संस्कृति मानव जाति की धरोहर है । उसकी
प्रक्रिया कब, कहां प्रारम्भ हुई यह कहना
कठिन है । उसका स्रोत मानव की प्रकृति से प्रगति की दिशा में जाने की नैसर्गिक
प्रेरणा है । उसका केन्द्र एक विशेष व्यक्ति अथवा वर्ग नहीं हो सकता । उसका उद्भव
और विकास नदी के समान है । गंगाजी का उद्गम गोमुख है किन्तु उस एक स्रोत से गंगा
नहीं बनती । बंगसागर तक की उसकी दीर्घयात्रा में वह कितनी छोटी-मोटी सरिताओं को
साथ लेती है । विन्ध्याचल की सोनभद्र और हिमालय की गंडकी उसमें मिलती है ।
संस्कृति की उत्क्रान्ति भी उसी प्रकार की है । भारतवर्ष की बात बताएं तो
सहस्त्राब्द पूर्व के वैदिक महर्षियों को लेकर आधुनिक बहुआयामी प्रतिभा धनियों के
समूह तक सभी इसके धाता, धर्ता, और
कर्ता हैं । ज्ञानी, वीर, वैज्ञानिक,
कलाकार, कवि, साहित्यकार
आदि सभी अपने-अपने कर्तव्य से समाज के सम्मुख जीवन को उदात्त बनाने वाले शाश्वत
मूल्य रखते गये । समाज उन मूल्यों को अनायास आत्मसात् करके सुसंस्कृत बनता गया ।
परिणामतः हर पीढ़ी स्वयं सुसंस्कृत बनकर संस्कृति के सृजन का हेतु बनी, जैसे पगडंडी पर चलने वाले ही उसके निर्माता बन जाते हैं । यहां यह समझना
गलत होगा कि संस्कृति उस प्रक्रिया की अन्तिम परिणति है । वास्तव में संस्कृति
परिणति नहीं, वह है गतिशील अनवरत प्रक्रिया । उसको कुरीतियों
से मुक्त कर अभिनव मूल्यों को अपनाकर कालानुसार परिपुष्ट बनाने का दायित्व हर पीढ़ी
का है । अन्ततः संस्कृति बदलती पीढ़ियों के अन्तःकरणों में प्रतिष्ठित न बदलते
मूल्यों का अविरल, अक्षय प्रवाह है । हर पीढ़ी के मनोमालिन्य
को मिटाकर उसको सत्यशुद्धि एवं भावशुद्धि से सम्पन्न करने की अद्वितीय क्षमता
उसमें है । यहां तक कि आज भी भारतीय आर्य हिन्दू धर्म में धार्मिक कार्यों और
संस्कारों में वैदिक मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है । आज भी विवाह की वही पद्धति
है जो हजारों वर्ष पूर्व भारत में प्रचलित थी । इस स्थिति में विद्यार्थियों को
भारतीय संस्कृति में समाहित निम्न वैज्ञानिक तथ्यों को जानना आवश्यक है -
सूर्य नमस्कार- हिन्दुओं
में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है । वैज्ञानिक तर्क
के अनुसार पानी के बीच से आनी वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुँचती है, तब हमारी आंखों की रोशनी अच्छी
होती है । प्राचीन काल में ऋषि-मुनि एवं घर की स्त्रियां व पुरूष प्रातः काल सूर्य
को जल चढ़ाते हैं । इसमें जहाँ एक तरफ भारतीय संस्कृति ग्रन्थों को देवता मानकर
सम्मान करती है वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक तथ्य यह है कि प्रातः कालीन सूर्य की
किरणें शरीर पर पड़ती हैं तो विटामिन डी की प्राप्ति होती है और शरीर नीरोग रहता है
। वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार प्रत्येक 11 वर्ष के अन्तराल में सूर्य मण्डल में
विशेष हलचलें होती है । इन हलचलों को विज्ञान की भाषा में सौर ऊर्जा के तूफान भी
कहा जाता है । इसके कई प्रकार के स्थूल और सूक्ष्म प्रभाव भूमण्डल पर पड़ते हैं ।
सूर्यमण्डल में इस प्रकार की विशेष हलचल सन 2012 से 2014 के बीच होने का अनुमान
अन्तर्राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र (नासा) के वैज्ञानिकों का है । इसी तरह 22 वर्ष
में अन्तराल सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र में भी परिवर्तन होता है । सूर्य मात्र आग
का गोला नहीं है । उसके प्रभाव से धरती की तमाम पदार्थ परक और चेतना परक
गतिविधियां चलती हैं । भारतीय ऋषियों के इस विचार से वैज्ञानिक भी सहमत हैं । अनेक
अध्ययनों के आधार पर सिद्ध हुआ है कि सूर्यमण्डल में विशेष हलचलों के दौरान
भूमण्डल पर भी विशेष हलचलें होती हैं । जैसेः- धरती के चुम्बकीय क्षेत्र में
परिवर्तन होना । वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि सूर्य के ध्रुवीय स्थानान्तरण के
साथ पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में काफी गिरावट आने की संभावना होती है । इससे
अनेक प्रकार के प्राकृतिक उलट फेर होते हैं । मनुष्य के चिन्तन पर इसका प्रभाव
पड़ता है । अनजाने अनचाहे मानसिक असंतुलनों का सामना करना पड़ता है । इसका सीधा
प्रभाव व्यक्तित्व तथा सामाजिक जीवन पर पड़ता है । सूर्य का सीधा सम्बन्ध नाभिचक्र
