वैदिक साहित्य में संगीत तत्व

अरुणिता
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सारांश- वैदिक युग का प्रारम्भ आर्यों के आगमन पर होता है। आर्यों का संगीत इतना उत्कृष्ट था कि वे जहाँ भी गए, इन्होंने सबसे अधिक अपने संगीत की छाप छोड़ी। इस काल में संगीत का उत्कृष्ट स्थान था। सुबह-शाम प्रत्येक परिवार में ईश्वर की आराधना होती थी। इस काल में जितना संगीत का विकास घरों में हुआ, उतना बाहर नहीं हुआ। संगीत प्रायः ब्राह्मणों में था। वे ही कला-साधना कर समाज के चरित्र को उच्च स्तर तक ले जाते थे। ब्राह्मण ही संगीत की शिक्षा सर्वसाधारण को दिया करते थे। गायन-वादन तथा नृत्य तीनों का विकास हमें वैदिक युग में ही मिलता है। इस काल में वीणा वादन भी प्रचलित था। स्त्रियाँ वीणा-वादन करती थी। संगीत का विशेष रूप से आयोजन होता था और नर्तकियाँ उनमें खुलकर भाग लेती थी। समाज में नृत्य का प्रतिष्ठित स्थान था। पुरुष भी नृत्यों में रूचि रखते थे। नृत्य कला काफी विकसित हो चुकी थी।

मूल शब्द- वैदिक, साहित्य, संगीत, तत्व।

आर्यों के सभी साहित्य को ही वैदिक साहित्य कहा जाता है। वैदिक साहित्य में केवल चारों वेद ही शामिल नहीं हैं, उसमें आर्यों के महत्वपूर्ण ग्रंथ ब्राह्मण, उपनिषद्, आरण्यक, वेदांग और उपवेद आदि सभी धार्मिक ग्रंथ सम्मिलित हैं। संसार की विभिन्न प्राचीन सभ्यताओं के निर्माताओं की तरह आर्यों ने हमारे लिए अपने साहित्य का बहुत सा भंडार छोड़ा है। जिससे हमें उनकी सभ्यता और संस्कृति के विषय में पूरी जानकारी मिल सके। वैदिक साहित्य पर आज भी हर एक भारतीय को गर्व है। इस साहित्य में उच्च भावनाएँ, नैतिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विवेचन, ऊँची कल्पना, आध्यात्मिक चिंतन, सांगीतिक प्रयोग और सुन्दर काव्य कला आदि सभी गुण भरे हुए हैं। वेद के विस्तृत स्वरूप के कारण इसे चार भागों में विभक्त किया गया है-

ऋग्वेद

यह सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है तथा इसमें ऋचाओं का पाठ किया जाता है। ऋग्वेद में गीत के लिए गीर, गातु, गाथा, गायत्र तथा गीति शब्दों का प्रयोग मिलता है। गेय ऋचाएँ ‘स्रोत्र’ कहलाती थी। स्रोत्र का गान उद्गाता ऋत्विक करता था। स्रोत्रों का आवृत्ति पूर्वक पाठ ‘स्तोम’ कहलाता था, जो तीन ऋचाओं के ऊपर आधारित होता था। डॉ. रमावल्लभ मिश्र के अनुसार- जिस प्रकार आज स्थाई और अन्तरे को गायक स्वर तथा लय भेद करके बार-बार गाते हैं सम्भवतः उसी प्रकार स्तोमगान होता था। गाथा एक विशिष्ट प्रकार का गीत था, जिसका गायन धार्मिक और सामाजिक समारोहों के अवसर पर होता था। इसके गायक गाथिन कहलाते थे।   गाथाओं का गायन ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के ही द्वारा यज्ञों के पश्चात् किया जाता था।

डॉ. नूपुर राय चौधरी के लेख के अनुसार ऋचाएँ दो प्रकार की थी- ‘शास्त्र’ व ‘स्रोत्र’ किन्तु प्रमुखता ‘स्रोत्र’ को दी जाती थी। इन स्रोत्रों का गायन जब प्रकारान्तर व विविध स्वरों के साथ किया जाता था तब यह ‘स्तोम्’ नाम से पुकारा जाता था। स्तोम् वैदिक संगीत का महत्वपूर्ण अंग रहा है। यह एक विशिष्ट प्रणाली है जिसमें आधुनिक संगीत की गान शैली की झलक मिलती है।   ऋग्वेद काल में सातों स्वर अपने अस्तित्व में आ चुके थे, ऐसा मालूम पड़ता है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में यह मन्त्र आता है-

