बहुत साल हो गया गुरु जी को हमने याद नहीं किया। और गुरु जी को भी हम कहां याद रहे होंगे..! इस बदलती दुनिया में, बदलते समय में कौन कब बदल जाए आकलन करना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन हो गया है। ऐसे में कहा जाता है कि पूछते पूछते लोग कहां से कहां पहुँच जाते हैं । इसी पर हमारे यहां एक कहावत है, पूछते पूछते लोग कछाड़ पहुँच जाते हैं। यह कछाड़ है कहां आज तक कोई बता नहीं सका। बस बचपन से सिर्फ यह नाम और कहावत ही सुनता चला आ रहा हूँ। एक दिन मैं भी खोजते- खाजते, पूछते- पाछते गुरु जी के गाँव घर पहुँच गया। परन्तु यहां पहुंचना अचानक नहीं हुआ। अचानक कुछ होता भी नहीं है। जिस तरह हर घटना के पीछे कोई कारण होता है, उसी तरह किसी से मिलने जुलने का संयोग बनता है तो उसका कोई माध्यम भी बनता है। गुरु जी के गाँव जाने का माध्यम बना चन्द्रदेव। वह चिलगो का एक संजीदा समाजिक कार्यकर्ता था। फेसबुक पर मैंने एक दिन पूछा –“ आप कहां से हो। उसने लिखा " चिलगो "
मैंने पूछा कि " विशेश्वर महतो " को जानते हो?
" हां जानता हूँ। अब वो रिटायर हो गये है और घर में ही रहते है..! "
" उनके बेटे महेन्द्र को भी जानता होगा..? "
" कौन महेन्द्र मै उसे नहीं जानता " उसने इस नाम से अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा " उनका एक ही बेटा है नाम मिथलेश है..। "
" शायद वही हो, हम उसे महेन्द्र के नाम से जानते है। अभी वह क्या कर रहा है..?"
" पटना में कोई जॉब कर रहा है..! "
" कभी मिले तो उसे मेरे बारे बताना..। "
" जरूर दा.. जोहार..! "
" जोहार जोहार..! "
अभी कुछ ही घंटा बीता था कि एक अनजान नंबर पर फोन आया " हेलो! हेलो ! "
" हेलो ! कौन बोल रहा है..? "
" मैं महेन्द्र बोल रहा हूँ दादा, आप बुटल दा ही बोल रहे है न..?"
" ओह ! महेन्द्र ! हां, मैं बुटल दा ही बोल रहा हूँ महेन्द्र, यह मेरा नंबर कहां से मिल गया तुमको..? "
" चन्द्रदेव ने दिया, उसी ने बताया कि आप बाबूजी और मेरे बारे पूछ रहे थे..! "
" हां, यह संयोग कहो कि उसके एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से जाना कि वह भी चिलगो से है। बाबूजी कैसे है महेन्द्र..? "
" बिलकुल ठीक है, वो आपको बहुत याद करते हैं। मैं बाजार आया हूँ, रूकिए शाम को बाबूजी से आपका बात कराते हैं..! "
" ठीक है..महेन्द्र ! "
उस दिन शाम को गुरु जी से ढेर बहुत सारी बातें हुई। बरसों बाद गुरु जी से बातें करने से मन प्रफुल्लित था। उस गुरु जी से जिसने बोलना सिखाया, चलना सिखाया और सबसे बड़ी बात जिन्होंने हमें पहली बार जल जंगल जमीन की महता के बारे बताये थे। अगर अपने गाँव में हमने बारह बरस जंगल बचाओ अभियान चलाया था। तो प्रेरणा श्रोत गुरु जी ही थे। बात करते करते अंत में उन्होंने मिलने की बात कह दी " बुटल तुमको मेरे घर आना है। तुम्हें नजदीक से देखने की बड़ी तमन्ना है। तुम्हारे बाल बच्चों के बारे जानना है, मैं पचीस साल तुम्हारे गाँव में गुजारे है, क्या एक दिन तुम मुझसे मिलने मेरे घर नहीं आ सकता, बोलो कब आ रहे हो..? "
