विकल पत्तों पर थिरकती ये चंचल हवाएँ
कतरा-कतरा यूँ पिघलती श्यामल घटाएँ
शिकवा कोई दिल का उन्हें भी जा सुनाये
के भुला चुके जो, इस कद्र याद न आएं।
बेबस तलाशती हर पल ये सूनी निगाहें
खो दिए कभी जहाँ तुम्हें, वही वीरान राहें
बेरहम-बेदर्दी,
हुये क्यों तुम ऐसे पराए
उम्मीदें उड़ी,
आ बैठे मायूसी के साये।
ओ निर्मोही,
आवाज़ देती हैं यह सर्द आहें
लरज़ता यह दिल,
तरसती यह खुली बाहें
अब के लौटे तो,
बेशक, रिहाई न पाओगे
कसम से, लाख
बना लेना तुम बहाने चाहे।
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--बिमल सहगल
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