हाइकु शतदल

अरुणिता
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संवेदना और अनुशासित शिल्प का अनुपम महासंगम : ‘हाइकु शतदल’
पुस्तक का नाम : हाइकु शतदल
संपादक : श्री प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’
विधा : हाइकु
प्रकाशक : उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ
प्रकाशन वर्ष : 2026
कुल पृष्ठ : 630 रुपए
मूल्य : 1000.00

‘हाइकु शतदल’ का सम्पादन एवं प्रकाशन नि:संदेह एक ऐतिहासिक साहित्यिक कार्य है । ऐतिहासिक इसलिए कि यह केवल हाइकु की पुस्तकमात्र नहीं, बल्कि संभवतः हिंदी साहित्य की किसी भी विधा में अपनी तरह का अनूठा संकलन है, जिसमें देश-विदेश के 102 रचनाकारों के 100-100 यानी कुल मिलाकर दस हजार दो सौ से भी अधिक हाइकु एक साथ संकलित किए गए हैं । पुस्तक के आवरण पर दस स्मृतिशेष हाइकुकारों के उत्कृष्ट हाइकु को स्थान देकर संकलन ने अपनी साहित्यिक गरिमा को और भी बढ़ाया है । यानी एक ही पुस्तक में शताधिक रचनाकारों के हजारों हाइकु और वह भी 630 पृष्ठों में सुव्यवस्थित रूप से सजाकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना निश्चित रूप से असाधारण और श्रमसाध्य कार्य है । इस कठिन और महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दायित्व को अपने समय, श्रम, लगन और साहित्य-प्रेम से संभव कर दिखाया है सरस्वती के अनन्य साधक श्री प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’ जी ने ।
छत्तीसगढ़ के एक दूरस्थ गाँव साँकरा (जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़) से साहित्यिक यात्रा शुरू करने वाले प्रदीप कुमार दाश की हाइकु पर आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । वे हाइकु मंजूषा पत्रिका के संपादक भी हैं । उन्हें विश्व हिन्दी साहित्य में प्रथम सेनर्यूकार होने के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम हाइकुकार होने का गौरव भी प्राप्त है । हाइकु के प्रति उनकी दीर्घ साधना, निष्ठा और प्रतिबद्धता इस विराट संकलन के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुभव की जा सकती है । पाठकों के लिए एक ही पुस्तक में शताधिक रचनाकारों की महज 5-7-5 वर्ण-विन्यास में रचे गए मुक्त हाइकु छंदों को पढ़ने का अनुभव अत्यंत आनंददायक और समृद्ध करने वाला है ।
संकलन ‘हाइकु शतदल’ ‘यथा नाम तथा गुण’ को चरितार्थ करती है । शतदल अर्थात सौ पंखुड़ियों वाला कमल । इस साहित्यिक कमल की प्रत्येक पंखुड़ी अर्थात हाइकुकार अपने आप में विशिष्ट हैं ।
कहा जाता है - “साहित्य समाज का दर्पण है ।” साहित्यकार अपने आसपास के जीवन, समाज, प्रकृति और परिस्थितियों को जिस रूप में देखता और अनुभव करता है, उसे अपनी रचनात्मक संवेदना के माध्यम से अभिव्यक्त करता है । ‘हाइकु शतदल’ का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ ही साथ विदेशों में रहने वाले रचनाकार भी शामिल हैं । इनमें नवोदित रचनाकारों से लेकर वरिष्ठ और स्थापित साहित्यकारों तक की उपस्थिति है । आयु, अनुभव, परिवेश और दृष्टि की यह विविधता संकलन को बहुरंगी बना देती है । प्रत्येक रचनाकार की अपनी अलग संवेदना, अपनी भाषा और अपना जीवनानुभव होता है । परिणामतः एक ही पुस्तक में इतनी भिन्न-भिन्न रचनात्मक दृष्टियों को पढ़ना एक सुधि पाठक के लिए अत्यंत रोचक और विचारोत्तेजक अनुभव बन जाता है ।