" बहुत जल्द गुरु जी, महेन्द्र को बता दूंगा.. प्रणाम..! " और फोन डिस्कनेक्ट हो गया था।
दस वर्ष की उम्र से बीस वर्ष की उम्र तक हम गुरु जी के साथ रहे। इस बीच ऐसे कई मौके आए जब गुरु दक्षिणा की बातें आई पर वे हमेशा कहते रहे " तुम लोग आगे बढते रहो, मेरे लिए यही गुरु दक्षिणा होगा "
मैंने गुरु जी से मिलने हेतु उनके गाँव जाने का एक नेक दिन और समय चुन लिया था । फेसबुकिये कुछ दोस्तों की सलाह थी कि " कोनार डेम नहीं देखा है, तो देखने का मौका मिल जायेगा , बहुत रमणीक जगह है..! "
" ओ कैसे..? "मैंने पूछा था।
" आपको कोनार डेम होकर ही चिलगो जाना है..। "
मैं पुनः अपने घर से गुरु जी के घर की दूरी और समय का अनुमान लगाया। करीब दो घंटे का समय लगना पक्का था। जाने की पूरी तैयारी कर लिया था। गुरु दक्षिणा में गुरु जी को देने हेतु अपनी प्रकाशित पांच पुस्तकें बेग में रख ली थीं। पेड़ जीवी गुरु जी को यह कहां पता था कि उनका पढाया एक पढाकू शिष्य लेखक बन गया है और श्यामल बिहारी महतो के नाम से सृजनात्मक रूप से जुडा हुआ है। खैर निर्धारित दिन को जब प्रातः चिलगो पहुंचने का प्रोग्राम बना तो मन अति उत्साहित था। उस दिन रविवार था। सुबह दस बजे घर से चल पड़ा तो दिल में कई हसरतें लिए हुए था। कोनार डेम के बारे में बहुत सुन रखा था। पर कभी नजदीक से देखा नहीं था। पहली बार उसे नजदीक से देख सकूंगा। सुना है वहां मछली पालन और नौकायन भी होता है, दूर दूर से लोग वहां आते हैं। उधर एक दशक से झूमरा पहाड़ का भी नाम सुर्खियों में था। झूमरा पहाड़ की तलहटी पर बसे गाँव चर्चा में थे। नक्सल के भय से विकास की कोखें खाली खाली थीं। आस पास के गावों का विकास रूका हुआ था। गाँव की सड़कें और पुल पुलिया का काम रूका पडा था। सरकारी पहिया उधर जाती ही नहीं थी। नक्सली डर डेंगू की तरह चारों तरफ फैला हुआ था। पर अब वो खौफ नहीं था । अब वो दौर समाप्त हो चुका था। डेंगू का भी इलाज होने लगा था और डहर बाट का भी बनना शुरू हो गया था। सरकारी पहिया सगरो दौडने लगी थीं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी विकास की लकीरें खींची जाने लगी थीं। पहले यहां नक्सली और ग्रामीण में फर्क करना मुश्किल था। लोगों के मन में एक खौफ भरा भरा रहता था। राहत की बात यह थी कि अब नक्सली भी राजनीति के मुख्य धारा से जुडने लगे थे। कोई मुखिया तो कोई जिला परिषद सदस्य बन रहे थे। जनता से उनका जुडाव होना एक नये युग की शुरुआत थी। गाँव समाज में समाजिक बदलाव का दौर शुरू हो चुका था । यद्यपि उन दिनों झूमरा पहाड़ को नक्सलियों का मांद कहा जाता था। फिर भी मिथलेश ने मोबाइल पर रोड मेप भेज दिया था " गाइड " के रूप में।
