कैस्केडिंग इफ़ेक्ट

अरुणिता
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(एक स्मृति की खोज में लिखी गई कथा)

 सुबह के नौ बजे थेबाउंड्री वाल में बने हुये गमलों में सलीके से लगे हुये Portulaca भी किसी पंक्चुअल कर्मचारी की तरह अपनी डालियों पर अपनी अनोखी धज दिखा रहे थे। वहीं मैं अपनी कॉफ़ी के साथ बालकनी में बैठा अख़बार के पन्ने उलट रहा था। ध्यान तब टूटा जब मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम देखा—"गुलाम अली साहब"।

 गलम अली साहब उम्र में अस्सी के करीब हैंसिंधी शायर हैंशायरी में खूब नाम कमाया हैपेशे से  इंजीनियर रहेजब तक नौकरी में थे तो इंदौर में ही रहेअब रिटायर होकर दुबई में रह रहे हैं।

 आज के जमाने की सबसे अच्छी कही जाने बातों में शुमार यह भी है किसाहित्य और सोशल मीडिया ने दुनिया को इतना नजदीक कर दिया कि जिनसे रूबरू नहीं हुए वे भी अच्छे परिचित हो जाते हैं। यही मेरे और गुलाम अली साहब के बीच हुआहमारी कभी मुलाक़ात नहीं हुईमैं इंदौर के पास 'महूका रहने वाला हूँलेकिन पिछले तीन-चार सालों से सोशल मीडिया के एक एप से उनसे परिचय हुआ और यदा - कदा बातचीत भी... अब अक्सर बातें होती हैं। ज़िंदगीमौतइश्कमोहब्बतशायरीनिर्वानज़ुबान— हर बात पर। कभी लगता हैमैं ही उनकी अगली किताब का पात्र हूं। पात्र ही क्यों नायक हूँ ।

आज जब सुबह-सुबह अली साहब का फोन आया तो थोडा अजीब लगा थाआवाज़ अब भी वही थी— धीमीथकी हुई पर हर लफ़्ज़ में जैसे वक़्त ठहरा हो।

सलामजनाब,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

इधर-उधर की कुछ बातों के बाद उन्होंने कहा—"आज तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।"

मैंने बेतकल्लुफ होते हुये कहा- "अरे! उसमें सोचने वाली क्या बात है ? कह डालिये जो भी कहना है।"

उनकी बातों से संकोच साफ झलक रहा था। अपने शब्दों को थोड़ा रोक रोक कर बोलते हुये बोले-

"एक अजीब सी फरमाइश करनी है।" 

आवाज़ बहुत धीमी थीजैसे कोई ज़िक्र करने से पहले साँस रोकता है।

मैं मुस्कुराया—"आपकी हर बात ही कुछ अलग होती हैआपका कहा तो हमेशा कहा जाता हैऔर मैं हमेशा सुनता हूँ। अजी सुनना पड़ता है... हाहाहा ।"

मेरी आशा के अनुरूप वे हँसे नहीं। दूसरी ओर से आई चुप्पी लंबी थीसाँसे बोझिल। उन्होंने कहा - 

मैं एक आदमी को ढूंढना चाहता हूं,” वे बोले। “पर न उसका नाम मालूम हैन पता।”

मैं चौंका क्योंकि इतनी उलझी हुई फरमाइश की उम्मीद नहीं थी।

 

"फिर कैसे खोजें?" मैंने हँसते हुए पूछा।

"बस... एक याद है। बहुत पुरानी। 1951 की बात है।”

जीबताइएअलबत्ता बात पुरानी है परसुनना दिलचस्प होगा।”

मैं आठ साल का था,” उन्होंने कहना शुरू किया। “तब मैं पिताजी के साथ इंदौर में रहता था। हम दोनों भंवरकुआं सिंधी कॉलोनी से निकलकर फिल्म देखने जा रहे थे। रास्ते में एक छोटी सी नदी पड़ीशायद कान्ह। नदी किनारे बतखें और बत्तखों के नन्हे बच्चों को देख मेरा बाल मन वहीं रुक गया। उसी वक़्त मैंने देखानदी में कुछ हिलामुझे लगा जैसे कोई बच्चा डूब रहा हो।”

