पत्ते पेड़ से गिरें और उन्हें धरती का सहारा न मिले,
कोई जान से जाए और उसे अर्थी का सहारा न मिले!
साफ़ ज़ाहिर है, ये नाइंसाफ़ी का सिलसिला है, दोस्त,
कुश्ती लड़नी हो अखाड़े में और फुर्ती का सहारा न मिले!
बेघर को फिर बेघर करने का यह कैसा क्रूर क़दम,
किसी का घर हो यादों पर और स्मृति का सहारा न मिले!
इक माँ बच्चों को कैसे सँभाले और क्या जवाब दे भला,
मायका दरवाज़ा बंद कर दे और पति का सहारा न मिले!
सब कुछ दाँव पर लगा के जब खिलाड़ी उतरे दौड़ में,
जीतना जान से ज़रूरी हो और गति का सहारा न मिले!
ये सारी बातें तो ऐसी हैं जैसे कि किसी को,
अँधेरा घेर कर बैठा हो और ज्योति का सहारा न मिले!
कवि घनश्याम साहू
हिंदी कवि एवं लेखक
