प्रस्तावना: स्त्री शिक्षा किसी भी समाज के विकास का प्रतीक है। यदि कोई समाज विकसित तथा सभ्य है तो निश्चित है कि उस समाज की स्त्री सुशिक्षित और सुसंस्कृत होगी क्योंकि एक स्त्री का अपने परिवार और समाज के प्रति बहुत योगदान होता है, और यही कारण है कि यदि नारी शिक्षित होगी तभी अपने परिवार और समाज को शिक्षित और सभ्य बनाने में मदद करेगी। वैदिक काल में भी इस मत को महत्ता प्राप्त थी और यही कारण था कि इस काल में महिलाओं को भी पुरूषों के समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था। स्त्री के द्वारा ही स्त्रियों में श्रेष्ठ उदात्त और महान विचारों का प्रस्फुटन हुआ जिससे ऋग्वेद जैसे महावेद में स्त्रियों द्वारा मंच एवं लोक रचे गये। वैदिक काल में नारी शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था। ज्ञान और शिक्षा में वे किसी भी प्रकार पुरूषों से कम नहीं थे। ऋग्वेदिक काल में पुत्र की भाँति पुत्री का भी उपनयन संस्कार होता था। ऋग्वैदिक काल में नारी को ऋषिका बनने की भी पुरूषों की भाँति ही छूट थी। नारी अपने पति के प्रत्येक धार्मिक कार्यो में सहभागिनी रहती थी। उन्हें पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने की भी सुविधा थी। पत्नी अपने पति के प्रत्येक धार्मिक कार्यो में भागीदार होती थी। उस काल में स्त्री साधु को ऋषिका या ब्रह्मवादिनी कहा जाता था। जिसमें रोमा लोपामुद्रा, अपाला कदू्र, विश्ववारा का नाम उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त दसवें मंडल में वर्णित निम्न ऋषि थी- घोषा, जुहु, वागवरिणी, जरीता, ऋद्धा, कामायनी, उर्वशी, शारंगा, यमी, इन्द्राणी, सावित्री, देवयानी। जबकि सामवेद के अनुसार निम्नांकित ऋषिकाएं वर्णित हैंः- नोधा, आकृष्टावासा, सिकता, गोपनाया, उपर्युक्त समय में शिक्षित अनुशासनप्रद परिपक्व नारी ही ब्रह्मचर्य नारी कहलाती थी। परिपक्व नरियाँ शिक्षा पूर्ण करने, के उपरांत ब्रह्मचारिणी कहलाती थी तथा अपने पति के साथ इस तरह घुल-मिल जाती थी जैसे समुद्र के साथ नदी। यजुर्वेद में यह भी वर्णित है कि अविवाहित स्त्रियाँ सयानी होने पर अपने पति को चुनने की भी शिक्षा प्राप्त करती थी। इसी तरह एक नारी जो ब्रह्मचर्य की शिक्षा प्राप्त कर लेती थी उसे ऐसे ही पुरूष के साथ विवाह करने की छूट थी जो उसके समान ही जानकार और बुद्धिमान हो। जो नारी ब्रह्मचर्य उत्तीर्ण कर जाती थी तथा अनुशासित विद्यार्थी जीवन व्यतीत कर लेती थी उसे दूसरे आश्रम में भी विवाह की सुविधा थी।
ऋग्वैदिक काल में अनार्य स्त्रियों में भी शिक्षा का प्रचलन
था। लेकिन उसकी शिक्षा वेदांतिक नहीं बल्कि शारीरिक और सांस्कृतिक शिक्षा की
व्यवस्था थी। इस तरह आर्यों और अनार्यां की शिक्षा में अन्तर था। अन्य वेदों में
भी उल्लेख है कि नारी को भी ब्रह्मचर्य, विद्या अध्ययन करने की स्वतंत्रता थी।
उत्तर वैदिक काल के साक्ष्य मिले हैं उससे स्पष्ट होता है
कि नारी को शिक्षा प्राप्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। उस समय की नारी शिक्षित
