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वनस्पति जगत की कृतियों में जीवों के आकारों की कला की ओर बिमल सहगल का रुझान उनके घर के किचन गार्डन से उखाड़ी अंगूर की बेल की विचित्र आकार की जड़ को देखने से हुआ। इस जड़ के उलझे हुए पिंड से निकलने वाले रेशों ने कलाकार की सृजनातकता को पंख प्रदान किए। विभिन्न दृष्टिकोणों से उसकी लंबी जांच पड़ताल करने पर आनंदातिरेक में ऊपर हाथ उठाए एक स्त्री को सुंदर, सुघड़ आकृति प्रकट हुई। इसमें केवल उन्हें जड़ के किन्हीं बेतरतीब जा रहे, अनावश्यक विस्तार को हटाना था जिससे उसकी मनोहारी आकृति उभर कर सामने आए। इस प्रकार उनका रूझान शाखाओं और जड़ों के उलझे समूहों में विकसित हुआ जो मानव और जीव जंतुओं के आकृतियों की कलात्मक अभिव्यक्तिओं में परिवर्तित हुआ। जो आम लोगों के लिए निर्जीव, निरर्थक पिंड थे, उनके लिए वे अमूल्य सम्पदा बने।
कला शैलियों के समान एक नए रूप को खोजना और उसे सजीव बनाने की प्रक्रिया अनूठी है। नयी कृतियों की सृजना मूल प्राकृतिक सामग्री से केवल बेकार और अवरोधी भागों की कटाई-छटाई से की जाती है जिससे उसकी भौतिक रचना कायम रहे। इस प्रकार इस कला मे कल्पनाशीलता सर्वोपरि रहती है। इस विशेष प्रकार की कला के लिये मर्मज्ञ बोध और धैर्य की आवशयकता रहती है लेकिन यह पूर्णत: संतुष्टि प्रदान करती है।
अपनी लगभग चार दशकों की साधना के दौरान बिमल सहगल ने अपनी सृजना द्वारा सौ से भी अधिक कलाकृतियां बनाई हैं। ये विभिन्न शारीरिक भंगिमाओं और मनस्तिथिओं में ढली मानव आकृतियों के इलावा विभिन्न प्रजातियों के दूसरे जीव भी शामिल हैं। इनमें छोटी सी चींटी से लेकर, पक्षी जैसे कि बाज और शुतुरमुर्ग, चूहे, छिपकली, गिलहरी, हिरण, हाथी, घोडा, ऊंट, तेंदुआ, जिराफ़ यहाँ तक कि मिथकीय ड्रैगन और लुप्त हो चुके विराट डायनासोर भी देखे जा सकते हैं।
मानव आकृतियाँ भी बहुत निराली हैं जैसे कि माँ की पीठ पर सवार बच्चा, शिशु को बाहों में लिए हुए एक माँ, घुड़सवार, उल्लसित होकर नृत्य करती एक स्त्री, एक आदिवासी युगल, जंजीरों में बंधी हुई स्त्री जो नारी मुक्ति के संघर्ष को जतलाता है तथा अन्य कई। बिमल सहगल की यह अनूठी रचनाएँ प्रिन्ट व दृश्य माध्यमों में और प्रदर्शनियों द्वारा भारत और विदेशों में दिखाई और सराही गई हैं।
साभार: श्री
बिमल सहगल