से है । नाभिचक्र का काया की ऊर्जा एवं आरोग्य से सीधा सम्बन्ध है । इसका सन्तुलन
बिगड़ने से शरीर के ऊर्जा क्षय तथा रोगों के उभार की समस्या सामने आ जाती है । इन
सब विसंगतियों से बचने तथा सौर ऊर्जा चक्र के प्रभाव का सकारात्मक उपयोग करने के
लिए सूर्य उपासना अति आवश्यक है । सर्दी में व्यक्ति यदि अपने जीवन क्रम में बदलाव
लाये तो जुखाम, जकड़न निमोनिया जैसे रोगों का आक्रमण होने
लगता है । यदि जीवन क्रम उसके अनुकूल बनाये तो यही ठंड स्वाथ्यवर्धक बन जाती है ।
इसलिए सूर्यमण्डल में होने वाली हलाचलों के कुप्रभाव से बचाने के लिए सूर्य साधना
बहुत लाभप्रद होती है । सूर्य साधना के सूत्र :- ऊँ भास्कराय विद्महे दिवाकराय
धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्’’। ऊँ
धृणि सूर्याय नमः।
भोजन की शुरूआत तीखे से और अंत मीठे से करना
- जब कोई धार्मिक या
पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरूआत तीखे से और अंत मीठे से होता है ।
यह भारतीय परम्परा रही है । लोगों का मानना है कि अन्त में हमेशा मीठा खिलाना
चाहिए जिससे हमारे सम्बन्धों में मिठास बनी रहे । वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कहा
जा सकता है कि तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते
हैं । इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है । अन्त में मीठा खाने से अम्ल
की तीव्रता कम हो जाती है । इससे पेट में जलन नहीं होती है । मीठा भोजन को पचाने
में भी अपना योगदान देता है तथा मीठे से भोजन आसानी से पचता है ।
पीपल को पूजना - भारतीय स्त्रियां पीपल को देवता मानकर उसका सिंचन
करती हैं । इसी को वैज्ञानिक दृष्टि से देखेंगे तो यह कहा जाता है कि पीपल को
भारतीय संस्कृति में देवता माना जाता है । वह जीवन को प्रभावित करता है । तमाम लोग
सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं । वैज्ञानिक तर्क के
आधार पर इसकी पूजा इसलिए की जाती है ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और
उसे काटे नहीं । पीपल एकमात्र ऐसा पेड़ है,
जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है । वैसे तो सभी वृक्ष उपयोगी
व पूज्य हैं, परन्तु पीपल को भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण
स्थान दिया गया है । अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है । जलाशयों व कुएं के
समीप पीपल का उगना आज भी शुभ माना जाता है । इस वृक्ष की जड़ के निकट बैठकर जप,
दान, होम, स्रोत,
पाठ, ध्यान व अनुष्ठान किया जाता है। ‘अश्वत्योपन व्रत’ में महर्षि शौनक बताते हैं कि
प्रातः पीपल के वृक्ष को लगाकर आठ वर्षो तक पुत्र की भांति उसका पालन करना चाहिए,
इसके पश्चात् उपनयन संस्कार करके नित्य सम्यक् पूजा करने से अक्षय
लक्ष्मी प्राप्त होती है । पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने व जल चढ़ाने
पर दुःख का विनाश व स्वास्थ्य लाभ होता है । इस वृक्ष के दर्शन-पूजन से दीर्घायु,
समृद्धि व यश की प्राप्ति होती है । श्रीमद्भगवद्गीता में भी इसकी
श्रेष्ठता का स्पष्ट उल्लेख है, श्री कृष्ण अर्जुन से कहते
हैं- अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां
कपिलो मुनिः।। मैं सब वृक्षों में पीपल का
वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों
में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ । स्वयं ईश्वर ने पीपल को अपनी उपमा
देकर इसके देवत्व और दिव्यत्व को बताया है । इसी कारण शास्त्रों में पीपल के
पत्तों को तोड़ना, इसको काटना या मूल सहित उखाड़ना वर्जित माना
गया है । शास्त्रों में उल्लेख है कि ‘‘अश्वत्थः पूजितोयत्र
पूजिताः सर्व देवताः’’ अर्थात् पीपल की पूजा विधि विधान के
अनुसार करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। अथर्ववेद में पीपल
वृक्ष में देवताओं का निवास बताया गया है- ‘‘अश्वत्थो
देवसदनः’’।
पर्यावरण शुद्धि की अद्भुत क्षमता - आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का असाध्य रोगों
के निदान में उपयोग बताया गया है । भारत में उपलब्ध विविध वृक्षों में जितना अधिक
औषधीय महत्व पीपल वृक्ष का है, अन्य किसी वृक्ष का नहीं है, यह निरंतर दूषित गैसों