मैंने पिताजी से कहा- "पिताजी नदी में कुछ गिरा है।

उन्होंने झिड़क दिया— " गिरने दो तुम्हें उससे क्या ? देर हो रही हैफिल्म शुरू होने वाली हैचलो यहाँ से।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए कहालेकिन मैं अड़ा रहा। चलने को टस से मस नहीं हुआआख़िर पिताजी को भी रुकना पड़ाउन्होंने लोगों को बुलाया। कुछ लोग नदी में उतरे और वहाँ सच में एक बच्चा था जो नदी में डूब चुका था। उन लोगों द्वारा जब वह बच्चा नदी से निकाला गया तो मैंने देखा वह लगभग तीन या चार साल का होगा। मुझे लगा वह शायद काँप रहा था। शायद रो भी रहा था। हम लोगों के सामने ही बच्चे को उसके परिवार को सौंप दिया गयातसल्ली हुई तो फिर हम लोग पिक्चर देखने चले गए।”

इतना कह कर वे चुप हो गये और उन्होंने एक लंबी साँस ली फिर बोलना शुरू किया-

तब बचपन की घटना को मानो पढ़ाई, शादी, परिवार और फिर नौकरी में भूल ही गया। कभी उस बच्चे को देखनेखोजने की सुध भी न आईलेकिन कुछ घटनाएँ हमारे विस्मृत मन का ऐसा हिस्सा हो जाती हैं कि उन्हें ऐसे भुलाया नहीं जा सकतामैं भी उसे एकदम भूल नहीं पाया। वो घटना अब मेरे अवचेतन में एक पत्थर पर बनी हुई लकीर के जैसी अंकित है जिस पर समय ने अपने धुंध बिछा दी थी। पर आज अचानक सुबह नींद खुली तो लगा कि अब उससे मिलना ज़रूरी है।”

इतने साल बाद?” मैंने पूछा।

उन्होंने ने कहा -

"क्योंकि अब जिंदगी की शाम आ गई है। सोचता हूंउस बच्चे का क्या हुआ होगा।

हो सकता है वह कोई वैज्ञानिक बन गया हो जिसने कोई नया अविष्कार किया होया फिर कोई डॉक्टर जिसने हज़ारों की जान बचाई होया फिर पायलट जिसने लाखों लोगों को एक देश से दूसरे देश जाने में सहायता की होया ... कुछ और ? कुछ भी हो... पर मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी उस छोटी सी जिद ने क्या बदल डाला इस दुनिया में?"

जी... लेकिन...!” मैं दुविधाग्रस्त बस इतना ही बोल पाया पर उन्होंने कहा, “क्योंकि अब समझ आता है कि वह एक सामान्य घटना नहीं थीवह मेरे जीवन की एक जिम्मेदारी थीलेकिन अफसोस कि अधूरी रही। इंदौर में रहते यह मुमकिन न हुआलेकिन अब...।”

मैंने धीमे से कहा, "यह भी तो हो सकता है कि वह बच्चा कुछ बुरा बना हो... कोई अपराधी?"

उधर कुछ पल की चुप्पी रही। फिर उन्होंने कहा, "तब तो और भी ज़रूरी है जानना... क्योंकि तब मुझे यह जानना होगा कि अनजाने ही सही पर मैंने क्या अनजाने में रच..."

उस शाम मैं देर तक बालकनी में बैठा रहा। हवा में नमी थीशायद आने वाली बारिश की। नीचे बच्चे खेल रहे थेगली के कुत्ते भौंक रहे थेकहीं दूर कोई मंदिर की घंटी बजा रहा था।

और मैं सोच रहा था— कितनी अजीब बात है कि हम अपने जीवन की सबसे साधारण घटनाओं को कितना मामूली मान लेते हैंजबकि वही किसी और के जीवन की दिशा तय कर सकती हैं। शायर साहब की बात ने जैसे मुझे भीतर तक हिला दिया था। क्या हममें से कोई सोचता है कि हमारी छोटी सी जिदहमारी एक मुस्क़ुराहटकिसी को रोका गया एक कदम... किसी दूसरे व्यक्ति की पूरी ज़िंदगी का खाका बदल सकता है?