घर से निकला तो मेरे संग संग गुरु जी के संग बिते दिनों का एक सिलसिला सा चल पड़ा था। हांलाकि गुरु जी का हमारे गाँव में आगमन बड़ा भीषण गर्मी में हुआ था। तब गाँव में बिजली नहीं थी। लोग पेड़ के नीचे खटिया डाल पडे रहते थे। यह मई का महीना था और यह उन्नीस सौ छिहतर का साल था । विशेश्वर महतो के रूप में एक उन्तीस वर्षीय धोती कुर्ता धारी युवा शिक्षक मिलने जा रहा था मुंगो स्कूल को और मै आठ दस साल का एक दम से घोंचू लडका था। स्कूल के पहले दिन मैं ही उनको पहला विधार्थी के रूप में मिला था। मैं पढने में जैसा भी था। लेकिन स्कूल रोज जाता था। उसके पूर्व प्राथमिक विद्यालय मुंगो का अरूण राय मास्टर हुआ करता था। कुर्ता पायजामा में किसी मदरसे का पक्का मौलवी लगता था । लंबी लंबी उनकी टांगें और शाही जैसे बाल ! एक अजुबा की तरह। था भी एक दम मख्खी चूस और कंजूस ! स्कूल एक कमरे वाला था । बाद में ग्रामीणों के सहयोग से एक कमरा और बना, पुराने कमरे के एक कोने में ही अरूण राय सर ने अपनी विस्तर लगा रखी थी। वहीं एक टीन के डिब्बे में खजारी (मूढी) भर कर रखता था । जात के भूमिहार थे। हर दिन किसी बच्चे को बैंगन तो किसी को टमाटर और किसी से मुराई( मूली) लाने को कहते थे, दिन भर वही खाते नज़र आते। जो नहीं ला देता उस दिन मार कर उसकी पीठ लाल कर देते थे। दौलत महतो एक दिन पेंट में पेशाब कर लिया। उस दिन से उसे कुछ लाने नहीं कहता । उधर माता पिता को लगता स्कूल का पाठ याद नहीं किया होगा । तभी गुरु जी ने उसे पीटा होगा। उस दौर के मां बाप अनपढ़ जरूर होते थे लेकिन मूर्ख नहीं होते,उनकी अपनी समझ होती थी । आज की तरह डंडा लाठी लेकर कोई गुरु जी पर दौड़ नहीं पडते थे। तब गुरु का भी बड़ा महत्व होता था। गुरु जी मतलब ज्ञान के भंडार, ज्ञान के देवता और देवता से लोग आशिर्वाद लेते थे,उन्हें पीटते नहीं थे।
मुंगो स्कूल में विशेश्वर गुरु जी का आना और अरूण राय का गिरिडीह जाना एक साथ हुआ था। अरूण राय गिरिडीह का रहने वाला था। यह एक मिच्चुअल ट्रांसफर था । विशेश्वर गुरु जी का मुंगो स्कूल में आना जैसे एक क्रांतिकारी शुरुआत थी । उस समय स्कूल में पठन पाठन बहुत अच्छा नहीं था। बहुत कम बच्चे स्कूल आते हालांकि मुंगो चिलगो की तरह नक्सल प्रभावित गाँव तो नहीं था पर शराब ने यहां माहौल काफी खराब कर रखा था। मां बाप शराब में डूबे रहते और बच्चे दिन भर आवारा गर्दी करते। ऐसे घरों में गुरु जी सुबह सुबह पहुँच जाते और बच्चों के माता पिता से मिलते तब वे पिये हुए नहीं होते, उन्हें पढाई की महता समझाते उनकी यह मेहनत रंग लाई। कुछ ही दिनों में स्कूल में बच्चों की संख्या में इजाफा होना शुरू हो गया । साल डेढ़ साल होते होते स्कूल बच्चों से भर गया। गाँव वालों को लगा पहली बार अच्छा गुरु जी मिला है स्कूल को । स्कूल कुछ ही दिनों में गुरुकुल की तरह लगने लगा और बच्चे अनुशासित दिखने लगे। स्कूल के हिस्से में सामने एक बड़ा भूभाग खाली पडा हुआ था । जिस पर गाँव वाले जगह जगह शौच - पाखाना कर गंदा कर देते थे। गंध स्कूल तक आती थी। जिसे पठन पाठन में बड़ी दिक्कतें आती थी। एक शाम गाँव के कुछ गणमान्य लोगों के बीच गुरु जी ने उस समस्या को सामने रखा और निदान चाहे। दूसरे दिन भंडारी बखरी के तुला महतो और जया महतो और परगनैत बखरी के मनि महतो ने अपने स्तर से