आसमा को छूते विशाल वृक्ष साल में एक बार
प्रकृति से पाते हैं नव सृजन का उपहार।
झाड़ देते हैं अपने सड़े- गले मुरझाते पत्ते बड़ी लगन से कुछ समय के लिए वे हो जाते हैं नगन से।
यही है वो प्रतीक्षा काल थोड़ी पीड़ा ,थोड़ा विराम
कुछ दिनों बाद वही सूखे वृक्ष हरियाली का ओढ़ लेंगे परिधान।
यही सिलसिला उसे साल दर साल देता है ऊंचा आकार
पर दूसरी तरफ है मानव, जिसमें कूट-कूट कर भरा अहंकार।
वह प्रकृति के इस शाश्वत नियम को नहीं मानता
वह वृद्ध होने पर भी नए के लिए जगह छोड़नी नहीं जानता।
यहीं से शुरू होता है दो पीढ़ियों में टकराव अपने-अपने अस्तित्व को लेकर भीतर पनपता मनमुटाव।
सभी को एक न एक दिन माटी से करना ही है मिलान क्यूं ना वट वृक्ष की भांति नई कोंपलों को दे अपना अनुभव और स्थान।
आकाश चूमने को आतुर अंकुर भी जान ले यह किस्सा वह जड़ के अस्तित्व का ही है एक हिस्सा ।
जड़ों से जुड़कर ही नई पीढ़ी अपनी विरासत का मान करेगी
तभी विश्व के विस्तृत आकाश में अपनी ऊंची उड़ान भरेगी।
तभी इस धरा को मिलेगा यह अनुपम उपहार
सलामत रहेंगे हमारे सभी पेड़ और सभी परिवार।।
उर्मिल गुप्ता
