(ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि पर आधारित एक कल्पित कथा)
अरावली की चोटियों पर रात का अंतिम पहर ठहरा हुआ था। दिवेर की घाटी में धुंध की हल्की परत तैर रही थी। हवा में ठंडक थी, पर उसके भीतर एक अनकहा कंपन भी था—मानो धरती स्वयं आने वाले क्षण को पहचान रही हो।
भील युवक केतु ने अपने तरकश को कसकर बाँधा। उसकी उँगलियाँ हल्की काँप रही थीं। जंगल में शिकार करते समय वह कभी नहीं काँपा था, पर आज सामने शिकार नहीं—इतिहास खड़ा था।
दूर कहीं कवचों की हल्की टकराहट और घोड़ों की संयत टापें सुनाई दे रही थीं।
केतु ने आँखें बंद कीं। उसे माँ की आवाज़ याद आई। जाते समय माँ ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था—
“बेटा, तलवार की धार से पहले अपने मन को तेज करना। जीतकर लौटो तो अच्छा, पर यदि लौटो तो सिर झुकाकर मत लौटना। यह मिट्टी केवल धरती नहीं—हमारे पुरखों की साँस है।”
केतु ने मुस्कराकर पूछा था—
“माँ, डर लगे तो?”
माँ ने उसके माथे को छुआ—
“डर से भागना कायरता है, पर डर के साथ खड़े रहना ही साहस है।”
केतु ने धीरे से आँखें खोलीं। उसके भीतर का कंपन अब स्थिर हो रहा था।
प्रभात की पहली किरण पहाड़ियों को छू ही रही थी कि रणभेरी गूँज उठी। धुंध काँप गई। पहाड़ियों से तीरों की वर्षा हुई। घाटी में धूल का बादल उठ खड़ा हुआ।
केतु ने धनुष खींचा। तीर छोड़ा। उसे लगा जैसे वह केवल शत्रु पर नहीं, अपने भीतर के संशय पर भी वार कर रहा है।
तलवारों की टकराहट, घोड़ों की टापें, युद्धघोष—दिवेर जीवित हो उठा।
एक क्षण ऐसा आया जब एक भारी कवचधारी सैनिक उसकी ओर लपका। केतु पीछे हटते-हटते गिर पड़ा। सामने उठती तलवार देखकर उसका हृदय तेज़ी से धड़कने लगा।
उसी क्षण उसे माँ की आवाज़ फिर सुनाई दी—
“डर के साथ खड़े रहना ही साहस है…”
केतु ने गिरते हुए भी धनुष उठाया। तीर छोड़ा। अगला क्षण धूल और धातु की चमक में खो गया।
दोपहर तक युद्ध की दिशा बदल चुकी थी। मुग़ल चौकियाँ एक-एक कर टूट रही थीं। पहाड़ियों से सेना ने उन्हें घेर लिया था। दूर घोड़े पर खड़े महाराणा प्रताप स्थिर दिखाई दे रहे थे—मानो स्वयं धैर्य का प्रतीक हों। उनके समीप युवा अमर सिंह अग्रिम पंक्ति में बढ़ते दिखे।
केतु घायल था। बाँह से रक्त रिस रहा था। पर वह अभी भी खड़ा था।
तभी घाटी में स्वर गूँजा—
“दिवेर की चौकी गिर गई!”
क्षण भर के लिए सब स्थिर। फिर जयघोष उठा।
“एकलिंग जी की जय!”
केतु ने आकाश की ओर देखा। धूप अब तीखी नहीं, स्वर्णिम लग रही थी। उसे लगा जैसे वर्षों से रोकी हुई साँस आज मुक्त हुई हो।
संध्या धीरे-धीरे उतरने लगी। धूल बैठ चुकी थी, पर हवा में लोहे और पसीने की गंध अभी भी तैर रही थी। कहीं-कहीं घायल सैनिकों की कराह सुनाई देती थी—विजय का स्वर कभी पूर्ण नहीं होता।
केतु थककर बैठ गया। उसकी साँस भारी थी। दर्द अब शरीर से अधिक मन में उतर रहा था।
उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी—
“सिर झुकाकर मत लौटना…”
उसने धीमे से फुसफुसाया—
“माँ… आज सिर नहीं झुका… पर कितने सिर फिर कभी उठ नहीं पाएँगे।”
उसकी दृष्टि पास पड़े एक निर्जीव साथी पर ठहर गई। विजय की कीमत पहली बार उसके भीतर उतर रही थी। उसे लगा—यह दिन केवल गर्व का नहीं, स्मरण का भी है।
सूर्य क्षितिज में डूब गया। आकाश पर तारों की पहली रेखा उभरी।
अरावली शांत खड़ी रही—जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो, पर कुछ भी न कहा हो।
रात उतर आई।
दिवेर की घाटी में अब कोई रणभेरी नहीं थी—केवल हवा की धीमी सरसराहट थी।
इतिहास उस दिन को विजय कहेगा।
पर केतु के लिए वह दिन एक वचन की पूर्ति था—
माँ से किया हुआ, मिट्टी से किया हुआ।
और उस रात, घायल होते हुए भी, उसने भीतर गहरी शांति महसूस की—
जैसे लंबे संघर्ष के बाद मन ने अपने स्थान को पहचान लिया हो।
दिवेर की वह भोर केवल एक युद्ध की समाप्ति नहीं थी—
वह आत्मसम्मान की पुनर्प्राप्ति थी,
जिसे अनाम सैनिकों ने अपने मौन से लिखा।
श्योजी राम हवलदार

