प्रकृति का रूप निराला,
मन को
कितना भाता है,
इतनी
सुंदर छवि पाकर,
कोयल का
मन गाता है।
बरसे जब
बूँदे छम-छम,
चेहरा
खिल-खिल जाता है,
अवनि
करती जब श्रृंगार,
नभ
कितना इठलाता है।
कागज की
नाव चले हैं ,
छप-छप
करती है चिड़िया,
पानी
में करती मस्ती,
मेरी
छोटी सी गुड़िया।
पानी
में छप-छप कर चल,
बचपन को
फिर जीते हैं,
मन को
भर चल उमंग से,
घट-घट
कितने रीते हैं।
जल घन
है जल जीवन है,
जल का
महत्व जाना है,
जल-सा
मन को दरपन कर,
तन को
कंचन पाना है।
बूँद-बूँद
जब बरसे हैं,
चेहरे
पर पड़ती छम-छम,
अंतस
खिल-खिल उठता है,
जब हो
मस्ताना मौसम।
नलिन
खोईवाल
376-ए, सुदामा नगर,
इंदौर
(मध्य प्रदेश)-452009 9425926840

