प्रवीण पारीक 'अंशु'
दोहे

दोहे

इच्छाओं में भागता , यह मन बारंबार। मानो , पक्षी नापता , अंबर का विस्तार।।   कभी पड़ा सूखा यहाँ , कभी बाढ़ की मार …

ग़ज़ल

ग़ज़ल

जो कभी बुझती नहीं वो प्यास होती जा रही है   ज़िन्दगी अब तो यहाँ बनवास होती जा रही है     जो कभी मजबूत थी , निरप…

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