दीपगीत

अरुणिता
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 ज्योति कलश उतार दें

 जलता जब नन्हा दीपक, 

आँगन का तम हरता।

 

जगमग-सी द्वार-देहरी,

बिखरे झिलमिल तारे।

आलोकित दीपशिखा से , 

हारे यह अंधियारे।

पथ में फैला तिमिर घना,

अंतस उजास भरता। 

 

सूरज से लें ज्योति कलश, 

धरती पर उतार दें। 

अंधेरा ना रहे शेष,

दीपधन उपहार दें। 

मंद-मंद ऐ दीपक जल, 

धरा से तमस छटता। 

 

जो यहाँ उदास चेहरे, 

हम उन्हें मुस्कान दें।

नाउम्मीद जिंदगी को, 

आशा का जहान दें।

अब भी शेष है उम्मीद,

तिमिर सदा कब रहता।

 

नलिन खोईवाल 

376-ए, सुदामा नगर,

इंदौर-452009 मध्य प्रदेश 

9425926840

  

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