वामा

अरुणिता
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आज भी रंजना ने अपनी बेटी और बेटे को स्कूल भेजकर, अर्पित व अपने लिए चाय बनायी। अर्पित की चाय बिस्तर पर ही दे आयी और अपनी रसोई में ही रख ली। सब्जी काटते हुए पी लेगी, ऐसा सोंचते हुए, क्योंकि अभी कुछ देर में पति को नाश्ते की जल्दी होने लगेगी। वह नौ बजे ही ऑफिस को कूच कर जाते हैं।
यही सोच वह आलू निकाल कर छील ही रही थी कि उसी समय दरवाजे पर घण्टी की आवाज आयी, और उसकी तन्द्रा टूट गई। अब उसे ही खोलने जाना पड़ेगा, क्योंकि पति तो अभी तक सो कर भी नहीं उठे थे।
दरवाजा खोला तो सामने नेहल को देख कर चौंक गई। ‘‘इतनी सुबह सुबह तुम कहां से आ गईं।’’
‘‘अरे भाभी अन्दर तो आने दो बताती हूं सब कुछ।’’
वह अन्दर आयी और दालान में पड़े तखत पर अपना बैग रखकर बैठ गयी।
‘‘हां भाभी, अब बताओ और पूछो, क्या पूछ रही हो और हॉं पहले एक गिलास पानी लेती आओ’’।
वह ट्रे में एक गिलास पानी व एक प्लेट में थोड़ा पेठा लेकर उसके पास आयी। नेहल ने पानी पीकर कहा, ‘‘भाभी आज यह फिर सुबह से पी कर आ गये, तो मैंने बैग उठाया और यहां पर चली आयी।’’
‘‘बच्चे कहां हैं।’’
‘‘घर में ही हैं।’’
‘‘क्यों स्कूल नही गये आज?’’
‘‘कौन भेजता उन्हें, सुबह से तो क्लेश फैला दिया था घर में।’’
‘‘अब तुम्हारे हिस्से का सारा काम तुम्हारी बेटी को ही झेलना होगा।’’
‘‘झेलने दो; बेटी भी तो उसी की है।’’
‘‘कैसी मां है यह, जिसे अपनी बेटी की तक परवाह नही।’’ रंजना ने मन में सोंचा, फिर बोली, क्या तुम्हारी बेटी नहीं है वह?’’ इस बात का कोई जवाब न देकर उसने पेठे का एक छोटा सा टुकड़ा उठाया और मुंह में डाल लिया।
रंजना किचन में जाकर अधकटी सब्जी को काटने लगी। तब तक उसकी चाय भी बिल्कुल ठण्डी हो गयी थी। उसने चाय गर्म करने को भगौने मे डाल कर गैस पर चढ़ा दी। उसमें उसने आधा कप दूध और डाल दिया, ताकि वह और नेहल दोनों पी लेंगी।
तब तक उसके पति भी बाहर आ गये थे।
‘‘नेहल कहां से आ रही हो?’’ वे मुस्कुराते हुए उससे बोले।
‘‘घर से ही आ रहीं हूँ ।’’ उसने भी हंसते हुए उत्तर दिया।
‘‘तो क्या आज फिर दारू?’’
