खबर छोटी थी, पर असर परमाणु बम जैसा हुआ। एक महिला ने पति से तलाक लेकर स्वयं से विवाह कर लिया। न बारात, न बैंड, न वो मामा जो शराब पीकर हर शादी में दूल्हे से गले मिलकर रोता है। बस एक स्त्री, एक शीशा, और एक वचन कि "मैं अपने आप के साथ रहूँगी, सुख में, दुख में, स्किनकेयर रूटीन में, और सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग में।"
मोहल्ले में हलचल मच गई। पान की दुकान पर, जो हर सामाजिक क्रांति की संसद होती है, फैसला तुरंत सुना दिया गया "कलियुग है भाई, अब लोग खुद से ही फेरे ले रहे हैं।" किसी ने यह नहीं पूछा कि आखिर यह कलियुग है या सिर्फ एक स्त्री का यह तय करना कि उसे अब किसी और की इजाज़त नहीं चाहिए अपने वजूद के लिए। सबसे पहले प्रतिक्रिया आई ताई जी की तरफ से, जिनका मानना है कि हर समस्या का हल एक ही है-"लड़की की शादी करा दो।" अब जब लड़की ने खुद अपनी शादी करा ली, तो ताई जी असमंजस में पड़ गईं। जिस सवाल को वे तीस साल से हथियार की तरह इस्तेमाल करती आई थीं-"बेटा, शादी कब कर रही हो?" वह सवाल अब बेरोज़गार हो गया। स्त्री ने जवाब पहले ही दे दिया था, प्रश्न पूछे जाने से पहले। चाचा जी का कहना था कि "यह पश्चिमी सभ्यता का असर है", हालाँकि जब उनसे पूछा गया कि भारतीय परंपरा में तो स्वयंवर की भी व्यवस्था थी, तो उन्होंने विषय बदल दिया और मौसम पर बात करने लगे। कुछ बुद्धिजीवी मित्रों ने इसे "आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा" कहा। स्त्री अब पितृसत्ता की मंज़ूरी का इंतज़ार किए बिना खुद को प्रेम, सम्मान और सुरक्षा दे सकती है। यह तर्क सुनने में सुंदर लगता है,जब तक कोई यह न पूछ ले कि क्या आत्मनिर्भरता के लिए सचमुच एक अंगूठी, एक हलफनामा और एक हैशटैग ज़रूरी था, या यह सिर्फ पूँजीवाद का एक नया उत्पाद है। जो स्त्री अब खुद से रूठेगी, खुद ही मनाएगी, खुद ही झगड़ेगी और खुद ही सुलह करेगी, उस विवाह में तीसरे पक्ष की गुंजाइश ही कहाँ बचती है।
इंटरनेट, जो हर घटना को चौबीस घंटे के भीतर या तो "क्रांति" या "पतन" घोषित करने की ज़िम्मेदारी स्वयं उठाए बैठा है, इस बार भी बँट गया। एक तरफ रील बनाने वाले युवा इसे "गर्ल बॉस एनर्जी" बताकर ठुमके लगा रहे थे, दूसरी तरफ कमेंट सेक्शन में वही चिर-परिचित सवाल दोहराए जा रहे थे-"फिर बच्चे कौन पालेगा?" मानो हर स्त्री के हर निर्णय का अंतिम पैमाना यही हो कि उससे प्रजनन-व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। कानूनी जानकारों ने स्पष्ट किया कि भारतीय विवाह अधिनियम के अंतर्गत स्वयं से विवाह को कोई मान्यता नहीं है, अतः यह विवाह "सामाजिक" है, "वैधानिक" नहीं।
अंततः उन्होंने कुर्सी खाली छोड़ दी, यह कहकर कि "यह प्रतीकात्मक शून्य है, दार्शनिक दृष्टि से देखिए।" यहीं पर बात दिलचस्प हो जाती है। भारतीय दर्शन सदियों से यही सिखाता रहा है कि आत्मा का सबसे गहरा रिश्ता स्वयं से ही है-"आत्मानं विद्धि", स्वयं को जानो।पर हमने इस ज्ञान को हमेशा मंदिरों और प्रवचनों तक सीमित रखा, कभी इसे वैवाहिक निमंत्रण-पत्र पर छापने की हिम्मत नहीं की। अब जब किसी स्त्री ने इस दर्शन को व्यावहारिक रूप दे दिया, तो समाज को यह क्रांति की जगह तमाशा ज़्यादा लगा। शायद इसलिए कि आत्मज्ञान अकेले में स्वीकार्य है, पर उसका सार्वजनिक उत्सव असुविधाजनक। सच तो यह है कि इस घटना ने समाज को आईना दिखा दिया। जिस स्त्री ने खुद से वादा किया कि वह खुद को कभी नहीं छोड़ेगी,उसने दरअसल वह वादा तोड़ा है जो सदियों से हर स्त्री से करवाया जाता रहा- "अपनी नहीं, दूसरों की सोचो।"
