निर्मोही

अरुणिता
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विकल पत्तों पर थिरकती ये चंचल हवाएँ

कतरा-कतरा यूँ पिघलती श्यामल घटाएँ

शिकवा कोई दिल का उन्हें भी जा सुनाये

के भुला चुके जो, इस कद्र याद न आएं।

 

बेबस तलाशती हर पल ये सूनी निगाहें

खो दिए कभी जहाँ तुम्हें, वही वीरान राहें

बेरहम-बेदर्दी, हुये क्यों तुम ऐसे पराए

उम्मीदें उड़ी, आ बैठे मायूसी के साये।

 

ओ निर्मोही, आवाज़ देती हैं यह सर्द आहें

लरज़ता यह दिल, तरसती यह खुली बाहें

अब के लौटे तो,  बेशक,  रिहाई न पाओगे

कसम से, लाख बना लेना तुम बहाने चाहे।

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--बिमल सहगल

ई 602, पंचशील अपार्टमेंट्स, प्लॉट 24, सैक्टर 4, 

द्वारका, नई दिल्ली -110078

मोबाइल:  9953263722, 

ईमेल : bimalsaigal@hotmail.com

 

 

 

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