ग़ज़ल

अरुणिता
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जो कभी बुझती नहीं वो प्यास होती जा रही है 

ज़िन्दगी अब तो यहाँ बनवास होती जा रही है 

 

जो कभी मजबूत थी, निरपेक्ष थी, आज़ाद भी थी,  

वो क़लम अब हुक्मरां की दास होती जा रही है 

 

फख्र होता था जिन्हें ईमानदारी पर कभी, वो

बात अब ईमान की इतिहास होती जा रही है 

 

हट गई हर एक बाधा देख मेरे हौसले को

दूर थी मंज़िल वही अब पास होती जा रही है 

 

हर तरफ अब मुश्किलें, दुश्वारियाँ, बेचैनियाँ हैं 

ज़िन्दगी यूँ दर्द का अहसास होती जा रही है 

 

ना बची उम्मीद कोई और ना मक़सद है कोई 

बेमआ'नी सी यहाँ हर श्वास होती जा रही है 

 

अब कहाँ अदबी रिवायत, अब कहाँ वो महफिलें हैं 

शायरी भी आजकल बकवास होती जा रही है 

 

 

        प्रवीण पारीक 'अंशु'

राम कृपा कुंजनजदीक सेतिया पैलेसबाईपास रोड़ऐलनाबाद,

सिरसा (हरियाणा)पिन कोड - 125102

मोबाइल नंबर : 9813561237 (whats app)7015049996

ई-मेल: parveen.ellenabad@gmail.com

 

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