विवाह के सात फेरों का भी अपना दर्शन है। हर फेरे में दो लोग एक-दूसरे से कोई न कोई वादा करते हैं—सुख-दुःख में साथ देने का, बीमारी में साथ रहने का, जीवनभर एक-दूसरे का हाथ थामने का। लेकिन जब दूल्हा और दुल्हन एक ही व्यक्ति हों तो सारे वादे अत्यंत सुविधाजनक हो जाते हैं।
पहला फेरा—“मैं तुम्हारे सुख-दुःख में साथ रहूँगी।”
उत्तर—“मैं भी।”
दूसरा फेरा—“मैं बीमारी में तुम्हारी सेवा करूँगी।”
उत्तर—“करनी ही पड़ेगी।”
तीसरा फेरा—“मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करूँगी।”
उत्तर—“क्योंकि भावनाएँ भी मेरी ही हैं।”
चौथा फेरा—“मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूँगी।” यहाँ दोनों पक्ष मुस्कराएँगे, क्योंकि धोखा देने के लिए दूसरा पक्ष होना भी तो चाहिए।
पाँचवाँ फेरा—“मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगी।”
उत्तर—“कहाँ जाओगी? घर भी तो मेरा ही है।”
छठा फेरा—“मैं हर परिस्थिति में तुम्हारा साथ दूँगी।”
उत्तर—“यह वादा तो आसान है।”
सातवाँ फेरा—“मैं जीवनभर तुम्हें प्रेम करूँगी।”
और यहाँ विवाह संपन्न।
पंडित जी शायद कहें—“अब वर-वधू एक-दूसरे को मिठाई खिलाएँ।” दुल्हन खुद को मिठाई खिलाएगी। फोटोग्राफर कहेगा—“मैडम, एक फोटो दूल्हे के साथ भी।” वह आईने के सामने खड़ी हो जाएगी। फोटोग्राफर बोलेगा—“दूल्हा कहाँ है?” “यहीं तो है।” फोटोग्राफर कैमरा नीचे रखकर सोचने लगेगा कि आज उसके पेशे का भविष्य खतरे में है।
वैसे आत्मप्रेम कोई बुरी चीज नहीं है। मनुष्य को स्वयं से प्रेम करना चाहिए। जो स्वयं को सम्मान नहीं देता, वह दूसरों से सम्मान की अपेक्षा कैसे कर सकता है? समस्या आत्मप्रेम में नहीं, उसकी मात्रा में है। एक समय था जब हमें सिखाया जाता था-“दूसरों के लिए जियो।” फिर समय बदला और संदेश आया—“अपने लिए भी जियो।” अब लगता है कि अगला संस्करण होगा-“दूसरों को भूल जाओ, केवल अपने लिए जियो।” और सोशल मीडिया इस विचार का सबसे बड़ा प्रचारक बन चुका है। आज आदमी स्वयं को देखने के लिए आईना कम और मोबाइल का फ्रंट कैमरा ज्यादा खोलता है। आईना कम-से-कम ईमानदार था; कैमरा तो फिल्टर लगाकर आत्मा तक को सुंदर बना देता है।
वैसे इस घटना को केवल हास्य के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। आधुनिक समाज में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आत्मप्रेम की भावना बढ़ी है। लंबे समय तक महिलाओं से अपेक्षा की जाती रही कि वे अपने अस्तित्व को विवाह, परिवार और रिश्तों के भीतर ही खोजें। आज एक महिला यह कहती है कि उसका अस्तित्व किसी दूसरे व्यक्ति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है, तो इसमें एक सामाजिक परिवर्तन की आवाज भी सुनाई देती है। समस्या तब शुरू होती है जब आत्मप्रेम आत्ममुग्धता में बदल जाता है। आत्मसम्मान कहता है—“मैं भी महत्वपूर्ण हूँ।” आत्ममुग्धता कहती है—“सिर्फ मैं ही महत्वपूर्ण हूँ।” आत्मनिर्भरता कहती है—“मैं अपना जीवन संभाल सकती हूँ।” अतिव्यक्तिवाद कहता है—“मुझे किसी की जरूरत ही नहीं।” और सोशल मीडिया इन दोनों के बीच कैमरा लेकर खड़ा है। अब विवाह और तलाक के बीच वही संबंध रह जाएगा जो मोबाइल के स्विच ऑफ और स्विच ऑन के बीच होता है। क्योंकि दोनों आखिर एक ही तो हैं! यही आधुनिक प्रेम की सबसे बड़ी उपलब्धि है—अब प्रेमी आत्म प्रेमी हैं जिसको खोजने के लिए दुनिया घूमने की जरूरत नहीं। बस आईने के सामने खड़े हो जाइए। और यदि रिश्ता बिगड़ जाए तो चिंता मत कीजिए जिससे शादी की थी, तलाक भी उसी से ले लीजिए।
प्रभाष पाठक, सहायक सांख्यिकी पदाधिकारी,
जिला सांख्यिकी कार्यालय,
जिला अररिया, बिहार, पिन 854311
मो 9534412652