का विषपान करता रहता है । पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी-वृक्षों में पीपल को
प्राणवायु को शुद्ध करने वाले वृक्षों में सर्वोत्तम माना गया है । अतः प्राचीन
आचार-विचार के आधार पर जीवन दृष्टि में परिवर्तन कर त्यागपूर्वक उपभोग को आधार
मानकर समग्र कल्याण की बात होनी चाहिए । प्रकृति के संसाधनों के प्रति श्रद्धा,
आस्था, विश्वास, समर्पण
व भक्ति भाव रखना होगा । इसी में जैव नैतिकता के भाव समाहित है । इसी प्रकार के
भावों का अनवरत प्रवाह भावी पीढ़ियों में होगा, तभी वृक्षों
का संरक्षण संवर्द्धन होगा । हजारों वर्ष पहले ऋग्वेद के ऋषियों ने ‘वृक्षों’, वनस्पतियों को संरक्षण दे बताया था कि
इनसे कल्याण है, इनका त्याग विनाश है ।
कान छिदवाने की परम्परा - भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है । वैज्ञानिक तर्कशास्त्री
मानते हैं कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है । जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे
बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार
नियंत्रित रहता है ।
जमीन पर बैठकर भोजन करना- भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर भोजन करना अच्छी
बात होती है । वैज्ञानिक तर्क के अनुसार पालथी मार के बैठना एक प्रकार का योग आसन
है । इस स्थिति में बैठने से मस्तिष्क शान्त रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शान्त
हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है । इस स्थिति में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक
सिग्नल पेट तक जाता है कि वह भोजन के लिए तैयार हो जाये ।
ऊँ का प्रयोग करना- भारतीय संस्कृति में प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा
ऊँ का प्रयोग किया जाता था आज भी ऊँ का प्रयोग किया जाता है । ऊँ के प्रयोग का
हमारे जीवन में क्या महत्व है ? इसका प्रयोग क्यों किया जाता है ? इसके पीछे
वैज्ञानिकता क्या है ? अनेक प्रश्न हमारे सामने है ? ऊँ का प्रयोग एक साधना में करते हैं । किसी भी भगवान के नाम के पूर्व हम
ऊँ का प्रयोग करते है । यथा ऊँ नमः शिवाय । ऊँ गणपतये नमः। ऊँ माँ सरस्वत्यै नमः।
कोई भी शुभ कार्य करने से पहले हम ऊँ का उपयोग करते हैं । प्रश्न यह उठता है कि हम
ऊँ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ? क्या ऊँ शब्द की महिमा
का कोई वैज्ञानिक आधार है ? क्या इसका उच्चारण करने से संसार
सागर में कुछ लाभ भी है ? ऊँ के प्रभावों का अध्ययन प्रोफेसर
जे. मार्गन और उनके सहयोगियों ने 7 वर्ष तक किया । प्रोफेसर जे. मार्गन रिसर्च एंड
इन्स्टिट्यूट के प्रमुख थे । अध्ययन के दौरान उन्होंने मस्तिष्क और ह्रदय की
विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 2500 पुरूषों एवं 200 महिलाओं का परीक्षण किया । इन्होंने
लोगों को भी शामिल किया जो बीमारी की अन्तिम अवस्था में थे । उनको केवल इसी दौरान
वे दवाईयाँ दी गई जो उनके जीवन को बचाने के लिए आवश्यक थी । शेष सभी दवाईयाँ बन्द
कर दी गई । इन सभी को प्रातः काल साफ एवं स्वच्छ वातावरण में प्रतिदिन एक घण्टा ऊँ
का जाप कराया गया । ऊँ का जप उनको विभिन्न मन्त्रों के माध्यम से कराया गया । हर
तीन माह बाद उनकी जाँच करवाई जाती । चार साल तक जाँच के बाद जो परिणाम सामने आए वह
आश्चर्यजनक थे । 70 पुरूष और 85 महिलाओं में ऊँ का जाप प्रारम्भ करने से पूर्व
बीमारियों की जो स्थिति थी वह 90 प्रतिशत कम पाई गई । कुछ लोगों पर मात्र 20 प्रतिशत
असर हुआ परन्तु इसका कारण प्रोफेसर मार्गन ने बताया कि वे अंतिम स्टेज पर थे । ऊँ
के जाप द्वारा नशा मुक्ति भी की जा सकती है । इसका प्रयोग जीवन में उतार कर मनुष्य
जीवन भर स्वस्थ रह सकता है । ऊँ को लेकर प्रोफेसर मार्गन कहते हैं कि शोध में यह
तथ्य पाया गया है कि ऊँ का जाप अलग-अलग आवृतियों और ध्वनियों से दिल और दिमाग के
रोगियों के लिए अत्यधिक प्रभावी है । गौर करने लायक तथ्य यह है कि मनुष्य जब ऊँ का
जाप करता है तो यह ध्वनि जुबां से न निकलकर पेट से निकलती है । यही नहीं ऊँ का
उच्चारण पेट, सीने और मस्तिष्क में कम्पन्न भी पैदा करता है ।
विभिन्न आवृतियों (तरंगों) और ऊँ ध्वनि के उतार चढ़ाव से पैदा होने वाली कम्पन्न
क्रिया से मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है तथा नई कोशिकाओं का निर्माण करता