तदित्सधस्थमभि चारू दीधय गावो यच्छासन्वह्तुं न धेनवः।

माता यन्मन्तुर्यूथस्य पूव्याभिवाणस्य सप्तधातुरिज्जनः।। 10-32-4 पृ. 2134

ठाकुर जयदेव सिंह के अनुसार- इसमें ‘‘वाणस्य सप्तधातुः’’ पर सायण-भाष्य इस प्रकार है- ‘‘वाणस्य वाद्यस्य सप्तधातुर्निषादादिसप्तस्वरोपेतो’’। सायण ने वाण का अर्थ वाद्य लिया है और ‘‘सप्तधातुः’’ का अर्थ निषादादि सात स्वर माना है।   

ऋग्वेद काल में गायन, वादन के साथ-साथ नृत्य कला का एक विकसित रूप का परिचय मिलता है। नृत्य के कार्यक्रम खुले प्रांगण में तथा एकत्रित दर्शकों के सम्मुख होते थे, जिसमें नर व नारी दोनों भाग लेते थे।   वैदिक काल में गर्गर, पिंगा और गोधा आदि वाद्यों के नाम प्राप्त होते हैं। ये तीनों रण-वाद्य थे। इसी काल में दुंदुभि तथा आदम्बर युद्ध में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख वाद्य थे। इन वाद्यों के द्वारा सैनिकों का उत्साहवर्धन होता था, ताकि वे अपने शत्रुओं को परास्त कर सकें। भेरी तथा दुंदुभि-जैसे वाद्य शासकीय घोषणा को प्रसारित करने तथा युद्ध की सूचना देने के लिए बजाए जाते थे।   ऋग्वेद के छठे मंडल में दुंदुभि के लिए निम्न श्लोक है-

आमूरज प्रत्यावर्तयमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीति।

समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु।। 6-47.31

अर्थात्- हे राजन् आदि जनो! तुम लोग दुंदुभि आदि वाद्यों से भूषित, हर्ष व पुष्टि से युक्त सेनाओं को अच्छे प्रकार रखकर, इनसे दूरस्थ भी शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर प्रजाओं का धर्मयुक्त व्यवहार से पालन करो।   

विजय कुमार गोयल ने ऋग्वैदिक कालीन संगीत के बारे में इस प्रकार चर्चा की है- ऋग्वेद काल में संगीत पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो चुका था। शांति एवं युद्ध के समय ‘दुंदुभि’ वाद्य का प्रयोग होता था। वाद्य यंत्रों में ‘कर्करी’ का भी प्रयोग किया जाता था। कर्करी, बांसुरी की तरह का एक वाद्य यन्त्र था। वाद्य यन्त्रों में ‘अघाटी’ का संदर्भ मिलता है। यहाँ अघाटी का अर्थ ‘वीणा’ से लिया गया है। मैक्डॉनल एवं कीथ के अनुसार इसका प्रयोग संयुक्त रूप से गायन के समय होता था। सायण भी इसका अर्थ वीणा ही लेते हैं। मैक्डॉनल का तर्क भी ठीक ही है क्योंकि सोमाभिषव के साथ सात स्त्रियों का संयुक्त गायन का संदर्भ प्राप्त होता है। ‘गाता पति’ को गायन का देवता कहा गया है। दानस्तुति का विशेष रूप से राजाओं अथवा देवताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है।   

‘भारतीय संस्कृति’ ग्रन्थ में भी अन्य विद्वानों की भांति ऋग्वैदिक कालीन संगीत के बारे में जानकारी प्राप्त होती है- आर्यों का जीवन सुख और आनन्द से भरपूर था। वे आमोद प्रिय थे। उनके मनोरंजन के प्रमुख साधन अश्व-दौड़ तथा रथ दौड़ थे। जुआ खेलना भी आर्यों का प्रिय मनोरंजन था। ऋग्वेद का प्रसिद्ध अक्षर सूक्त (10/34...) द्यूत के आकर्षण और दुष्परिणामों का बहुत सुंदर तथा मनोरंजक वर्णन करता है। उस समय कंठ संगीत का भी प्रचलन था। सोमरस निकालते समय ब्राह्मण उच्च स्वर में गीत गाते थे। दुंदुभि, पणव, शृंग तथा वीणा आदि वाद्य बजाये जाते थे। स्त्रियाँ तो नृत्य करती ही थीं, सम्भवतः पुरुष भी नृत्य किया करते थे। कुछ विद्वानों ने ऋग्वेद में पाये जाने वाले संवाद सूक्तों को नाट्य का प्रारंभिक रूप माना है। इन सबसे स्पष्ट है कि तत्कालीन युग में नृत्य, संगीत, क्रीड़ा आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।   