हुआ करती थी परन्तु यह कही नहीं दर्शाया गया है कि वह नारी शिक्षक विवाहित होती थी
या अविवाहित। उस समय की आर्य नारियाँ उत्तर दिशा की ओर अपनी शिक्षा प्राप्ति के
लिए जाती थी। यह महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर वाक् अर्थात् सरस्वती की उपाधि ले
कर आती थी। वैदिक ग्रन्थ में नृत्य और संगीत का उल्लेख मिला है। इस सबंध में यह भी
कहा गया है कि उस समय नारी को ललित कला जैसे नृत्य, गान, चित्रकारी आदि की भी शिक्षा दी जाती थी। उत्तर
वैदिक युग मे भी उन्हें संगीत और नृत्य की शिक्षा, पाक शास्त्र की शिक्षा एवं दैनिक गृहस्थी जीवन
की शिक्षा दी जाती थी। वेदांत की एक अन्य विदुषी स्त्री अत्रेयी थी। विदुषी होती
थी कि उन्होंने ऋग्वेद की ऋचाएं रची। इस प्रकार बौद्धिक गौरव तथा सम्मान प्राप्त
किया लोपामुद्रा, अपाला, अत्रेयी आदि अनेक स्त्रियाँ वैदिक सूक्तों की ऋषि थी और
गोपा, घोषा, विश्ववारा, अदिति, सरमा, यमी आदि कितनी ही ब्रह्मावादिनी महिलाएं थी।
कहते है कि रण क्षेत्र में भी वे कम कौशल नहीं दिखलाती थी। विष्पला नामक एक स्त्री
रणक्षेत्र में गयी थी और जब युद्ध करते-करते वह जब घायल हो गयी तो अश्विनों ने
उसका उपचार किया। उपनिषदों में शिक्षित स्त्रियों के अनेक उदाहरण हैं। वृहदारण्यक
उपनिषद में जनक की सभा में गार्गी और याज्ञवल्क्य के श्रेष्ठ वाद-विवाद का उल्लेख
है। पुराणों में स्त्री शिक्षा का वर्गीकरण दो वर्गो में किया गया है आध्यात्मिक
ज्ञान में वृहस्पति, भगिनी, भुवना अपर्णा, एकपर्णा, एकपटला मेना, घारिणी शतरूपा उमा पीवरी, धर्मव्रता आदि का वर्णन पुराणों में मिलता है।
वृहस्पति, भगिनी, भुवना के विषय में यह विख्यात है कि उसने योग
में सिद्धि प्राप्त की थी तथा आसक्ति भाव से समस्त पृथ्वी का भ्रमण किया था।
वृहस्पति की भगिनी की तरह दक्ष कन्याओं को भी दोनों पुराणों में ब्रह्मवादिनी शब्द
से सुसज्जित किया है। मत्स्यपुराण में उमा की तपस्या का वर्णन है जिसने अपने तप के
लिए ऐसा स्थान चुना जो देवों के लिए भी दुर्लभ था। इस प्रसंग से यह ज्ञात होता है
कि कुछ कन्याएं अपने अभीष्ट प्राप्ति के लिए योग और तपस्या में लीन रहती थी।
अथर्ववेद से यह प्रमाणित होता है कि ब्रह्मचर्य के अभ्यास से कन्या युवा पति पाने
में सफल होती थी। वृहदारण्यक उपनिषद् से भी यह स्पष्ट होता है कि याज्ञवल्कय की
पत्नी संसारिक वस्तुओं का त्याग कर आध्यात्म की ओर परिवर्तित हो गयी है। प्रथम
शताब्दी ईसा पूर्व तक भी नारी शिक्षा प्रचलन में थी, यह अलग बात है कि इसमें कुछ गिरावट आ गयी थी।
फिर भी पुराणों में छः विदुषी महिलाओं का उल्लेख है। भागवत् पुराण में दक्षायण की
दो विदुषी कन्याओं का प्रसंग है। विष्णु पुराण की मेना और घारिणी भी ब्रह्मवादिनी
योगिनी एवं श्रेष्ठ ज्ञान से परिपूर्ण थी। सतरूपा अनन्य ब्रह्मवादिनी थी।
ब्रह्मवादिनियों को केवल ब्रह्मचारिणी ही रहने का विधान नहीं था अपितु वे विवाह भी
कर सकती थी। नारियों को अध्ययन काल में उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। गृह
