सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
मनुष्य अभी बाकी है
भीड़ बढ़ी, पर मनुष्य कम होता गया। चेहरों पर मुस्कानें थीं, आँखों में दरवाज़े बंद थे। हर कोई अपनी-अपनी जीत का उत्सव मना…
भीड़ बढ़ी, पर मनुष्य कम होता गया। चेहरों पर मुस्कानें थीं, आँखों में दरवाज़े बंद थे। हर कोई अपनी-अपनी जीत का उत्सव मना…