बनठन कर मैं खड़ी हूं आज
ना जाने तुम कब आओगे।
अपनी भोली सी सूरत
कब दिखलाने आओगे।
होली का दिन आ गया
कब रंग लगाने आओगे।
मुझको बाहों में भर कर
कब गले लगाने आओगे।
मन मेरा अब तरस रहा है
कब नजर मिलाने आओगे।
मेरे अरमानो की दुनिया
रंगीन बनाने कब आओगे।
मैं किसके संग खेलूं होली
कब समझाने आओगे।
राधा बन मैं तड़प रही हूं
मुरली की धुन कब सुनाओगे ।
अगर नहीं आए होली में
फिर तुम भी पछताओगे।
मैं तुमसे रुठ जाऊंगी
फिर तुम मना न पाओगे।
बद्री प्रसाद वर्मा अनजान
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