कार्य के अतिरिक्त कन्याओं को ललित कलाओं की शिक्षा दी जाती थी। स्त्रियों को
साहित्य और दर्शन के अतिरिक्त चित्रकला की शिक्षा दी जाती थी। गृह सूत्रों से
विदित होता है कि उनका उपनयन के साथ-साथ समावर्तन संस्कार भी होता था। समावर्तन
संस्कार ब्रह्मचर्य जीवन की समाप्ति के बाद सम्पन्न होता था। इससे लगता है कि
सूत्र युग में पुरूषों की तरह स्त्रियाँ भी शिक्षा प्राप्त करने के निमित्त
ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करती थी। ऋषि तर्पण के समय गार्गी, वाचनवी, सुलभा, मैत्रेयी, बड़वा, प्रतिकेशी आदि ऋषि नारियों के भी नाम लेने का
निर्देश दिया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ मंत्रविद् और पंडिता होती
थी और ब्रह्मचर्य का पालन करती हुयी उपनयन संस्कार कराती थी।
छात्राओं के वर्ग
वैदिक युग में छात्राओं के दो वर्ग थे, जिनमें पहला सधोवधू और दूसरी ब्रह्मवादिनी
कहलाती थी। सधोवधू उन छात्राओं को कहा जाता था जो विवाह के पूर्व तक कुछ वेद
मंत्रों और याज्ञिक प्रार्थनाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेती थी तथा ब्रह्मवादिनी
उन्हें कहते थे जो अपनी शिक्षा पूरी करने में अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देती
थी। इस प्रकार कुछ स्त्रियाँ जीवन पर्यन्त अध्ययन में लीन रहती थी और विवाह नहीं
करती थी। ऐसी ब्रह्मवादिनी स्त्री वेदवती थी जो ऋषि कुशध्वज की कन्या थी। ऐसी
स्त्रियाँ बहुमुखी प्रतिभा सम्पनन होती थी, जो ज्ञान और बुद्धि में पांरगत ही नहीं बल्कि
अनेक मंत्रों की उद्गात्री होती थी। ये स्त्रियाँ दर्शन, तर्क, मीमांसा, साहित्य जैसे विभिन्न विषयों की विशेषज्ञ होती
थी। मीमांसा जैसे जटिल और गूढ़ विषय पर काशकृत्सनी नामक स्त्री ने अनेक पुस्तकों की
रचना की जो बाद में उसी के नाम से विख्यात हुई इसके अध्येता काशकृत्सनी ही कहे
गये।
स्त्रियाँ और गोष्ठियाँ:
स्त्रियों की रूचि क्रमशः अध्ययन-मनन के क्षेत्र में बढ़ती
गयी। दर्शन और अन्य गूढ़ विषयों में उनकी पारंगतता बढ़ती गयी। याज्ञवल्क्य की पत्नी
मैत्रेयी एक विख्यात दार्शनिक थी जिनकी रूचि संसारिक वस्तुओं और अलंकारों में न
होकर दर्शन शास्त्र में थी। यही नहीं उसने अपने पति की संपत्ति में अपने अधिकार को
याज्ञवल्कय को दूसरी पत्नी के हित में त्याग कर केवल ज्ञान प्राप्त करने की याचना
की थी। जनक की राज्य सभा में होने वाली विद्वदगोष्ठी में गार्गी ने अपने प्रश्नों
से उन्हें ही नहीं बल्कि पूरे विद्वत समाज को अचंभित कर दिया। वाल्मीकि और अगस्त्य
जैसे महर्षियों से मैत्रेयी ने शिक्षा प्राप्त कर ख्याति प्राप्त की।
गृह कार्य की शिक्षा
नारी शिक्षा के अन्तर्गत नारी को गृह कार्य की शिक्षा
अनिवार्य रूप से आवश्यक थी। प्रत्येक स्त्री को गृह कार्य का सम्पूर्ण ज्ञान होना
आवश्यक था। फूलों की मालाएं बनाना, प्रसाधन तैयार करना, सज्जा का कार्य धनिक परिवारों में दासियाँ किया
करती थी। लेकिन साधारण परिवार में ये सारा कार्य स्वयं परिवार की महिलाएं करती थी।