महिलाओं और बच्चों को हडकाये तो स्कूल को राहत मिली। तुला महतो और मनि महतो दोनों महिलाओं के प्रति बडे़ मुंह फट थे। महिलाओं को कुछ भी कह देते थे। इस वजह ज्यादातर महिलाऐं इन दोनों से दूर दूर रहतीं थीं । बुरे मुंह के कारण मनि महतो का बुढापा भी बड़ा बुरा गुजरा । इधर गुरु जी के आग्रह पर जानवरों का भी वहां चरने पर रोक लगा दी गई। गोबर तो वे भी कर देते थे। इस तरह गुरु जी को आते ही स्कूल को गंदगी से राहत मिली। लेकिन गुरु जी इसमें स्थायी समाधान चाहते थे।
मुंगो महतो बहुल गांव था। और गुरु जी भी कुडमि महतो थे। कई घरों से उन्हें अपने घर में रहने का ऑफर आया। पर गुरु जी ने जीतू महतो के घर में रहना पसंद किये। राधेश्याम उनका एक मात्र पुत्र था। जीतू महतो गाँव का नामी किसान था। घर का सुखी सम्पन्न था। अब गुरु जी के जिम्मे राधेश्याम की शिक्षा दीक्षा का पूरा भार था। जैसे विश्वामित्र को राम लखन सौंप दिया गया था। राधेश्याम को भी गुरु जी को सौंप दिया गया। ताकि पढ़ लिख कर मास्टर ना सही गाँव का एक अच्छा आदमी तो बन जाए।
गुरु जी खुद एक किसान परिवार से थे। उनका जन्म ग्राम चिलगो, थाना चतरोचटी, प्रखण्ड गोमिया, जिला हजारीबाग में एक मध्यम किसान घर में सन उन्नीस सौ सैंतालिस में हुआ था। बचपन से ही वो पढने में काफी तेज थे। पर आर्थिक अरूपता के कारण पढाई संघर्षों के बीच हिचकोले खाते आगे बढता रहा। कभी किताबों की कमी तो कभी ढंग के कपड़े नहीं । लेकिन इन्होंने पढाई में कभी ढील आने नहीं दी। पढाई के प्रति जो ललक और लगन थी, वो बचपन से ही उनके चेहरे पर साफ झलकती थी। इस तरह अनेकों उतार चढ़ाव को ठेलते धकेलते उन्होंने सन उन्नीस सौ पैंसठ में उच्च विद्यालय विशुनगढ से ग्यारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर चिलगो गाँव के चर्चा के केन्द्र में आ गए और पिता का नाम रोशन कर गये । उनके कदम यहीं नहीं रूके । जुलाई पैंसठ से मई उन्नीस सौ सडसठ तक दो वर्ष का शिक्षक प्रशिक्षण भी चितरपुर हजारीबाग से पूरी कर जब गाँव लौटे तो एक पूर्ण गुरु जी बन चुके थे।
मुंगो स्कूल में उनका पद स्थापना स्कूल के इतिहास में एक नये युग की शुरुआत थी।
अब गुरु जी उन घरों में भी फिर से जाना शुरू किये जिनके बच्चे अब भी स्कूल नहीं आते थे और उनके माता पिता बच्चों को दिन भर गाय बैलों के पीछे लगा कर खुद दूसरे कामों उलझे रहते। ऐसे लोगों को समझाना गुरु जी के लिए आसान काम नहीं था। लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी और बडी़ सुझ बूझ के साथ व्यवहारिक रूप से अपने मिशन में लगे रहे । स्कूल न आने वालों में एक बच्चा मैं भी था। मेरी माँ नजदीक के खदान में खटने जाती थी और बाप रमा मोदी के साथ झाड फूंक में लगा रहता। गुरु जी माँ से मिले। माँ ने बाप से पंगा ले ली। बैलों का संग छुडाये और एक दिन खुद स्कूल छोड़ गयी थी। तब से मैं जाडा गरमी और बरसात गुरु जी के पीछे साये की तरह लगा रहा।
