वी0 पी0 दिलेन्द्र
अमलतास
ला कालेज की सीढियों पर बैठ मैं देख रहा खिलते अमलतास को भीषण गर्मी में खिल गया है पीताम्बर हो गया है आंखों क…
ला कालेज की सीढियों पर बैठ मैं देख रहा खिलते अमलतास को भीषण गर्मी में खिल गया है पीताम्बर हो गया है आंखों क…
तुम साथ साथ चली थी कोमल सी फैली रेत पर हवा ने उड़ाया था उत्तरीय मै दौड़ कर लपकने चल…
मेरी जिन्दगी रिश्तों का ठहरा हुआ जल स्पदंन रहित उदास सी तुम आजाओ बरस जाओ प्रेम बूंदो से तरंगि…
क्या हो गया है आदमी को वो बैचेन क्यों है ? क्या कहीं कुछ दिखने लगा है क्या कुछ और बिकने लगा है वो…
रास्तों से भटक कर मैं खो गया भीड़ में टटोलने लगा मन कहाँ आ गया हूँ मैं बोझ से लगने लगे टूटते से ताने बाने …