पति के सारे प्रसाधनों की पूरी व्यवस्था पत्नी ही करती थी। कन्याएं अपने पिता के
घर में ये शिक्षाएं प्राप्त कर लेती थी जिससे पतिगृह में जाकर वह श्रेष्ठ पत्नी
सिद्ध हो सके। वात्स्यायन ने चौसठ योगिनी विद्याओं की शिक्षा देते हुए कुशल गृहिणी
की विशेषताओं का उल्लेख किया है। गृह विज्ञान के अन्तर्गत सिलाई-कढ़ाई की भी शिक्षा
दी जाती थी। वात्स्यायन ने संगीत और चित्रकलाओं का ज्ञान नारी के लिए ही वांछनीय
माना है। राजकुमारियों की योग्यता की परख उनके नृत्य परीक्षा द्वारा भी होती थी।
ललित कला की शिक्षा का उत्तम प्रबंध था, इसके पर्याप्त प्रमाण हमें मिलते है। कुलीन
परिवार की स्त्रियों की तरह निम्न परवार की स्त्रियाँ मनोरंजन के लिए ललित कलाओं
में रूचि नहीं लेती थी बल्कि इन कलाओं द्वारा वह अपने पिता या पति के सहायता के
लिये अर्थार्जन करती थी।
नारियों में धार्मिक शिक्षा
नारियों को अनिवार्य रूप से धार्मिक शिक्षा भी दी जाती थी।
ईश्वर का पूजन तो सामान्य बात थी लेकिन कन्याएं अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए
कठिन तप जिसमें अनेक धार्मिक नियमों का पालन करना पड़ता था, वह करती थी। भुवना ने समस्त आसक्ति से रहित योग
में सिद्धि प्राप्त की और पूरे पृथ्वी का भ्रमण किया। कन्याओं को नैतिक शिक्षा दी
जाती थी। उन्हें पत्नी के कर्तव्यों का बोध करा दिया जाता था। यह नैतिक शिक्षा का
परिणाम है कि उस समय पुरूषों की तरह ही स्त्रियों ने भी यश प्राप्त किया और इन
स्त्रियों की संख्या भी कम नहीं थी।
नारी का शिक्षक एवं गुरू रूप
ऐतरेय और कोषितकी ब्राह्मणों से यह विदित होता है कि
प्राचीन काल में महिलाएं शिक्षिका भी होती थी। आश्वलायन गृहसूत्र से भी यह ज्ञात
होता है कि नारी शिक्षक के रूप में शिक्षिका का पद सुशोभित करती थी। पूर्व काल में
जिस समय बड़ी संख्या में नारियाँ अध्यापन का कार्य भी कर रही थी। संस्कृत साहित्य
में उपाध्याय एवं उपाध्यायी शब्दों का प्रयोग किया गया है। उपाध्याय की पत्नी को
सम्मान के तहत उपाध्यायनी कहा जाता था। किन्तु उपाध्याया विदुषी नारियों को कहा
जाता था, जो अध्यापन के
कार्य में लगी रहती थी। आश्वलायन गृहसूत्र में तीन शिक्षिकाओ का उल्लेख किया है।
गार्गी, वाचक्नवी, बड़वा। पाणिनी के समय में स्त्रियाँ अध्यापिकाएँ
होती थी। अतः उन्होंने अध्यापन कार्य करने वाली को आचार्या और उपाध्याया नाम दिया
है। अनेक महिलाएँ शिक्षिका बन कर अध्यापिकाओं का जीवन व्यतीत करती थी। जो अपना
शिक्षण कार्य उत्साह और लगन के साथ निष्ठापूर्वक सम्पन्न करती थी। इनकी अलग
शिक्षाशालाएं हुआ करती थी। जहाँ महिलाएं जाकर शिक्षा ग्रहण करती थी। ऐसी महिला
शिक्षण संस्थाओं का प्रबंध उपाध्याएं ही करती थी। पतंजलि ने औद्यमेध्या नामक
आचार्य का उल्लेख किया हैं उनमें पढ़ने वाली छात्रा औदमेघा कहलाते थे। छात्राओं को
शिक्षा प्रदान करने के लिए छात्राशाला हुआ करती थी।
वात्स्यायन ने स्त्रियों के लिए अंग विद्याओं के अध्ययन
करने का उल्लेख किया है। इन्होंने संगीत और नृत्य को भी स्त्री के लिए अनिवार्य