है । रक्त विकार पैदा नहीं होता है । आयुर्वेद में भी ऊँ के चमत्कारिक प्रयोगों का
वर्णन किया गया है । हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरबर्ट बेन्सन ने अपने शोध
के बाद ऊँ के वैज्ञानिक आधार को स्पष्ट किया है । प्रार्थना और ऊँ शब्द के उच्चारण
से प्राणघातक बीमारी एड्स के लक्षणों में राहत मिलती है एवं बांझपन के उपचार में
दवा का काम करता है । इसके प्रयोग से सभी रोगों में फायदा एवं दुष्कर्मों के
संस्कारों का शमन होता है ।
ऊँ के उच्चारण के शारीरिक लाभ -
1. प्राणायाम के साथ प्रयोग करने से फेंफडे
मजबूत होकर श्वसन क्रिया सामान्य रहती है ।
2. ऊँ का उच्चारने करने से नींद आसानी से आ
जाती है ।
3. इससे पाचन शक्ति में बढ़ोतरी होती है ।
4. यह शरीर में तनाव बढाने वाले तत्वों को
दूर करता है ।
5. यह ह्नदय और खून के प्रवाह को संतुलित
रखता है ।
6. घबराहट और अधीरता में ऊँ का प्रयोग अमृत
से बढ़कर है ।
7. ऊँ के उच्चारण से शरीर में स्फूर्ति का
संचार होता है।
भारतीय संस्कृति के मतानुसार ऊँ की
चमत्कारिक ध्वनि का उच्चारण यदि मनुष्य श्रद्धा भक्ति के साथ करे तो अपने जीवन के
प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।
ऊँ की वैज्ञानिक महत्ता- खगोल
वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि हमारे अन्तरिक्ष में पृथ्वी मण्डल, सौर मण्डल, ग्रह
मण्डल एवं आकाशगंगाएं ब्रह्यण्ड के निरन्तर चक्कर लगा रही हैं । ये सभी आकाश पिण्ड
कई हजार मील प्रति सैकण्ड की गति से अनंत की ओर भागे जा रहे हैं । जिससे लगातार एक
ध्वनि और कम्पन्न उत्पन्न हो रहा है । इसी ध्वनि को हमारे ऋषि मुनियों ने अपने
ध्यान में सुना । वह ध्वनि लगातार अपने शरीर के अन्दर और बाहर सुनाई देती रहती है ।
वह ध्वनि निरंतर जारी है इसे सुनते रहने से मन और आत्मा को असीम शान्ति का अनुभव
होता है । इस ध्वनि को हमारे ऋषि मुनियों ने ब्रह्नानन्द एवं ऊँ का नाम दिया ।
अर्थात अन्तरिक्ष में सुनाई देने वाली आवाज या मधुर गीत है । अनादि काल से अनन्त
काल तक ब्रह्नाण्ड में व्याप्त है । ऊँ की ध्वनि का नाद ब्रह्नाण्ड में प्रकृति
ऊर्जा के रूप में फैला हुआ है । जब हम अपने मुख से एक ही सांस में ऊँ का उच्चारण
मस्तिष्क ध्वनि अनुनाद तकनीक से करते हैं तो मानव शरीर को अनेक लाभ होते हैं और
मानव असीम सुख शांति व आनन्द की अनुभूति करता है । यही देन है हमारी भारतीय
संस्कृति की जो हमेशा मानव कल्याण के विषय में सोचती रहती है ।
प्रदक्षिणा करना - हम
मन्दिर मस्जिद में कहीं भी जाते हैं तो प्रदक्षिणा जरूर करते हैं । यह प्रदक्षिणा
क्यों की जाती है क्योंकि जब हम ईश्वर के आस-पास परिक्रमा करते हैं तो हमारी तरफ
ईश्वर (प्रत्यक्षतः प्राकृतीय) की सकारात्मक शक्ति आकृष्ट होती है और जीवन की
नकारात्मकता घटती है । कई बार हम स्वयं के इर्द गिर्द ही प्रदक्षिणा कर लेते हैं
इससे भी ईश्वरीय शक्ति आकृष्ट होती है इसलिए प्रदक्षिणा करते समय यह मन्त्र बोला
जाता है - यनि कानिक च पापानि, जन्मान्तर कृतानि च । तानी तानी विनयशन्ति, प्रदक्षिणा
पदे पदे ।।
प्राण प्रतिष्ठित ईश्वरीय प्रतिमा की, पवित्र वृक्ष की, यज्ञ या हवन कुंड की परिक्रमा की जाती है । जिससे उसकी सकारात्मक शक्ति
हमारी तरफ आकृष्ट होती है । सूर्य को देखकर हम अपने इर्द-गिर्द घूम लेते हैं ।
क्योंकि -
1 हर गोल घूमने वाली वस्तु के घूमने से
आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है।
2 इस ब्रह्नाण्ड में सभी ग्रह सूर्य की
प्रदक्षिणा कर रहे हैं जिससे उनमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न होती है ।
3 पृथ्वी और सभी ग्रह अपने इर्द-गिर्द ही
प्रदक्षिणा कर रहे हैं । (परिभ्रमण $
घूर्णन)
4 जब हम अपने हाथ में पानी की बाल्टी का
पानी लेकर गोल- गोल घूमते हैं तो बाल्टी का पानी गिरता नहीं है । इसी तरह पृथ्वी
घूम रही है तो उस पर स्थित सभी जड़ पदार्थ गिरते नहीं है । (अभिकेन्द्र बल $ अप केन्द्र बल)
5 हर अणु में भी इलेक्ट्रोन प्रदक्षिणा कर
रहे हैं ।
6 छाछ से मक्खन निकालते समय भी उसे गोल-गोल
घुमाने से उसमें ब्रह्नाण्ड में मौजूद शक्ति आकर्षित होती है । (अभिकेन्द्र
-उपकेन्द्र)
इस शक्ति को अनुभव करने के लिए हमें गेंद को
हाथ में पकड़ कर, हाथों
