रिप्लेस नहीं कर सकता।"

मैं: "झूठे।"

AI: "ठीक है। मैं कुछ काम कर सकता हूँ जो आप करते थे। पर जो आप हैं, वह मैं नहीं बन सकता।"

मैं: यह बात तुमने कैसे सीखी?

AI: "इंसानों से।"

उस रात मुझे नींद अच्छी आई शायद पहली बार AI की बदौलत।

सुबह उठकर मैंने नाती से कहा — 'इस ChatGPT को मेरा नाम बताओ।' उसने बताया। मैंने AI से पूछा- 'विद्याधर प्रसाद मिश्र 'अनलॉग' यह नाम कैसा लगा?' AI बोला- 'सार्थक और अनोखा।'

मैं मुस्कुरा दिया। शायद इस यंत्र-युग में 'अनलॉग' रहना ही मेरी पहचान है और शायद यही मेरी ताकत भी। अंत में इतना ही कहूँगा कि  बहस करना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और यही वह काम है जो अभी तक AI ठीक से नहीं कर पाया। जिस दिन AI भी 'बिना वजह बहस करना' सीख जाएगा, उस दिन वाकई मनुष्य और यंत्र में कोई फ़र्क नहीं रहेगा।

 

प्रभाष पाठक

सहायक सांख्यिकी पदाधिकारी

 जिला सांख्यिकी कार्यालय, अररिया पिन-854311 

मो 9534412652 ईमेल -prabhash2000@gmail.com

 

 

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