यजुर्वेद

‘यजुर्वेद’ उन मन्त्रों का संकलन है जिनका गायन यज्ञादि के अवसर पर कर्मकाण्ड के लिए होता था। चार गायक होते थे, जिनको क्रमशः होता, अध्वर्यु, उद्गाता तथा ब्रह्मा कहते थे। यज्ञ के कार्यों का संचालन अध्वर्यु नामक ऋत्विज के द्वारा किया जाता था।   यह यजन-कर्म जिन मन्त्रों के द्वारा किया जाता था, उन्हीं का संकलन यजुः संहिता में हुआ है-

ऋग्भिः यजुभिः सामभिर्यदेन ऋग्भि शंसन्ति यजुभिर्यजन्ति सामभिः स्तुवन्ति।   

सोम यागों में ऋक्, यजु तथा साम तीनों प्रकार के मन्त्रों का अनिवार्य स्थान है। यजुर्वेद में होम-यज्ञ के मन्त्र-तन्त्र एवं विभिन्न अनुष्ठानों का वर्णन किया गया है।   

भूषण गिरी गोस्वामी के अनुसार यजुर्वेद की सबसे प्रमुख विशेषता है इसका ‘गद्यात्मक स्वरूप’। आर्यकालीन संस्कृति में आर्यों द्वारा सम्पादित होने वाले यज्ञों में ‘अध्वर्यु’ की सहायता के लिए जो गद्यात्मक वैदिक प्रार्थनाएँ और निवेदन देवों के लिए, ऋक् तथा साम से भिन्न, गद्यात्मक मन्त्रों का संयोजन ‘यजुष’ कहा जाता था अर्थात् यजुर्वेद ‘यजुषः’ विषय-वस्तु यज्ञ और हवनों के नियम और विधान है। यह ग्रंथ आर्यों के यज्ञीय कर्मकाण्डों में ‘अध्वर्यु’ की सहायता के लिए निर्मित किया गया है। इस ग्रंथ में यज्ञों के प्रकार जैसे सोमयज्ञ, गृहयज्ञ, अग्निहोत्र यज्ञ, पूर्णिमा यज्ञ, वाजपेययज्ञ, राजसूय यज्ञ, अश्वमेघ यज्ञ इत्यादि एवं उनके पूर्ण करने की विधियाँ दी गई हैं।   

यजुर्वेद की शुक्ल और कृष्ण दोनों शाखाओं में साम गान की प्रशंसा की गई है। यजुर्वेद में रथन्तर, वैराज, वैश्वानर, वामदेव्य, शाक्वर, रैवत, अभीवर्त इन सात प्रकार के सामों का उल्लेख हुआ है। इनमें से कई साम किसी ऋतु विशेष में ही गाये जाते थे। जैसे- रथन्तर साम वसन्त ऋतु, वैराज साम वर्षा ऋतु में ही गेय थे। इन सामों का ऋतुओं से हमारे वर्तमान ऋतु विशेष में गाये जाने वाले रागों-वसन्त, मल्हार आदि की ओर संकेत करता है।   

यजुर्वेद काल में अनेक विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के वाद्यों के बारे में बताया है जिनमें प्रमुख वाद्य हैं- वीणा, वाण, तूणव, दुंदुभि, भूमि दुंदुभि, शंख तथा तलव आदि। ‘इस काल में गायन वादन एवं नृत्य के समय हाथ से ताल देने की प्रणाली थी। यजुर्वेद काल की महिलाएं भी लय शास्त्र में प्रवीण थी।’   निम्न कुल की महिलाओं को लोक नृत्य आदि समारोहों पर आमंत्रित किया जाता था। सिर पर कलश लेकर एक से अधिक नर्तकियाँ वर्तुलाकर नृत्य करती थीं और मुँह से गीत के चरणों को गाती थी।   

अथर्ववेद

चतुर्विधा वेदों में अथर्ववेद का भी अपना विशिष्ट स्थान है। इस वेद में प्रयोगात्मक मन्त्र तथा विधि-विधानों का संकलन है। इस वेद में भी सामगान के महत्व का प्रचुर उल्लेख मिलता है। इस वेद का अपना विषय विभिन्न प्रयोगात्मक मन्त्र जैसे- मारण, उच्चटन, वशीकरण आदि है। इस वेद को 20 कांडों में बांटा गया है।