हम जो कुछ भी करते हैं वह हमारा कर्म होता है जो संसार सागर में वैसे ही बहता रहता है जैसे कुछ पत्ते बहते हैं किसी नदी में... और कभी-कभीकिसी अनजान किनारे पर जाकर किसी की ज़िंदगी बचा लेते हैं... या बदल देते हैं।

मुझे यह तो पता था कि यह नामुमकिन न सही पर मुश्किल तो है। 1951, एक अनाम बच्चाएक भूला हुआ किनारा।

पर गुलाम अली साहब कोई आम बूढ़े नहीं हैं। वे एक बाजर्फ़ शायर हैं... एक ऐसा शायर जो बुढापे में कुछ अजूबा सोचता हैवह उम्र के आख़िरी पड़ाव में भविष्य की तलाश में उतरता है— अतीत की नदी से।

मैंने उनका मन रखने के लिये कहा, “ठीक हैबताइए और क्या याद है आपको उस घटना के बारे में?”

वे चुप हो गए... काफी देर की चुप्पी के बाद कुछ सोचते हुये बोले, “शायद वह बच्चा नदी के दाईं तरफ़ था… जब कुछ लोग उसको नदी से बाहर निकाल रहे थे तब मैंने देखा उसके बालों से एक लाल रंग का रिबन छूटकर पास में ही तैर रहा था…”

रिबन?”

हांशायद किसी मान - मनौती के कारण उसका अब तक मुण्डन न हुआ हो या फिर लड़की की चाह में उसकी माँ ने या फिर उसकी किसी बड़ी बहन ने लाड़ मेंउसके बाल बांधे होंगे… या… कौन जाने… यह भी हो सकता है वो बच्ची थी।”

मैंने खीझते हुये सोचा, "अब ये कौन सा नया पेंच है... कैसे पता कि वो बच्ची थी?"

 

लेकिन शायद शायर साहब ने मेरे मन की बात सुन ली और बिना पूछे ही जवाब में कहा- "मेरा मन कहता है किवह बच्ची ही थी।"

अब कहानी बदल रही थी। वह जो अब तक बच्चा था... अब "वह बच्ची" हो चुकी थीऔर वह नदी अब स्मृति का बहता हुआ जल नहीं बल्कि आत्मा का एक ऐसा तल था जहाँ सत्तर वर्षों से एक नाम डूबा पड़ा था।

दो दिन बाद मैंने एक पुरानी डायरी निकाली जिसमें मैं शायर साहब के कहे कुछ शेर नोट कर लिया करता था। एक पन्ने पर लिखा था:

"मैंने जिद की थी इक बच्चे को बचा लूँ नदी से,

अब उसी जिद में डूबा हूँ कि वो क्या बन गया होगा।"

यह पढ़कर मैंने तय किया कि मैं उस बच्चे को तलाश करूंगा। जानता था यह काम भूसे के ढेर में राई ढूँढने जैसा काम थाफिर भी सोचा कि... शायद नहीं मिलेगा वह बच्चालेकिन खोज की कोशिशउस बूढ़े शायर की कविता जैसी होगी— बेहद खूबसूरतबेहद सच्ची।

मैंने अगले हफ्ते इंदौर की यात्रा की योजना बनाई। घर में किसी को बिना बताये... किसी को बताना भी बेकार था। ‘एक बूढ़े शायर के कहने पर 1951 में डूबती एक बच्ची की खोज!’ यह वाक्य ही उपहास के योग्य था।

   हालाँकि इंदौर वही थापर वही होकर भी वही नहीं था। भंवरकुआँ अब ट्रैफिक से भरा एक क्षेत्र बन गया था जो बाहर छोटे शहरों और गाँवों से पढ़ने की चाह में आये बच्चों से खचाखच भरा हुआ थाऔर उस 'यादका घटना स्थल वो नदी… वो अब एक बदबूदार नाला थीजिसके किनारे बहुमंज़िला इमारतें और चाय और मैगी की टपरियाँ थीं।

अब मैंने उस अनाम बच्ची की खोज शुरू की... कुछेक लोगों से इस घटना का जिक्र भी कियालेकिन ये सब अँधेरे में तीर चलाने जैसा था...। किसी ने सुझाव दिया- अखबार में इश्तिहार दिया जाएयह मुझे ज्यादा आसान और सही तरीका लगायह वाकई काफी सरल था। पर क्या यह सच में काम करेगाक्या वह बच्ची जो अब बहुत बूढ़ी हो गयी होगी... अब भी अखबार पढ़ती होगी या कोई और उसे यह खबर पढ़कर सुना ही देगा?