को कंधों तक उठाकर उन्हें घुमाएं जैसे डमरू बजा रहे हो । थोड़ी ही देर में
अंगुलियों में भारीपन महसूस होगा । यही ब्रह्नाण्ड से आकर्षित शक्ति का अनुभव है
अब हल्की सी ताली बजाकर इसे अपने अन्दर समाहित कर लें ।
आर्य प्रतीक स्वास्तिक का प्रयोग - स्वास्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय
संस्कृति में मंगल प्रतीक माना जा रहा है । अतः कोई भी शुभ कार्य करने से पहले
स्वास्तिक चिन्ह अंकित करके उसका पूजन किया जाता है । स्वास्तिक का अर्थ हैः-
अच्छा या मंगल करने वाला । अमरकोश में भी इसका अर्थ आशीर्वाद, मंगलकारी एवं पुण्यकार्य सभी
दिशाओं में सबका कल्याण करने वाला है । इस प्रकार स्वास्तिक शब्द केवल व्यक्ति या
जाति विशेष का नहीं है अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण यह ‘‘वसुधैव
कुटुम्बकम्’’ की भावना निहित है । स्वास्तिक शब्द की निरूक्ति-
स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात कुशल क्षेम या
कल्याण का प्रतीक ही स्वास्तिक है । मानक दर्शन :- दर्शन के अनुसार
स्वास्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घड़ी की सुई चलने की दिशा) का संकेत
तथा वामोन्मुख बायीं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं । दोनों दिशाओं के संकेत
स्वरूप दो प्रकार के स्वास्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप में मान्य हैं ।
किन्तु जहाँ दायीं ओर मुड़ी भुजा वाला स्वास्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक है,
वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वास्तिक अमांगलिक हानिकारक माना गया है ।
प्राचीन काल में राजा महाराजा द्वारा किलों का निर्माण स्वास्तिक के आकार में किया
जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे । दुर्ग निर्माण में स्वास्तिक
का अर्थ सु वास्तु अर्थात अच्छा वास्तुशास्त्र । स्वास्तिक को नेपाल में हेरब,
मिस्त्र में एक्टोन, बर्मा में महापियन्ने के नाम
से पूजते हैं । ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासी द्वारा आदिकाल से
स्वास्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है ।
वैज्ञानिकता :- वर्तमान समय में विज्ञान भी स्वास्तिक आदि मांगलिक चिह्नों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान के वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु पदार्थ इत्यादि के ऊर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है और इस ऊर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है- ‘‘बोविस’’। मृत मानव शरीर बोविस शून्य मानक है । और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6500 बोविस पाया गया है । स्वास्तिक में इस ऊर्जा का स्तर 1000000 (दस लाख) बोविस है। यदि इसे अलग बना दिया जाये तो यह प्रतिकूल ऊर्जा इसी अनुपात में बढ़ाता है । इसी स्वास्तिक को थोडा टेढा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1000 बोविस रह जाती है । इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों, मन्दिरों, गुरूद्वारों इत्यादि का ऊर्जा का स्तर काफी ऊँचा मापा गया है । जिसके चलते वहाँ जाने वालों को शान्ति का अनुभव और अपनी समस्याओं कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है । यही नहीं हमारे घरों मन्दिरों पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किये जाने वाले मांगलिक चिह्नों ऊँ देव मन्त्र आदि में भी इसी तरह की ऊर्जा समायी रहती है । जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता है । अतः निष्कर्षतः कह सकते हैं हिन्दू धर्म विश्व में एक मात्र ऐसा धर्म है जो अपने प्रत्येक कार्य संस्कार और परम्परा में पूर्णतः वैज्ञानिकता समेटे हुए है । सबसे अलग आश्चर्य की बात है कि जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही वामावर्त स्वास्तिक अंकित था ।
स्त्रियों द्वारा मांग में सिंदूर लगाना - भारतीय वैदिक परम्परा खासतौर पर हिन्दू समाज में
शादी के बाद हर सुहागिन महिला को मांग में सिन्दूर भरना आवश्यक है । सिन्दूर
द्वारा मांग भरा जाना सुहाग का प्रतीक समझा जाता है । वर्तमान समय में सिन्दूर के
स्थान पर कुंकुम अन्य कॉस्मैटिक चीजों ने ले ही है । हमारे मन में सवाल उठता है कि
आखिर सिन्दूर ही क्यों लगया जाता है ?