वैदिक कालीन इतिहास के लेखन में ऋग्वेद एवं अथर्ववेद की भूमिका अत्यन्त उच्च श्रेणी की है। जहाँ ऋग्वेद आर्यों की प्रारम्भिक जीवन शैली का दर्शन कराता है वहीं अथर्ववेद उनके विकासशील जीवन-दर्शन की झाँकी प्रस्तुत करता है। धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक दर्शन की दृष्टि से भी ऋग्वेद एवं अथर्ववेद का बड़ा महत्त्व है।

अथर्ववेद में धर्मिक अनुष्ठानादि में साम गान का प्रयोग तो होता ही था, परन्तु लौकिक विभिन्न विवाहादि अवसरों पर मंगल गीत इत्यादि गाने की प्रथा प्रचलित थी।

डॉ. रमा बल्लभ मिश्र के अनुसार- ‘अथर्ववेद में गाथा तथा नाराशंसी के अतिरिक्त रैभी-लौकिक गीत प्रकार का भी उल्लेख है। विवाह आदि प्रसंगों पर इनका गान होता था। आमोद-प्रमोद, यात्राओं तथा कपड़ा बुनने जैसे व्यावसायिक अवसरों पर भी गायन का वर्णन है। इन बुनकर नारियों की गीत लय-युक्त थी और वर्तुलाकार नृत्यांगनाओं का स्मरण कराती थी। गांधर्वों की पत्नियों, अप्सराओं का नृत्य-गान में कुशल और संलग्न होना आवश्यक था।’   

अथर्ववेद में वर्णन मिलता है कि ‘दुंदुभि’ का निर्माण काष्ठय से किया जाता था तथा उसका मुख परिपक्व चर्म से बनता था। इसको चारों ओर से चर्म की बद्धियों से बद्ध किया जाता था। बद्धियों को मुलायम रखने के लिए तेल का लेपन किया जाता था।   

डॉ. मनोरमा शर्मा ने दुंदुभि के बारे में इस प्रकार विचार व्यक्त किया है- अथर्ववेद में दुंदुभि का गौरव गान किया गया है। दुंदुभि को हिंदुओं द्वारा पूजित वाद्य के रूप में वर्णित किया गया है। युद्ध के दौरान यदि किसी सेना की दुंदुभि का हरण कर लिया जाता था, तो उस सेना की हार मानी जाती थी।   

सामवेद

प्राचीन काल से संगीत भारतीय संस्कृति, जनजीवन का अभिन्न अंग रहा है। सामवेद का प्राचीन संगीत की दृष्टि से एक विशिष्ट स्थान है। सामवेद को संगीत का मूल कहा जाता है। साम का गान ऋग्वेद की ऋचाओं के आश्रय से किया जाता रहा है। साम संहिता में ऋक् के चुने हुए मन्त्रों का संकलन है। सामगान का प्रधान अंग स्वर है। सामवेद एक ऐसा वेद है जिसके मंत्र यज्ञों में देवताओं की स्तुति करते गाये जाते थे। ऋचाओं के ही संगीतमय परायण से साम गान का प्रथम विकास ऋषियों द्वारा किया गया।

सामवेद के दो प्रधान भाग हैं- (1) आर्चिक तथा (2) गान। साम संहिता में जो संकलित ऋचाएं हैं उन्हें आर्चिक कहा गया है। गान संहिता में केवल गीत के बोल थे। गान ग्रंथ साम के स्वरमय स्वर के द्योतक हैं। आर्थिक ग्रंथों की तुलना आधुनिक परिभाषा में संगीत के ऐसे गीति ग्रंथों से की जा सकती है, जिनमें केवल स्वर-विरहित चीजों का संकलन होता है। ‘जैमिनीय सूत्र गीति के लिए साम संज्ञा है- ‘गीतुषु सामाख्या।’ अर्थात् जो मन्त्र गाये जाते हैं वही साम है।   गान ग्रन्थों की तुलना स्वरलिपि सहित चीजों के संकलन - ग्रंथों से की जानी चाहिए।

सामवेद के प्रथम भाग अर्थात् आर्चिक संहिता को दो भागों में बांटा गया है- (1) पूर्वार्चिक तथा (2) उत्तरार्चिक।

(1) पूर्वार्चिक- पूर्वार्चिक में 6 अध्याय या प्रपाठक हैं। इनमें से प्रथम पांच अग्नि, इन्द्र, पवमान आदि देवताओं की स्तुति की गई है।

(2) उत्तरार्चिक- इसमें 9 प्रपाठक है तथा मंत्र संख्या कुल 1295 है। सामवेद की सम्पूर्ण 1,875 ऋचाओं में से केवल 99 ऐसी हैं जो ऋग्वेद में नहीं मिलती।   सामवेद के गान ग्रंथ को 4 भागों में विभक्त किया गया है-