खैर अखबार में इश्तहार देने की खानापूर्ति करने के बाद मैंने उस बच्ची को अपने तरीके से ढूँढना जारी रखा।

   एक दोपहरउस अनाम बच्ची की खोज से थक हार मैं वहीं एक पुराने लकड़ी के घर के सामने तिपाई पर बैठा थातभी वहाँ एक वृद्ध महिला आई। सफेद साड़ीहाथ में सब्ज़ी का थैला। शायद वह भी चलते-चलते थक गई थी इसीलिए सुस्ताने के लिये मेरे बगल वाली जगह में बैठ गईं। 

मैंने उनसे यूँ ही पूछ लिया, "आप यहीं की रहवासी हैं?"

"हाँ..." उन्होंने साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुये अति संक्षिप्त उत्तर दिया पर मैंने फिर पूछा, “क्या आप 1950 के आस-पास भी यहीं रहती थीं?”

उन्होंने हँसकर कहा, “इतनी उम्र लगती है क्या मेरी?”

"अरे नहीं।" कहकर मैंने मुस्कुरा कर अपनी खोज का उद्देश्य बताया।

वो रुक गईं फिर उनके बूढ़े झुर्रीदार चेहरे पर एक के बाद एक कई रंग आये।

कुछ देर की चुप्पी के बाद वे बोलीं, “मेरी माँ अक्सर एक बात बताया करती थीं… कि किसी साल एक बच्ची कान्ह नदी मर में डूबते डूबते बच गई थी... और वो बच्ची कोई और नही बल्कि...वो... वो मैं थी।”

उनकी बात सुनकर मैं सिहर गया और स्तब्ध उनके चेहरे को देखने लगा।

आगे उन्होंने बताया- '‘मेरा नाम कमला है। किसी समय नर्स रह चुकी हूँ। अब दस साल से अधिक हुए पति नहीं रहेबेटा विदेश में रहता है।’

और यह भी बताया किवे अब सत्तर के पार थीं।

मैंने पूछा, “क्या आपको उस घटना के बारे में कोई और बात याद है?”

उन्होंने कहा, “नहींमाँ की कहानी भर है।"

मैं आश्चर्यचकित थामैंने फिर पूछा, "माँ की कहानी में से कुछ और...उन्होंने सोचते हुये कहा था, "मुझे नदी में डूबते हुये एक बच्चे... नहींकिसी छोटे लड़के ने देखा थाजो वहाँ से अपने पिता के साथ कहीं गुजर रहा था... रुक गया था। फिर उसके पिता या फिर कुछ और बड़े लोगों ने मुझे बचाया था।”

उनकी बात सुनकर मुझे विस्मित होते देख कर उनके चेहरे पर जो भाव आये उन्हें देखकर मैंने उन्हें गुलाम अली साहब की बात बताई।

वो बहुत देर तक चुप रहीं। “मतलब मैं उनकी जिद की वजह से ज़िंदा हूं?” उन्होंने धीमे से पूछा।

शायद हाँ।”

"अगर गुलाम अली साहब चाहें तो मैं भी उनसे मिलना चाहूँगी।"

लौटकर जब मैंने दुबई... गुलाम अली साहब को फोन पर सारा वाकया सुनाया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा— “कमला... कमाल है!”

कुछ महीने बाद गुलाम अली साहब चल बसे। उनके अंतिम कविता-संग्रह में यह पंक्ति थी, “ज़िंदगी की सबसे बड़ी कविता वो होती हैजिसे तुमने लिखा नहींबस किसी को डूबने से बचा लिया।”

पूजा अग्निहोत्री 

बिजुरीअनुपपुर

मध्य प्रदेश 

 

 

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