सावन
ऋतु
नहीं
ब्रह्म
की खुली हुई पलक है।
उसकी
प्रत्येक बूँद
आकाश
का आत्मस्वीकृत अश्रु है,
जो
पृथ्वी के अंतःकरण पर गिरकर
स्मृति
को अंकुरित करता है।
काशी
मानचित्र
का नगर नहीं,
चेतना
की वह शिरा है
जहाँ
समय अपना स्पंदन सुनता है।
शिव
प्रतिमा
में नहीं रहते;
वे
उस रिक्ति में हैं
जहाँ
'मैं' का
अंतिम अक्षर
स्वयं
मिट जाता है।
गंगा
जल
का प्रवाह नहीं,
अंतर
की अनकही प्रार्थना है,
जो
प्रत्येक तट से पूछती है
"क्या
तुम स्वयं तक पहुँचे?"
घंटियों
की ध्वनि
आकाश
में नहीं गूँजती;
वह
मनुष्य के भीतर जमी
संशयों
की बर्फ़ पर
धीरे-धीरे
पड़ती धूप है।
भीड़
विश्वास
का प्रमाण नहीं;
कभी-कभी
वह
अपने
ही रिक्त होने का उत्सव भी होती है।
किन्तु
एक
वृद्ध साधु की मौन दृष्टि
सहस्र
प्रवचनों से अधिक
समाज
का मनोविज्ञान पढ़ लेती है।
सावन
की हरियाली
वृक्षों
पर कम,
थके
हुए संबंधों में अधिक उगती है।
भस्म
विनाश
का चिह्न नहीं,
अहंकार
के दाह-संस्कार का
श्वेत
हस्ताक्षर है।
त्रिशूल
हिंसा
का आयुध नहीं,
इच्छा, भय
और मोह
इन
तीन गाँठों को भेदने वाली चेतना है।
डमरू
की लय में
सृष्टि
यह स्वीकार करती है
कि
मौन भी
ध्वनि
का ही अनंत विस्तार है।
काशी
की गलियाँ
बाहर
जितनी संकरी हैं,
भीतर
उतनी ही अनंत।
वहाँ
मृत्यु
समाप्ति
नहीं कहती;
वह
जीवन के बंद द्वार पर
मुक्ति
का दीप रख देती है।
और
तब
शिव
कहीं बाहर नहीं मिलते
वे
उसी क्षण प्रकट होते हैं
जब
मनुष्य
अपने
भीतर की काशी में
सावन
बनकर बरसने लगता है।
शिव
कौन है।
(एक
मुक्त छंद कविता)
शिव
कोई नाम नहीं
वे
नामों के पूर्व का निःशब्द स्पंदन हैं।
वे
कैलास पर बैठे योगी भर नहीं,
वे
उस शिखर की निस्सीमता हैं,
जहाँ
अहं का अंतिम हिमकण पिघल जाता है।
वे
त्रिनेत्र नहीं,
वे
वह दृष्टि हैं
जो
समय के आर-पार स्वयं को देखती है।
वे
संहार नहीं करते,
वे
केवल असत्य के आवरण उतारते हैं,
जैसे
प्रातःकाल अंधकार को निर्वस्त्र कर देता है।
गंगा
उनकी जटा में नहीं बहती,
वह
चेतना की ऊर्ध्वगामी धारा है,
जो
भीतर के मरुस्थल को तीर्थ बना देती है।
नीलकंठ
होना विष पी लेना नहीं,
दूसरों
के दुःख को
करुणा
के मौन में रूपांतरित कर देना है।
डमरू
की ध्वनि किसी वाद्य का स्वर नहीं,
वह
सृष्टि और शून्य के बीच
धड़कता
हुआ आदिम उच्चार है।
शिव
वहीं प्रकट होते हैं
जहाँ
'मैं' का
अंतिम कण भी भस्म हो जाता है;
और
जो शेष रहता है,
वही
सत्य है, वही
चैतन्य है, वही
अनंत है;
उसी
अनाम आलोक को
ऋषियों
ने श्रद्धा से शिव कहा।
संजय तिवारी,
रिटायर्ड प्राध्यापक
वाराणसी, उत्तर
प्रदेश।

