प्रवीण पारीक 'अंशु' ग़ज़ल जो कभी बुझती नहीं वो प्यास होती जा रही है ज़िन्दगी अब तो यहाँ बनवास होती जा रही है जो कभी मजबूत थी , निरप… By - अरुणिता अप्रैल 06, 2026