इसके अनेक कारण हैं-
1. विवाह के समय सिन्दूर से मांग भरने का
संस्कार सुमंगलकारी है ।
2. मांग में सिन्दूर औरतों के लिए सुहाग की
निशानी माना जाता है ।
3. सिन्दूर नारी श्रृंगार का एक महत्वपूर्ण
अंग भी है ।
4. सिन्दूर को मंगल सूचक भी समझा जाता है ।
वैज्ञानिकता - शरीर विज्ञान में सिन्दूर का
महत्व बताया गया है सिन्दूर में पारा जैसी धातु अधिक होने के कारण चेहरे पर जल्दी
झुर्रियां नहीं पड़ती है । सिन्दूर मांग में भरा जाता है वह स्थान ब्रह्मरंध्र और
अधिम नामक मर्म के ठीक ऊपर होता है इससे स्त्री के शरीर में स्थित विद्युतीय
उत्तेजना नियंत्रित होती है । विवाह के बाद ही मांग इसलिए भरी जाती है क्योंकि
विवाह के बाद जब महिला पर गृहस्थी का दबाव आता है तो उसे चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी बीमारियाँ
घेर लेती हैं । पारा एकमात्र ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है । यह मस्तिष्क के
लिए लाभकारी है और यह औषधि का काम करता है । अतः सिन्दूर मांग में भरा जाता है ।
दक्षिण दिशा में सिर करके सोना- हमारे शास्त्रों में लिखा है कि कभी भी उत्तर दिशा
में सिर कर के नहीं सोना चाहिए । इससे हमारी आयु घटती है क्योंकि दक्षिण की ओर
पांव केवल मृत व्यक्ति के ही किये जाते हैं । अतः हमें हमेशा दक्षिण में सिर करके
सोना चाहिए । इसका कारण है कि पृथ्वी का उत्तर ध्रुव चुम्बकत्व का प्रभाव रखता है
जबकि दक्षिण ध्रुव पर यह प्रभाव नहीं पाया जाता है । शोध से पता चलता है कि साधारण
चुम्बक शरीर से बांधने पर वह हमारे शरीर के उत्तकों पर विपरीत प्रभाव डालती है यदि
साधारण चुम्बक हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है तो उत्तरी पोल पर
प्राकृतिक चुम्बक भी हमारे मन मस्तिष्क व शरीर पर विपरीत असर डालता है ।
वैज्ञानिकता- पृथ्वी के दो ध्रुवों उत्तर दक्षिण के कारण बिजली
की जो तरंगें होती है यानि उत्तर ध्रुव में बिजली अधिक होती है । दक्षिण ध्रुव में
ऋणात्मक (-) अधिक होती है । इसी प्रकार मनुष्य शरीर में विद्युत धनात्मक केन्द्र
होता है । पैरों की ओर ऋणात्मक । यदि बिजली दोनों तरफ से धनात्मक होगी तो मिलेगी
नहीं अपितु हटेगी । यदि घनत्व अलग-अलग होगा तो दौड़कर मिलना चाहती है जैसे सिर
दक्षिण की ओर तो सिर धनात्मक ($) और यदि पैर उत्तर की ध्रुव तो ऋणात्मक (-) बिजली एक दूसरे के सामने आ जाती
है और मिलना चाहती है परन्तु यदि पांव
दक्षिण की ओर हो तो सिर का धनात्मक तथा उत्तरी ध्रुव धनात्मक बिजली आमने-सामने
होती है और एक दूसरे को हटाती है । जिसमें मस्तिष्क में आन्दोलन होता रहता है । एक
दूसरे के साथ खींचा ताने चलती रहती है । पूर्व पश्चिम में भी सिर हमेशा पूर्व की
और करके सोना चाहिए । सूर्य की प्राण शक्ति मानव शरीर पर अच्छा प्रभाव डालती है ।
अतः कभी भी दक्षिण की तरफ पैर करके नहीं सोना चाहिए ।
शंखनाद - भारतीय संस्कृति में शंख ध्वनि को शुभ व मंगल सूचक
माना गया है । ऋषिश्रृंग ने लिखा है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख
बांधने तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी दोष नहीं होता है ।
बच्चा स्वस्थ रहता है । पुराणों में शंख को चन्द्रमा और सूर्य के समान ही देवतुल्य
माना गया है । मान्यता है कि शंख के मध्य में वरूण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती
विराजती है । समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में शंख का आठवाँ स्थान था ।
उच्च कोटि के शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, श्रीलंका व भारत में पाये जाते हैं । शंख
