प्रवीण पारीक 'अंशु'
इच्छाओं में भागता , यह मन बारंबार। मानो , पक्षी नापता , अंबर का विस्तार।। कभी पड़ा सूखा यहाँ , कभी बाढ़ की मार …
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अरुणिता
जुलाई 10, 2026
प्रवीण पारीक 'अंशु'
जो कभी बुझती नहीं वो प्यास होती जा रही है ज़िन्दगी अब तो यहाँ बनवास होती जा रही है जो कभी मजबूत थी , निरप…
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अरुणिता
अप्रैल 06, 2026