स्कूल में गुरु जी ने दूसरा काम किये स्कूल के मैदान को दो भाग में बांट दिये। खेल के लिए अलग और बागवानी के लिए अलग। एक पेडजीवी गुरु जी का पहला दर्शन हुआ । कुछ पेड़ों के पौधे उन्होंने पहले ही तैयार कर रखे थे। पानी पडते ही आषाढ में कई गढ्ढे हम लोगों से खुदवा डाले। और पंद्रह अगस्त के दिन बोले " सभी को आज एक एक पेड़ लगाने हैं और उसका घेरावन भी खुद करना है। तरीका मैं बताऊंगा। जिसका पेड़ लगेगा वो उसके नाम से जाना जायेगा..! "
पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ बिरासी को स्कूल के आंगन में आम, जामुन और बेल के पेड़ लगाये गये। उसी साल सताइस सितम्बर को जहिरथान में गुरु जी ने गांव वालों के सहयोग से पीपल और बरगद के भी पेड़ लगाये जो आज भी जिन्दा है। इस तरह पेड़ से पर्यावरण को जोड कर गुरु जी ने जो संदेश दिये, उसका अनुकरण आज भी लोग करते हैं।
पेड़ कैसे लगाये जाते हैं और उसकी रखवाली कैसे किया जाता है जीवन में तब हमने यह पहली बार देखा और सीखा था। हम सब बच्चे बडे़ उत्साहित थे। हमने पेड़ लगाये यह सोच दिल बाग बाग हो रहा था। उधर गुरु जी भी दूने उत्साह से भरे हुए थे । स्कूल को साफ़ सुथरा रखना। जहां तहां थूक खखार नहीं करना। यह सब गुरु मंत्र था।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। गुरु जी का पढाने का अंदाज़ बड़ा निराला था। पढाते पढाते कभी गुरु भक्त आरूणि की कथा कहने लगते तो कभी ईदगाह के हमीद की कहानी सुनाते। महीना में एक दिन हमें जंगल घुमाने ले जाते। फिर जंगली पेड़ पौधों और कंद मूल के बारे में बताते जो काफी ज्ञानवर्धक होता। तभी हमने जंगली बेर, केंद, भेलवा, खाखसा, कुंदरी और पियार जैसे फलों के बारे जाने थे। शाम होने के पहले हम घर लौट आते थे। इसी बीच शिक्षक दिवस आ गया। गुरु जी ने सभी बच्चों को एक एक टिकट दिए और कुछ पैसे लाने को बोले जो मामूली होकर भी बहुतों के लिए भारी था। कई दिन बाद भी तेजलाल जब टिकट के पैसे नहीं लाया तो एक दिन गुरु जी पूछ बैठे " तुमने टिकट के पैसे नहीं लाया..? "
" मालिक ने पैसे नहीं दिया है, इसलिए पिता जी ने पैसे नहीं दिया..! "
" कौन है तुम्हारे बाप का मालिक..? कल पिता जी को स्कूल लेते आना..! "
अगले दिन पिता के संग तेजलाल स्कूल आया। गुरु जी ने पैसे की बात पूछी तो उसके बाप ने कहा " मालिक एक दो दिन में कमाय का पैसा दे देगा तो यह ला देगा..। "
" आप किस मालिक की बात कर रहे है वही तो जानना था। "
" सेठ परमेश्वर साव! "
" अरे, वो सेठ है मालिक नहीं है, मालिक तो उपर वाला है उससे बड़ा मालिक कोई नहीं है। ठीक है आप जाइए..! "
उस साल की बागवानी में कुल सात पेड़ लगे थे तीन आम, दो जामून, एक बेल और एक कोनार का पेड़। बाकी कुछ जानवर के पेट में समा गए और कुछ मर गए। लेकिन पेड़ रोपण का काम उसके बाद भी हर साल जारी रहा। इसी बीच जपानी पद्धति से खेती करने की गुरु जी के मुख से हमने सुना । जानने का यह अलग ही विषय था हमारे लिए।
इससे पहले जपानी विधि का गाँव में किसी ने नाम तक नहीं सुना था। एक नया चीज देखने को मिल रहा था।