संग्रह के अनेक हाइकु पाठक को भीतर तक स्पर्श करते हैं और उसे कुछ क्षण ठहर कर सोचने के लिए विवश कर देते हैं । उदाहरण के लिए डॉ. आनंद प्रकाश शाक्य का ये हाइकु देखिए, “जली लड़की / दहेज की चीता में / जैसे लकड़ी ।” महज 17 अक्षरों में कवि हमारे समाज में व्याप्त दहेज प्रथा की अमानवीय क्रूरता पर गहरा कटाक्ष करते हुए लड़की को सूखी लकड़ी की तरह जलाए जाने का मर्मस्पर्शी बिम्ब पाठकों की संवेदना और सामाजिक चेतना को झकझोर कर रख देती है ।
कुछ इसी प्रकार की ही भावाभिव्यक्ति वरिष्ठ हाइकुकार सुनीता दीक्षित ‘श्यामा ने अपनी एक हाइकु में कुछ इस प्रकार से की है – “नाजुक कली / सूनी सड़कों पर / कुचली मिली ।” स्त्री-सुरक्षा और सामाजिक संवेदनहीनता की एक भयावह तस्वीर हमारे सामने रख देता है । ‘नाजुक कली’ का बिंब मासूमियत और कोमलता का प्रतीक बनकर उभरता है, जबकि ‘कुचली मिली’ उस मासूमियत के निर्मम अंत की पीड़ा को व्यक्त करता है ।
श्री आरविली आशेन्द्र लूका का हाइकु “बढ़ी गरमी / इंसान जल रहा / इंसान से ही ।” - आधुनिक समय में मानवीय संवेदनाओं के ह्रास और बढ़ती ईर्ष्या-द्वेष पर करारा चोट करते हुए अपने भीतर एक गहरा सामाजिक संदेश और तीखा व्यंग्य समेटे हुए है । यहाँ ‘गरमी’ केवल मौसम की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बढ़ती वैमनस्यता की भी प्रतीक बन जाती है ।
इंदिरा किसलय जी का एक हाइकु है – “अक्षम रवि / नैनों से जलकण / चुनता कवि ।” इसमें इंदिरा जी ने गागर में सागर भरने की सार्थक कोशिश की है । जहाँ न पहुँचे कवि वहाँ पहुँचे रवि । यहाँ पर 'अक्षम रवि' (कमजोर या ढलते सूर्य) के माध्यम से यह दिखाया है कि जब बड़ी व्यवस्थाएँ या परिस्थितियां दु:खों को दूर करने में नाकाम हो जाती हैं, तब कवि आगे आता है, जो 'नैनों से जलकण' (आँसू) चुनकर समाज के छिपे हुए दर्द और आंसुओं को अपनी कविताओं में समेटने का भावुक प्रयास करता है ।
कमलेश भट्ट ‘कमल’ का एक हाइकु उल्लेखनीय है, जिसमें आधुनिक मानव के स्वभाव को बेहद ही अनोखे अंदाज में प्रस्तुत किया है, “ऐसे ही नहीं / बेचकर जमीर / हुए अमीर ।” उनकी प्रदूषण पर चिंता प्रकट करने का अंदाज भी कम निराला नहीं है, “पटाखे फोड़े / अपनी ही साँसों को / लगाए कोड़े ।”
स्वयं संपादक श्री प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’ का यह हाइकु पाठकों को भावविभोर कर देता है – “स्मृति में आप / हिचकियों के लिए / करना माफ ।” यहाँ कवि ने कितनी ही खूबसूरती से प्रेम, आत्मीयता, क्षमा-याचना और भावुक समर्पण को व्यक्त किया है ।
श्री पुष्कर राय जोशी का एक हाइकु उल्लेखनीय है - “हर पत्थर / भक्त की नजर से / लगे ईश्वर ।” यहाँ कवि ने भक्ति की निर्मल दृष्टि का सुंदर और भावपूर्ण चित्रण किया गया है । कुछ इसी प्रकार की भावाभिव्यक्ति वरिष्ठ हाइकुकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित ने अपनी एक हाइकु में कुछ यूँ किया है – “मानव तन / ईश्वर का मंदिर / कहता मन ।”
श्री राकेश गुप्ता ने लिखा है, “फोन ना चिट्ठी / बूढ़ी आंखें सिसकी / आई हिचकी ।” इस हाइकु में बूढ़ी आँखों की प्रतीक्षा, अपनों की याद और संवादहीनता से उपजी पीड़ा को ‘सिसकी’ और ‘हिचकी’ के माध्यम से अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया गया है । यह हाइकु आधुनिक संचार-साधनों के दौर में भी अकेलेपन की उस विडंबना को सामने लाता है, जहाँ एक छोटी-सी खबर के इंतजार में बूढ़ी आँखें बरसों तक राह देखती रह जाती हैं ।