माना। राजश्री को नृत्य और संगीत की पूरी शिक्षा प्राप्त थी। उसने उपाध्याया, उपाध्यायी, आचार्या आदि का उल्लेख किया है। यद्यपि मनु, याज्ञवल्क्य, यम आदि स्मृतिकारों ने स्त्री शिक्षा पर
प्रतिबंध लगा दिया तथा उनके उपनयन में वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी बन्द कर दिया।
बाद में उनका उपनयन भी बन्द कर दिया गया। साधारण परिवारों में तो बाद में शिक्षा
का प्रसार बिल्कुल अवरूद्ध हो गया था, किन्तु उच्च परिवारों और राजघरानों में शिक्षा
का प्रचार पूर्ववत था। नारी शिक्षा के दो रूप थे। एक आध्यात्मिक और दूसरा
व्यावहारिक। आध्यात्मिक ज्ञान में वृहस्पति भगिनी भुवना अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला मेना धारणी, सतरूपा आदि कन्याओं के नामों का उल्लेख है जो
ब्रह्मवादिनी थी। प्रागैतिहासिक काल से ही साहित्यिक और व्यावसायिक हर प्रकार की
शिक्षा की व्यवस्था परिवार में ही होती थी। ऐसी व्यवस्था में सम्भवतः सगे भाई-बहन
तथा चचेरे भाई-बहन सम्मिलित होकर अपने परिवार के सबसे वरिष्ठ शिक्षित व्यक्ति से
शिक्षा पाते थे। लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा के क्षेत्र में वृद्धि हो जाने के कारण लोगों
की रूचि शिक्षा के प्रति बढ़ने लगी और इसके लिए परिवार में पायी गयी शिक्षा
पर्याप्त नहीं थीं अतः ज्ञानपिपासुओं को ज्ञान प्राप्ति के लिए बाहर जाना पड़ा। इस
तरह बाहर जाने वाले छात्रों की तरह छात्राएँ भी शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरूकुल
तथा दूरस्थ शिक्षण संस्थान में जाने लगी। लेकिन उसके उदाहरण बहुत कम हैं। संभवतः
जब समाज में योग्य नारी शिक्षक उपलब्ध रही जाती होगी तब उन्हीं के संरक्षण में
कन्याओं को भेजा जाता रहा होगा। किन्तु नारी शिक्षक के अभाव में बाध्य होकर आचार्यों
के पास पुत्रियों को शिक्षा प्राप्ति के लिए भेजना पड़ता होगा। उस काल में गंधर्व
विवाह समाज में असामान्य न था। सह शिक्षा में कन्याओं के अभिभावकों को कोई आपत्ति
नहीं रहती थी। किन्तु बाद में सह शिक्षा का परिणाम कभी-कभी गंधर्व विवाह में बदला
जाता था और इससे कन्याओं का नैतिक पतन की संभावना बढ़ने लगी थी। अतः लोग कन्याओं के
लिए घर पर ही शिक्षक नियुक्त करके कन्याओं का उच्च शिक्षा दीक्षा का प्रबंध करने
लगे। हारित ने व्यवस्था की है कि कन्याओं की शिक्षा घर पर ही पिता, चाचा, भाई के द्वारा होनी चाहिए। इसी प्रकार मनु ने भी
कन्याओं का पुरूष के साथ अध्ययन करने के लिए घर से बाहर भेजने का पक्ष नहीं दिया।
उस समय छात्राओं का कितना प्रतिशत सह शिक्षा ग्रहण करता था। यह अस्पष्ट है किन्तु
निश्चय ही यह संख्या अधिक नहीं थी।
संदर्भ ग्रन्थ सूची
* ऐतरेय ब्राह्मण-।।, 2
* आर्य भारतीः स्मृति में नारीः पृ0-16
* नदवी, अरब और भारत के संबंध, पृ0 – 122
* आश्वालायन गृहसूत्र 3,4
* पतंजलि 3,8,22
डॉ० दिनेश कुमार गुप्ता
सहायक आचार्य, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय,
गंगापुर सिटी (राज.) 322201
दूरभाष सं. 9462607259
Mail: dineshg.gupta397@gmail.com