जपानी विधि से गुरु जी ने पहले मकई लगाई जो बेजोड़ रहा । बड़ी सोलीड विधि लगा। मकई के पौधों को एक कतार में बढते देखना। बहुत अच्छा लग रहा था। तभी एक खेत में उन्होंने जपानी विधि से धान लगा कर गाँव वालों को चौंका दिये। बहुतों ने कहा " गुरु जी तो खेती करने में भी मास्टर है, इनके पास ज्ञान का भंडार भरा है..!" अधिक उपज देख लोग चकित थे।
समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। हम मिडिल स्कूल चले गए, वहां से हाई स्कूल। परन्तु विशेश्वर गुरु का साथ बना रहा। इधर मुंगो स्कूल का बाउंड्रीवाल हो गया ! पेड़ों के साथ साथ स्कूल के लिए भी बहुत अच्छा हो गया था । अब स्कूल कैम्पस पुरी तरह सुरक्षित हो गया था। और पेड़ बेहद मनमोहक लगने लगे थे । कभी वहां पाखानों का ढेर हुआ करता था। अब एक सुंदर बगिया बन चुका था । जो राह चलते लोगों को अकस्मात अपनी ओर खींचने लगा था। हर पेड़ में गुरु जी अनजर आ रहे थे।
समय के साथ मेरे जीवन में और भी बड़ा बदलाव हुआ । माँ चल बसी थी। एक आकस्मिक दुर्घटना ने उसे हमसे छीन लिया था। उसकी जगह मैं नौकरी में आ गया । समय कम मिलने लगा । गुरु जी से विरले से मुलाकात हो पाती । जंगल छूट गया। गाँव समाज के साथ बैठकी छूट गया। जीवन बहुकामी में उलझकर रह गया। माँ की मौत से गुरु जी भी मर्माहत थे। माँ गुरु जी के प्रति बहुत आदर- भाव रखती थी।
तभी एक दिन पता चला। गुरु जी ने जीतू महतो का घर छोड़ दिये और जमुनिया टांड सोहराय महतो के घर चले गए। कारण का कुछ पता नहीं चला। जिनके घर में बरसों रहे, फिर अचानक उस घर को छोडने की नौबत आ जाए तो सवाल उठना स्वभाविक था। उठा भी लेकिन कारण का पर्दा धीरे धीरे उठा।
किसी गुरु के सामने उसके विद्यार्थी को कोई चोर कह दे, पुलिस उसके हाथ में हथकड़ी पहना दे। एक सम्मानित गुरु के लिए इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती थी।
वो घटना गाँव के इतिहास में अपने तरह की एक बहुत बड़ी घटना थी । लटन गाँव का एक बदनाम लडका था। माँ उसकी पूरे गाँव में बदनाम थी। जाने किस घड़ी राधेश्याम लटन की संगत में आ गया। "संगत से गुण आत है संगत से गुण जात है " की तर्ज पर लटन की संगत में आने से राधेश्याम कब लटनमय हो गया न घर वालों को इसका कुछ पता चला ना गुरु जी को ही इसकी भनक लगी। दोनों के विचार एक, दोनों की सोच में एकरूपता और दोनों के शक्ल सूरत भी एक सा लगता। पर दोनों की मायें दो थीं। लेकिन दोनों के हाव भाव बताता, दोनों के रगों में एक ही खून दौड़ रहा हो। अभी दोनों के ठीक से मूंछ-दाढ़ी भी नहीं निकले थे कि उन दोनों ने वो काण्ड कर दिए, जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था। गाँव की ही एक मोदीन(मुंडा) और उसके पति को उन दोनों ने पहला शिकार बनाया। दोनों कोलियरी से सप्ताहिक कमैनी पैसा लेकर शाम को कच्ची रास्ते से घर आ रहे थे। एक सुनसान जगह पर इन दोनों ने उन दोनों को घेर लिया। लटन ने एक लाठी मर्द की घुटने पर दे मारी। मुंडा मर्द दर्द से चीखते हुए जमीन पर बैठ गया । तभी राधेश्याम ने दूसरी लाठी मोदीन की पीछे चूतड़ पर जोर से दे मारी। औरत मरद दोनों जमीन पर । और उन दोनों की जान इन दोनों के हाथ पर ।
