थाने का माहौल वही था—जैसा एक आम भारतीय थाने का होता है—हल्का-सा आतंक, थोड़ा-सा तिरस्कार भरा गंधाता माहौल l लॉकअप के भीतर से आती किसी की मार-कुटाई की चीखें बैकग्राउंड म्यूज़िक का काम कर रही थीं। सुबह की जब्त की हुई गुनगुनी धूप में थाना इंचार्ज कुर्सी पर पैर फैलाए, कानूनी दंडे को ऐसे सहला रहे थे मानो वही उनका इकलौता पालतू जीव हो, और चाय की चुस्कियों के साथ कानून की आँखमिचौनी का आनंद ले रहे हों।
तभी एक दुबला-पतला आदमी, बिल्कुल चोरों की चाल से , थाने में घुसा। थाने में बेगारी पर चौकीदारी कर रहा एक कुत्ता उस पर भौंका—जैसे उसकी गरीबी को पहचान गया हो। वह
किसी तरह खुद को बचाता हुआ इंचार्ज के कदमों में गिर पड़ा—
“माई-बाप… मेरी रिपोर्ट लिखो…”
इंचार्ज एक दम सकपका गया ,चाय का गिलास हाथ से गिरते गिरते
बचा..हावभाव कुछ ऐसे जैसे थानेदार खुद ही
रंगे हाथों पकड़ा गया हो —
“अरे सुबह-सुबह क्या चोरी हो गया तेरा? कुछ है भी तेरे पास चोरी होने लायक?”
पास खड़े दो हवलदार—अपने आगे बढे पेट और पीछे
झुकी रीढ़ को हिनहिनाते हुए —साहब
के इस भोंडे मजाक को सदी का श्रेष्ठ हास्य सिद्ध करने के लिए गला फाड़कर हँस पड़े।
आदमी ने हिम्मत जुटाकर कहा—
“साहब… मेरे सपने चोरी हो गए हैं।”
दरोगा जी ने चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाया,
जैसे एक्स-रे मशीन से आदमी की नीयत पढ़
रहे हों—
“क्या बोला? सपने? अरे
बाबू, अपनी चीजें संभाल कर क्यों नहीं रखते? ये तेरी लुगाई है क्या भाई सपना नाम की ? अरे किसके संग भागी ? टाबरा हैं क्या तेरे.ये सपने ..अरे कहीं
खेलने गए होंगे दोस्तों के साथ—शाम
तक लौट आएँगे। तू काहे को परेशान होता है?”
फिर सिपाही से बोले—
“अरे देखो तो इस बाबड़े के सपने खो गए! इसे
सपनों की पडी है ,टुच्ची सी चीज..अब ठाणे
के इतने गिरे हुए दिन हो गए की इन सपनों की भी ऍफ़ आई आर लिखता फिरे l यहाँ हत्या, डकैती, लूटपाट, बलात्कार के मामले निपट नहीं रहे और ये
ले आया ‘सपनों’ की कहानी… चैन
नहीं है इसे!”
वह आदमी काँपते हुए भी जिद पर अड़ा रहा—
“नहीं साहब… वो सपने जो आँखों में आते थे… रोज रात को आते थे… बिना नागा… कल
रात को देखे तो गायब… सुबह
बहुत ढूँढा… मेरी
छोटी-सी झोंपड़ी में कहीं छुपने की जगह भी नहीं… बच्चों से पूछा, बीबी से पूछा… सब
मुझे पागल समझ रहे हैं…”
दरोगा ने भौंहें चढ़ाईं—
“अच्छा, पहले ये बता—ये
सपने लाया कहाँ से? कहाँ
से खरीदे? तेरी शक्ल-सूरत से तो नहीं लगता कि तू
सपने खरीद सके!”
फिर कुर्सी पर टिकते हुए गंभीर मुद्रा में बोले—
“पहले ये तय करो कि चोरी हुई भी है या
नहीं। हो सकता है ये खुद ही सपनों को बेच आया हो। आजकल सपनों का बड़ा बाजार है—मोटिवेशनल स्पीकर, रील वाले बाबा,
कोचिंग वाले—सब सपनों की थोक मंडी चलाते हैं। ऊँची बोली लगती है वहाँ।”
दरोगा फिर ठहाका मारकर बोले—
“अच्छा ये बता—असली माल था या नकली? GST भरकर लाया था या ब्लैक में उठाया था? बिल दिखा पहले! नहीं तो सीधी धारा लगेगी—‘अवैध सपना व्यापार’ की।”
फिर कानून को अपने हाथ में लेते हुए हाथों हाथ कानून की एक नयी
धारा उसे बताने के अंदाज में बोले
“देखो भैया, यहाँ रिपोर्ट लिखवाने से पहले एक जरूरी सवाल—
तुम्हारे पास सपने रखने की औकात है भी
या नहीं?
