ला कालेज की सीढियों
पर बैठ
मैं देख रहा खिलते
अमलतास को
भीषण गर्मी में खिल
गया है
पीताम्बर हो गया है
आंखों को दे रहा
सूकून
लू के थपेड़ों को
सहन करता
सोचता हूँ सहने है
थपेड़े मुझे भी
नहीं मुरझाना है
कष्टों में
दर्द में भी
मुस्कराना है
सहसा कचरा बीनती एक बाला
बोरा कंधे पर लटकाये
हुऐ
सुस्ताने लगी है
अमलतास के नीचे
मैं खो जाता हूँ
कहीं
किसने छिनी इसकी
शिक्षा
किसने डाला कंधों पर
बोझ
किशोरवय बन गयी
आजीविका
दो जून की रोटी के
लिए
कितनी घूरती आंखों
को देखती
कितने तिरस्कार सहती
अमलतास के पीले फूलों से लदी
टहनी तोड़ उसने
बालों में सजा ली
अमलतास बन गया उसका
गहना
मुसकान बिखर आई है ओठों पर
अमलतास तुमने खुशी
दे दी है
कचरा बीनती बाला को
अमलतास ऐसे ही खिलते
रहना
भीषण तपती धूप गर्मी
में
तुम्हारे फूल बन
जायेंगे
किसी का अनमोल गहना
वी पी दिलेन्द्र
111 / 436 मानसरोवर जयपुर - 302020
राजस्थान