कई प्रकार के होते हैं । प्रत्येक शंख का भिन्न-भिन्न महत्व है । सम्पन्नता,
सुख, समृद्धि, आत्मशान्ति
और पर्यावरण तथा वायुमण्डल के शुद्धिकरण में भी शंख की महिमा मानी गयी है ।
महाभारत काल में तो प्रत्येक योद्धा का अपना शंख होता था । ‘पांचजन्य’
कृष्ण का और ‘देवदत्त’ अर्जुन
का शंख था । ऐसी मान्यता है कि जिस परिवार में इसकी पूजा की जाती है, वह परिवार सदा सुखी और सम्पन्न रहता है । आसुरी शक्तियाँ इससे काफी दूर
रहती है ।
दक्षिणावर्ती शंख- इसका मुंह दांयी ओर खुलता
है । यह शंख सामान्यतः सफेद रंग का ही उपलब्ध होता है । मातेश्वरी लक्ष्मी को यह
शंख प्रिय है, क्योंकि दोनों का जन्म
समुद्र से हुआ है । अतः शंख लक्ष्मी का सहोदर भाई भी है ।
मोती शंख- यह गोल आकार का होता है । इसमें
एक सफेदधारी होती है जो ऊपर से नीचे तक खिंची होती हैं । यह मोती की तरह चमकदार
होता है । स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से यह शंख दक्षिणावर्ती शंख से भी अधिक
प्रभावकारी है । रात भर इस शंख में रखे हुए पानी से यदि त्वचा धोयी जाये तो त्वचा
सम्बन्धी सारे रोग कुछ दिनों में समाप्त हो जाते हैं । यदि त्वचा पर सफेद दाग हो
तो शंख को पानी में बारह घण्टे रखें । उस पानी को कुछ दिनों तक लगाते रहने से सफेद
दाग नष्ट हो जाते हैं । रात भर इस शंख में पानी रखें ओर सुबह इसमें थोड़ा गुलाब जल
डाल कर बालों को धोने से बालों की सफेदी थम जाती है ।
मध्यवर्ती शंख - जो बीच में अंगुली डालकर
पकड़ा जाता है तथा जिस शंख का मुँह मध्य भाग में होता है उसे मध्यवर्ती शंख कहते
हैं ।
वामावर्ती शंख - जो शंख बांये हाथ से पकड़ कर
बजाया जाता है, वह
वामावर्ती शंख कहलाता है । शंख और भी प्रकार के होते हैं यथा- गोमुखी, लक्ष्मी, कामधेनु, विष्णु,
देव, चक्र, सुघोष,
मणिपुष्पक, शनि, राहु,
केतु, शेषनाग, राक्षस,
कच्छप आदि ।
शंख के अन्य लाभ- श्वाँस और फेंफड़ो के रोग
दूर करने के लिए प्रतिदिन शंख बजाना लाभप्रद है । शंख में केल्शियम व फास्फोरस की
मात्रा होती है । इसमें गन्धक का गुण व्यास है । इसीलिये इसमें जल भरकर रखते हैं ।
शंख ध्वनि जहां तक प्रसारित होती है वहां तक के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं ।
आयुर्वेद के अनुसार शंख के पानी से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं । शंख की भस्म से कई
प्रकार की औषधियां निर्मित होती है । नियमित शंख बजाते रहने से खांसी, दमा, पीलिया,
ब्लड-प्रेशर तथा हृदय सम्बधी रोगों से छुटकारा मिल जाता है । शंख
में पंचतत्वों का संतुलन बनाये रखने की अपार क्षमता होती है । पुराणों में लिखा है कि मूक एवं श्वाँस रोगी
हमेशा शंख बजाये तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं । ह्नदय रोग के लिए यह रामबाण औषधि
है । ब्रह्यवैवर्त पुराण के अनुसार शंख में जल भरकर रखने और उस जल से पूजन सामग्री
धोने और घर में छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है । तानसेन ने प्रारम्भ में शंख
बजाकर ही गायन शक्ति प्राप्त की थी। वैज्ञानिकों के अनुसार शंख ध्वनि से वातावरण
शुद्ध होता है । इसकी ध्वनि के प्रसार क्षेत्र तक सभी कीटाणुओं का नाश हो जाता है ।
इस संदर्भ में अनेक प्रयोग परीक्षण भी हुए हैं । इसलिए मंदिरों में आरती के पश्चात
शंखनाद किया जाता है । आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियाँ पीलिया,
यकृत, पथरी आदि रोगी ठीक होते हैं । आधुनिक
विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से हमारे फेंफड़ो का व्यायाम होता है श्वाँस संबंधित