आजकल सपने बड़े लोग रखते हैं—बाकी लोग तो बस उनके सपनों की EMI भरते हैं।”
बेचारा आदमी हकलाया—
“जी… अपने थे साहब… खुद
के… किसी से उधार नहीं लिए…”
दरोगा मुस्कुराए—
“अपने थे? अरे भैया, आजकल
अपने ही अपने नहीं होते—तुम
सपनों की बात कर रहे हो! कहीं तुमने किसी और के सपने चुराकर अपने नाम से तो नहीं
चला दिए? लगता है ‘सपना सौदागर गैंग’ का सदस्य है तू!”
वह लगभग रो पड़ा—
“नहीं साहब… बचपन से पाले-पोसे थे… बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना… घर बनाने का सपना… इन्हीं को ओढ़ता-बिछाता था… इन्हीं से परिवार को दिलासा देता था…”
दरोगा ने बात काट दी—
“ओहो! बड़े भारी सपने थे! इतनी बड़ी
जिम्मेदारी उठाने की तेरी औकात नहीं। घर में जगह नहीं, जेब में दम नहीं—और सपने आसमान के! तुम लोग जीने के लिए सपने पालते हो या सपनों
के लिए जीते हो? ऐसे
जीने से तो मरना लाख गुना अच्छा है लल्लू !”
फिर थोडा पैंतरा बदला
“और सुन—अभी तक दाल-रोटी पर टैक्स था, अब सरकार जल्दी ही सपनों पर भी टैक्स लगाने वाली है। अच्छा हुआ
पहले ही निकल लिए तेरे सपने—वरना
लेने के देने पड़ जाते!”
इतने में दरोगा ने इशारा किया—दो सिपाही उसे धकेलने को आगे बढ़े।
वह आदमी लगभग टूट चुका था—
“तो साहब… मेरी रिपोर्ट नहीं लिखेंगे?”
दरोगा ने कलम घुमाई—
“रिपोर्ट तो लिखेंगे… लेकिन आरोपी तुम खुद ही बनोगे। आरोप—
‘अपने सपनों की सुरक्षा में लापरवाही’,
‘बिना अनुमति बड़े सपने देखने का
दुस्साहस’,
और ‘सपनों के काले बाज़ार में संभावित संलिप्तता’।”
तभी एक चश्माधारी पत्रकार, जो थाने के आसपास ऐसे मंडराता था जैसे मक्खी मिठाई पर, भीतर घुस आया। दरोगा का व्यवहार तुरंत
बदल गया—
“अरे रामलाल! रजिस्टर ला… रिपोर्ट लिख लेते हैं।”
फिर आदमी से बोले—
“देख भैया, रिपोर्ट तो लिख देता हूँ… लेकिन याद रखना—अगर
तेरे सपने कभी भटकते-भटकते वापस आ जाएँ, तो पहले हमें खबर करना। हम उन्हें थाने लाकर पूछताछ करेंगे—देखेंगे कहीं मिलावट तो नहीं हो गई।”
सिपाही बीच में बोला—
“दो-चार दिन थाने में बैठा देंगे—सुधर जाएँगे साले सपने भी!”
पूरा थाना ठहाकों से गूंज उठा।
और वह आदमी—
लड़खड़ाता हुआ,
लुटा-पिटा सा—अपने घर की ओर लौट रहा था ।उसे
पछतावा हो रहा था की आखिर उसने सपने रखे ही क्यूँ l
लेखक नाम: डॉ० मुकेश 'असीमित'
निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान
mobile Number -9785007828
Mail ID –drmukeshaseemit@gmail.com
पता: डॉ. मुकेश गर्ग,
गर्ग हॉस्पिटल,
स्टेशन रोड,
गंगापुर सिटी,
राजस्थान –
322201