‘‘जी हां, वही दारू का झगड़ा, वह पीना तो छोड़ेंगे नही,लगता है मैं ही उन्हें छोड़ दूंगी।’’
‘‘अरे! नेहल ऐसा गज़ब नहीं करना, वरना शर्मा जी का क्या होगा।’’
यह सुन नेहल मुस्कुरा भर दी थी।
नेहल बेहद खूबसूरत महिला थी, लगभग 32 वर्ष की। एकदम दुबली-पतली छरहरी काया, घुटनों तक लम्बे बाल, जब वह बालों को गूंथ कर उसकी चोटी बनाती है, तो काली नागिन की तरह लहराती हुई उसकी चोटी कमर के इर्द गिर्द घूमती, तो बेहद खूबसूरत लगती।
वह कुछ बाल अपने चेहरे पर भी छितरा लेती। इससे उसकी सुन्दरता कुछ और बढ़ जाती। तीखी खड़ी सीधी नाक, भूरी आंखें, चेहरे का गेंहुआ रंग, चौड़ा सा माथा; उस पर जब वह बड़ी सी लाल बिन्दी लगाती, तो चेहरे की सुन्दरता कुछ और बढ़ जाती। आंखों में काजल, सिन्दूर भरी मांग, कानों में झुमके और जब वह मुस्कुराती हुई बात करती तो, दॉंतों की सफेद पंक्तियां चमचमाती हुई दिख जातीं और गालों में पडते गढ्ढे उसकी मुस्कान की शोभा दुगुनी कर देते।
पति, दो बेटे, एक बेटी पूरी बसी बसाई गृहस्थी, सब सुख था। बस कमी थी, तो सिर्फ पति के शराब पीने की, वह हमेशा मना करती, रोकती, टोकती, झगड़ा करती तो कभी प्यार से भी समझाती पर उन्हें कोई फर्क न पड़ता, रोज झगड़ा करता और हाथ भी उठा देता। मोहल्ले के सबसे अच्छे मकानों में उसका मकान था। नौकरी भी अच्छी थी। बावजूद इसके दो-दो पैसों की कन्जूसी करता। घर में खाने को तक लाकर न रखता था। कन्जूसी क्या करता? जो भी पैसे कमाता वो सब शराब में ही उढ़ा देता। फिर शराब पीने वालों की यारी दोस्ती भी होती है, तो कुछ बचता ही न था।
मकान पुश्तैनी था। दो भाइयों का हिस्सा था,अकेले का होता; तो उसे भी बेच बॉंच कर कब का पी गया होता।
अब तो नेहल शाम तक यहीं रहेगी। साथ ही पति भी उसका साथ देने को छुटटी लेकर बैठे रहेंगें। अक्सर ऐसा ही होता है । वह तो ज्यादा बातें करती नहीं, फिर उसके जिम्मे हजारों काम हैं। जो सुबह से लेकर रात तक निपटते ही नहीं। जब थोड़ी फुरसत मिलती तो कुछ देर आराम कर लेती है ।
वैसे तो राजीव के पास समय नहीं होता; लेकिन जहां औरतों को देखा नही कि उनका रसिया स्वभाव जाग जाता और वह औरतों से बतरस का आनन्द लेने लगते। उसे उनकी इस आदत से बहुत परेशानी होती, लेकिन क्या करें बचपन से ही ऐसे थे। अक्सर सासू मां बताती रहतीं। मेरा बेटा तो कृष्ण कन्हैया है; इसके आगे पीछे तो हमेशा लड़कियों का जमघट लगा रहता है ।
जब बचपन से ही लड़कियों के साथ खेल कूद कर ही बड़े हुए हैं; तो अब क्या सुधरेंगें। परन्तु नेहल का आये दिन बहाने बनाकर उसके घर आ जाना और पूरे दिन रूकना, उसे जरा भी न सुहाता; लेकिन वह कर भी क्या सकती थी।
जिस दिन वह आ जाती, पति को चटकारे ले-ले कर बातें करने को मिल जाता और उस दिन उनकी ऑफिस की भी छुटटी हो जाती। नेहल के आने से उसका काम और बढ़ जाता। बार-बार चाय पानी देना, खाना भी कुछ स्पेशल बनाना पड़ता, हांलांकि वह उसे भाभी और भइया कहती थी। पर उसे उन दोनों का इस तरह आपस में बतियाना जरा भी अच्छा न लगता।
एक दिन बच्चों के स्कूल में पेरेन्ट टीचर मीटिंग थी। राजीव के सिर में दर्द होने की वजह से वह अकेले ही बच्चों के स्कूल आ गयी। वहां पर बुक फेयर लगा हुआ था; इसलिए उसे वहॉं काफी समय निकल गया।
