प्रवीण पारीक 'अंशु'
दोहे
इच्छाओं में भागता , यह मन बारंबार। मानो , पक्षी नापता , अंबर का विस्तार।। कभी पड़ा सूखा यहाँ , कभी बाढ़ की मार …
इच्छाओं में भागता , यह मन बारंबार। मानो , पक्षी नापता , अंबर का विस्तार।। कभी पड़ा सूखा यहाँ , कभी बाढ़ की मार …