संग्रह में अनेक हाइकु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । इनमें अजय चरणम, डॉ. अनीता कपूर, अविनाश बागड़े, डॉ. आनंद प्रकाश शाक्य, आरविली आशेन्द्र लूका, इंदिरा किसलय, कमलेश भट्ट ‘कमल’, देवेन्द्र नारायण दास, कल्पना भट्ट, कश्मीरी लाल चावला, गंगा प्रसाद पांडे ‘भावुक’, डॉ. नीलम वर्मा, प्रदीप कुमार दाश, प्रवीण कुमार दाश, पुष्कर राय जोशी, पुष्पा सिंघी, पुष्पा मेहरा, रमेश कुमार सोनी, राकेश गुप्ता, रूबी दास, डॉ. लवलेश दत्त, सुजाता दाश, सुनीता दीक्षित ‘श्यामा’ और सतीश राठी सहित अनेक रचनाकारों की रचनाएँ पाठकों का ध्यान आकर्षित करती हैं ।
हाइकु शतदल में हाइकु ही नहीं बड़ी संख्या में सेनर्यू भी शामिल हैं । आकार–प्रकार में महीन अंतर होने के कारण बहुसंख्यक रचनाकार आजकल इन दोनों को अघोषित तौर पर एक ही मानने लगे हैं । हाइकु प्रकृति और क्षणिक सौंदर्य पर आधारित तीन पंक्तियों की गंभीर साहित्यिक विधा है, जबकि सेनर्यू मानव स्वभाव, कमजोरियों और सामाजिक विसंगतियों पर आधारित एक व्यंग्यात्मक काव्य रूप है। संक्षेप में, हाइकु जहाँ बाह्य प्रकृति के दृश्यों को छूकर मन को शांत करता है, वहीं सेनर्यू अंतर्मन की मानवीय प्रवृत्तियों पर कटाक्ष कर मुस्कान बिखेरता है ।
पुस्तक का प्रकाशन उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ ने बहुत ही आकर्षक साज-सज्जा के साथ किया है । पुस्तक की डिजाईन और साज-सज्जा पर विशेष ध्यान दिया गया है । आवरण पृष्ठ न केवल कलात्मक है बल्कि उस पर दस स्मृतिशेष हाइकुकारों के उत्कृष्ट हाइकु देकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी गई है । पुस्तक का मुद्रण साफ-सुथरा है । व्याकरणिक अशुद्धियाँ लगभग नगण्य हैं । हालाँकि, इतने विशाल संकलन में कुछ तकनीकी कमियाँ रह जाना स्वाभाविक हैं । कुछ पृष्ठों पर फॉन्ट मिसमैच होने के कारण वर्तनीगत अशुद्धियाँ रह गई हैं, और कुछ रचनाकारों के एक ही हाइकु की पुनरावृत्ति हो गई है । आशा है पुस्तक कि पुस्तक के आगामी संस्करण में इन छोटी-मोटी त्रुटियों को सुधारकर इसे और अधिक परिष्कृत कर लिया जाएगा ।
एक ही कृति में इतनी बड़ी संख्या में रचनाकारों की सृजनात्मक ऊर्जा को समेटना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि है । ‘हाइकु शतदल’ केवल समकालीन हाइकु-साहित्य का दस्तावेज नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और शोधार्थियों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ-कृति है । इस ऐतिहासिक और युगांतकारी कृति के सफल प्रकाशन के लिए प्रकाशक उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ, यशस्वी संपादक श्री प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’ एवं इसमें सम्मिलित सभी भगीरथ रचनाकार बधाई और अनंत शुभकामनाओं के पात्र हैं ।
मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि ‘हाइकु शतदल’ हाइकु-साहित्य के पाठकों और अध्येताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-कृति के रूप में लंबे समय तक याद रखी जाएगी ।

डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
रायपुर, छत्तीसगढ़
9827914888

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