" सारे पैसे दे दो..! " लटन ने मुंह खोला।
" नहीं तो दोनों को जान से हाथ धोना पड़ेगा..! " राधेश्याम बोला ।
" अरे बाबू, काहे मारते हो, तुम दोनों हमारे बेटे के समान हो । दोनों को जानती हूँ..! "
" पैसे दो...। " लटन आगे बढ़ा।
" हल्ला करोगी तो गाँव में नहीं रह पाओगी...! "
राधेश्याम ने चेताया था ।
औरत मर्द को पैसे से ज्यादा जान प्यारी लगी ।
अगली सुबह दोनों थाने पहुँच गए। शाम ढलते ही पुलिस गाँव में पहुँच गयी। लटन को जुआ अड्डा से और घर में राधेश्याम को दबोचा लिया गया। पूरे गाँव में सनसनी फैल गई। दोनों के कारनामों से लोग हक्का बक्का ! सबकी आंखों में सवाल ही सवाल। दोनों खाते पीते घर के लड़के और दोनों अपने अपने माता पिता के इकलौते चिराग। अभी गाँव वाले इनके पीछे के कारणों पर चर्चा कर ही रहे थे कि आधा घंटा बाद ही बम फटने जैसा जोर का हल्ला हुआ " दोनों पुलिस को चकमा देकर हथकड़ी लेकर फरार हो गये..! "
गजब की हिम्मत ! पुलिस जीप से दोनों कूद गए थे। रात भर पुलिस उन्हें ढूंढती रही । लाठी पीटती रही। सुबह तक दोनों का कहीं कोई अता पता नहीं।
इधर सुबह सुबह जीतू महतो ने गुरु जी से कहा “ मास्टर, हम तो आपको बड़े सम्मान से रखा था कि बेटा पढ़ लिख कर अगर आप जैसा न भी बने तो गाँव का एक पढा लिखा आदमी तो बन जाए..पर चोर बन गया.. अब इस घर में मास्टर की क्या दरकार..! "
ये वाक्य और वो पल गुरु जी को असहज कर दिया था। गुरु जी के पढाये ऐसे कितने विधार्थी मास्टर वकील और कितने सिपाही दारोगा बन गए और जिन्हें वो सुबह शाम घर में पढाते थे वह गाँव का बदनाम लडका निकला । उसके बाद से ही वो जमुनिया टांड चले गए । परन्तु वहां भी उनका मन नहीं लगा और कुछ ही दिनों बाद स्कूल के एक कमरे में खुद को सिफ्ट कर लिए । दूसरे के घर में रहने की बजाय स्कूल में रहना उन्हें बेहतर लगा । लेकिन स्कूल में भी ज्यादा दिन नहीं रहे । जिस स्कूल को संवारने, उसे गुरूकुल बनाने में अपनी एक पुरी जवानी खपा दी, उसी स्कूल से अब मन उनका उचट चुका था । गाँव और स्कूल दोनों से जैसे उनका मोहभंग हो चुका था। मन विरक्ति से भर उठा था । रह रह कर विभिन्न तरह की भावनाएं मन में उठती रहतीं । ऐसे में मुंगो में मन को बांध कर रखना गुरु जी के लिए मुश्किल था ।
पचीस साल ! जीवन की एक चौथाई को मुंगो स्कूल को समर्पित कर देने वाले गुरु जी एक दिन मुंगो स्कूल से भी बोरिया विस्तर समेट कर चल दिए। देखने वालों ने देखा, स्कूल के बाहर कदम रखे तो एक पल के लिए वो भावुक हो उठे, पूरे मन से उन्होंने एक बार स्कूल का मुआयना किये,स्कूल कैंपस के विशाल पेड़ों को मुस्कुराते हुए देख उनकी आंखें भर आई। बिछडने का दुख तो हुआ पर मन को सुकून भी मिला। फिर जाते जाते उसने स्कूल कलेण्डर को याद किये " बीस सितम्बर उन्नीस सौ संतानब्बे लिखा था...। "
श्यामल बिहारी महतो
घर - मुंगो
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