जब वह घर पहुंची, तो देखा नेहल राजीव के सिर में तेल लगा रही है। उसके आने के बाद भी वह हटी नहीं; और राजीव भी लेटे रहे, तो उस दिन वह उसकी आंखों में बहुत खटकी; लेकिन जब रक्षा बन्धन पर राखी की थाली लेकर आ गयी, तो वह उस दिन की खुद की सोच पर ही शरम खा गई।
कि इन लोगों का तो भाई बहन का रिश्ता है; और वह उन दोंनों के बारे में न जाने क्या क्या सोचती रही।
नेहल की सुन्दरता के आगे वह कही न टिकती थी। मामूली से नाक नक्श, रंग भी सांवला, बाल छोटे-छोटे ; जब वह रबर बैण्ड से उन बालों को बांध लेती, तब उसका चेहरा बहुत ही बदसूरत लगता। इसीलिए उसकी शादी के समय बहुत परेशानियां आयी थीं। तीस बरस की होने के बाद भी कोई रिश्ता नही मिल रहा था; आखिर पैसों के आधार पर किसी तरह शादी ब्याह निपटाया गया था।
राजीव देखने में काफी अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी थे। जाब भी ठीक ठाक था, लेकिन प्राइवेट कम्पनी में ही थे।
वह खूब पढ़ी लिखी और बेहद अच्छे स्वभाव की थी; लेकिन भीतर की सुन्दरता पुरूषों को कहां नजर आती है; उन्हें तो ऊपरी आकर्षण ही लुभाता है और दिखावे की सुन्दरता पर मर मिटते हैं, ---घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है उन्हें तो।
धीरे-धीरे नेहल का रोज उसके घर पर आने का नियम बन गया और राजीव का ऑफिस से छुटटी लेने का; आखिर प्राइवेट जॉब कब तक चलती। एक दिन ऑफिस से अल्टीमेटम मिल गया। आदत से मजबूर राजीव ने फिर भी छुटटी लेना बन्द नहीं किया; और फिर अच्छी भली नौकरी से राजीव को हाथ धोना पड़ा था।
अब तो उन्हें घर में ही रहने का बहाना मिल गया था। उसने बहुत कोशिश की, परन्तु कुछ सम्भव न हुआ; आखिर उसने टोका टोकी बन्द कर दी।
वह जब जॉब ढूढंने को कहती तो राजीव घर में कलेष फैला देता। एक औरत ने दो घर बरबाद कर दिये थे।
नेहल ने वह कहावत चरित्रार्थ कर दी, कि ----
‘एक औरत ही अगर चाहे तो घर को बना दे और एक औरत चाहें तो घर को बिगाड़ दे।’
नेहल ने अपने घर परिवार के साथ उसके घर को भी बरबाद कर दिया था।
आखिर तंग आकर एक दिन वह बच्चों को साथ लेकर मायके आ गयी। वहां जब सबको बातें पता चलीं; तो मॉं ने साफ कह दिया; अब तुम यहीं आराम से रहो कोई जरूरत नहीं वहां जाने की।
भइया तो साथ दे रहे थे, किन्तु भाभी मौका लगने पर ताना मारने पर न चूंकती।
राजीब ने इस बीच नेहल को घर में ही रख लिया था।
राजीव ने केवल दो कमरों को छोडकऱ बाकी का पूरा घर किराये पर उठा दिया। किराये से इतना पैसा आ जाता कि खाने पीने का खर्चा आराम से चल रहा था। एक महीनें में राजीव ने एक बार भी उसकी सुध नहीं ली थी। उन दोनों ने भाई बहन के रिष्तों को कलंकित कर दिया था।
आखिर मायके में भी कब तक रहती, पिता तो थे नही, भाभी के तानों से तंग आकर बच्चों को साथ ले वह वापस लौटकर घर आ गयी ; उसने वहॉं देखा नेहल रसोई में चाय बना रही है और राजीव वहीं कुर्सी डाले बैठा है। दोंनों को इतना क्लोज़ देख वह दंग रह गयी। किसी भी महिला को इस प्रकार दूसरी महिला का अपने किचन में आना शायद ही रास आये। देखा जाये तो वह स्वाभाविक भी है।