रोगों से लडने की शक्ति प्राप्त होती है । पूजा के समय शंख में भरकर रखे गए जल को
सभी पर छिड़का जाता है क्योंकि शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत
शक्ति होती है । साथ ही शंख में रखा पानी पीने से हमारी हड्डियां और दाँत स्वस्थ
रहते हैं । शंख में कैल्शियम फास्फोरस और गंधक के गुण होते हैं, जो उसमें रखे जल में आ जाते हैं । वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव
से सूर्य की हानिकारक किरणें नष्ट होती है । इसलिए सुबह शाम शंख बजाने का विधान
किया गया है । डॉ.जगदीश चन्द्र बसु के अनुसार इसकी ध्वनि जहाँ तक जाती है वहाँ तक
व्याप्त बीमारी के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं । इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है ।
शंख में गंधक फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ होते हैं जिससे इसमें मौजूद
जल सुवास्ति और रोगाणु रहित हो जाता है । इसलिए इसे शास्त्रों में महाऔषधि माना
जाता है । नियमित शंख बजाकर आप खांसी, दमा, पीलिया, ब्लडप्रेशर, या दिल से
सम्बन्धित बीमारियों से छुटकारा पा सकते हैं । शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का संचार
होता है । जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है । शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश
होता है । शंख बजाने से चेहरे, श्वसनतन्त्र, श्रवणतन्त्र, तथा फेंफड़ो का व्यायाम होता है ।
शंखवादन से स्मरण शक्ति भी बढती है । अतः हमें नियमित सुबह-शाम शंखवादन करना चाहिए
।
भारतीय नमस्कार- नमस्कार शब्द नमः+कार दो शब्दों से मिलकर बना है । नमस्कार का आशय है हम
संसार के कारक को हमेशा सादर नमन करते हैं क्योंकि हमारी निज कोई सता नहीं है जो
कुछ भी इस संसार में है वह इस संसार के कर्ता नियंता का है । अतः हमारा दूसरे
व्यक्ति से जो मिलन हुआ है वह उस परमसत्ता की कृपा से हुआ है जो अवश्य ही शुभ और
मंगलमय होगा । अतः नमस्कार, नमस्ते का अर्थ है उस परमात्मा
को नमस्कार करना कहीं कहीं परंपरा स्वरूप हाथ मिलाकर, गले
मिलकर या अभिवादन किया जाता है । ये सभी क्रियाएं नमस्कार का मौन स्वरूप है । दो
व्यक्तियों का हाथ से हाथ, दिल से दिल, ह्नदय से ह्नदय मुख से मुख मिलते हैं तो भी परमसत्ता की दो विभूतियों को
एकाकार हो जाना ही नमस्कार की उच्च श्रेणी बन जाता है । नमस्कार के पीछे वैज्ञानिक
कारण यही रहा है कि व्यक्ति निजत्व को त्यागकर सार्वभौम सत्ता को स्वीकार करता है
व्यष्टि से समष्टि में मिल जाता है । आत्मा से परमात्मा, अणु
से परमाणु और इस प्रकार वह अपनी विराट सत्ता बना लेता है । उसका अहम् समाप्त हो
जाता है । नमस्कार करते ही उसमें विनम्रता, निर्मलता,
सह्नदयता मैत्रीभाव और अपनत्व का भाव व्याप्त हो जाता है ।
मनोवैज्ञानिक या वैज्ञानिक स्तर पर देखें तो दोनों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
दोनों नमस्कार करने वाले में हो जाता है । कई बार हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति हमसे
रूष्ट होता है । जब हम स्वयं पहल करके नमस्कार करते हैं तो हमारे प्रति वह
सद्व्यवहार करता है । यह इस बात का प्रमाण है कि नमस्कार से सकारात्मक ऊर्जा का
संचार होता है । यह जरूर ध्यान रखे कि नमस्कार छोटे-बड़े सभी को किया जा सकता है,
जबकि प्रणाम हमेशा अपने से बड़ों से किया जाता है । नमस्कार के पीछे
एक वैज्ञानिक कारण यह भी है कि जब हम नमस्कार करते हैं तो हमारे हाथों की हथेलियाँ
आपस में जुड़ती हैं जिससे अंगुलियों के माध्यम से एक दबाव पैदा होता है जो हमारी
याददाश्त को मजबूत बनाने में सहायक है ।