ग्राम गेयगान- सम्भवतः ग्रामवासी गृहस्थों तथा अरण्यकगान वन में रहने वाले ऋषियों द्वारा गाया जाता था। इन्हीं दोनों प्रकार के गानों से ऊह्गान और ऊह्यगान की पद्धतियाँ प्रस्फुटित हुईं।

सामगान की अनेक परम्परागत या शाखाएं थी। इनमें केवल तीन शाखाओं के नाम अधुना उपलब्ध हैं। ये हैं- ‘कौथुमिय शाखा, राणायणीय शाखा तथा जैमिनी सूत्र।   

वैदिक स्वर- ‘पतंजलि के अनुसार ‘स्वर’ वे हैं, जो स्वयं विराजित होते हैं- ‘स्वयं राजन्ते इति स्वराः।   

उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये तीन प्रधान स्वर संज्ञाएं ‘नारदीय शिक्षा’ में उपलब्ध है। इसके अनुसार (उदात्त) उच्च, (अनुदात्त) नीच और (स्वरित) बीच का स्वर ये तीन स्वर प्रधान्य हैं।   

महर्षि पाणिनी के अनुसार- ‘उच्चैरूदातः, नीचैरनुदात्तः, समाहार स्वरितः।’

इसका भी अभिप्राय उदात्त का उच्च, अनुदात्त का नीच और स्वरित का समाहार अर्थात् दोनों का जोड़ यही भाव प्रतीत होता है।   

सन्दर्भ सूची- 

1. छायानट - डॉ. रमाबल्लभ मिश्र के लेख से - पृ. 8 ( 982)

2. बागेश्वरी - डॉ. नूपुर राय चौधरी - पृ.  3 (2005)

3. भारतीय संगीत का इतिहास - ठाकुर जयदेव सिंह - पृ. 26

4. बागेश्वरी - डॉ. नूपुर राय चौधरी के लेख से - पृ.  4 (2005)

5. संगीत - डॉ. मनोरमा शर्मा के लेख से - पृ. 3 (जुलाई - 2003)

6. संगीत - डॉ. मनोरमा शर्मा के लेख से - पृ. 3 (जुलाई - 2003)

7. ऋग्वेद कालीन समाज और संस्कृति - विजय कुमार शुक्ल - पृ. 93

8. भारतीय संस्कृति - डॉ. प्रीति प्रभा गोयल - पृ.  40

9. भारतीय संगीत एक ऐतिहासिक विश्लेषण - स्वतंत्र शर्मा - पृ. 8

10. भारतीय संगीत का इतिहास - डॉ. शरच्चन्द्र श्रीधर परांजये - पृ. 26

11. विश्व संगीत का इतिहास - अमल कुमार दाश - पृ.  

12. वैदिक कालीन सभ्यता एवं संस्कृति - भूषण गिरी गोस्वामी - पृ. 249

13. छायानत - डॉ. रामावल्लभ मिश्र के लेख से - पृ. 8 ( 982 अंक - 20)

14. उत्तर भारतीय संगीत - गुरमीत सिंह मनकान - पृ.  2

15. भारतीय संगीत एक ऐतिहासिक विश्लेषण - स्वतंत्र शर्मा - पृ. 9

16. छायानट - डॉ. रामावल्लभ मिश्र के लेख से - पृ.  0 ( 982 अंक 20)

17. उत्तर भारतीय संगीत - गुरमीत सिंह मनकान - पृ.  2

18. संगीत - डॉ. मनोरमा शर्मा के लेख से - पृ. 4 (जुलाई - 2003)

19. भारतीय संगीत एक ऐतिहासिक विश्लेषण - डॉ. शरच्चन्द्र श्रीधर परांजये - पृ. 54

20. छायानट - डॉ. रामावल्लभ मिश्र के लेख से - पृ. 9 ( 982 अंक 20)

21. भारतीय संगीत सरिता - डॉ. रमा सर्राफ - पृ. 7

22. भारतीय संगीत एक इतिहास - डॉ. शरच्चन्द्र श्रीधर परांजये - पृ. 75

23. भारतीय संगीत शास्त्र - तुलसीराम देवांगन - पृ. 32

24. भारतीय संगीत शास्त्र - तुलसीराम देवांगन - पृ. 32

डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता 

सहायक आचार्य, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय,

गंगापुर सिटी, जिला-सवाई माधोपुर (राजस्थान) 322201

दूरभाष-9462607259

Mail: dineshg.gupta397@gmail.com




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