अपने परिवार, माता-पिता और भाई-बहन सब छोड़कर, अपना जीवन समर्पित कर देती है, तो पति का इतना फर्ज तो बनता ही है कि एक पति होने के नाते अपना फर्ज निभाये। पत्नी को उसका हक मिले। आज तो नित वर्जनाएं टूट रहीं हैं, परिवार बिखर रहे हैं। एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की दुश्मन बन गई है।
अपनी खुशी के लिए दूसरों को क्यों दुख दिया जाता रहा है और वह तो स्वयं ही विवाहित है उसका पति हैं, बच्चे हैं, तब भी एक औरत का दर्द क्यों नही समझ पाई आखिर क्यों उसका ही घर बरबाद करने पर तुल गयी, वह उसे अपनी ननद मानती आई, मान देती आई, फिर उसने पवित्र रिश्तों को तार तार किया क्या उसकी समझ में रिश्तों की कोई भी मर्यादा नही थी।
अब वह पछता रही , कि क्यों एक महीने के लिए गयी। उसे लौटकर तो यही आना पड़ा। सच ही कहा गया है कि----
‘कुंवारी लड़कियों को तो एक बार घर में रखा जा सकता है, पर शादी शुदा के लिए कोई जगह ही नहीं बचती, उन्हें तो विदा करके पराया कर दिया जाता है। अपने हिस्से के दुखों को झेलने के लिए, अनजानों के बीच अकेला छोंड़ देते हैं। कहते हैं कि
औरत की डोली जब मायके से निकल जाती है तब ससुराल से अर्थी में ही निकलती है | न जाने ऐसी रीतें क्यों बनायीं गयी हैं |
उसके मायके जाने के बाद पीछे से एक महीने में ही नेहल ने अपनी पकड़ उसके घर और राजीव पर पूरी तरह से जमा ली थी। न जाने कैसी औरत है, जिसे अपनी इज्जत की परवाह ही नहीं। न परिवार व पति के मान सम्मान की परवाह। यहॉं तक की अपनी जवान बेटी की भी परवाह नहीं रही उसे। वह क्या सीखेगी अपनी मॉ से। कल को वह भी यही सब करेगी। आखिर बच्चें अपने मॉं बाप से ही तो सीखते हैं। जैसा घर में देखते हैं, वे वैसा ही करते हैं।
नेहल ने उसके लिए भी चाय बना ली थी , किन्तु उसने चाय न पी। वह अपना सामान लेकर सीधे अपने कमरे में आ गयी। पूरे कमरे में नेहल के कपड़े फैले पड़े और पूरा कमरा अस्त व्यस्त हालत में । उसने नेहल के कपड़े उठाये और कमरे से बाहर ले जाकर एक तरफ रख दिये, और बैड की चादर बदलकर, अपना व बच्चों का सामान रख लिया ।
बच्चे तो आते ही खेलने में मस्त हो गये । बचपन कितना प्यारा होता है। एक दम निर्दोष छल, कपट व दुनियावी बातों से बेखबर। उन्हें इस बात की फिक्र ही कहां होती है, कि आस पास क्या घटित हो रहा है।
रंजना ने ठान लिया । अब उसे यहीं रहकर सामना करना होगा, लड़ना होगा अपने व बच्चों के हक के लिए। बगावत करने से या परिस्थियों से भागने से काम नहीं चलेगा। उसे सच्चाई का सामना करना होगा। घर तो उसका ही है और राजीव की पत्नी होने का हक तो अभी भी उसी का है। अबैध रिश्ता कब तक चलेगा। अब वह समझौता नहीं करेगी कभी नहीं। तभी जी पायेगी। उसका और उसके बच्चों का हक ज्यादा है, वह तो उसकी ब्याहता है, आखिर उसका भी तो घर है। जायेगी तो फैसला करके ही। इतनी तो हिम्मत दिखानी ही होगी कमजोर पड़ने से काम नही चलेगा, उसे मजबूत बनना ही होगा।

सीमा असीम, सक्सेना
9458606469







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