पिता: सशक्त कविता पुस्तक

अरुणिता
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 मीन केतन प्रधान की मार्मिक कविताएं

पिता की आवाज गायब हो गयी है पैरालिसिस से

मैं सुन रहा होता बहुत कुछ अनकही बातें

उन्हें जिलाए रखने की कोशिश भी नाकाम हो रही है

कितनी विवशता है

पिता की ही सांस सुनता रहा

बगल में बैठा रहा

पिता से दूर हटता नहीं था मैं

बना रहता एक डर

 मार्मिक दशा है पिता की

लकवा से क्लाटिंग हुई सिकुड़ी नसों में उतर नहीं पाता इंजेक्शन

ये जो कविता पंक्तियां पेश की हैं मैंने वे पुस्तक पिता से संबंधित हैं। कवि के रूप में सचमुच डा मीन केतन द्वारा अपने पिता जी पर रचित सारी कविताएं हमें संवेदनाओं के सागर में ही ले जाती हैं। संवेदनशील व्यक्तियों की आंखें नम हो सकती हैं।

जीवन में सांघातिक बीमारी तो बेइंतहा दर्द देती है और यहां तो पक्षाघात के चलते कवि का पिता ही भीतर ही भीतर तड़प रहा है, छीज रहा है । ये छीजन भी अव्यक्त । वह अपनी पीड़ा को भी बयां नहीं कर पा रहे हैं। जीना दुश्वार और तिल तिल कर जलने की बड़ी त्रासदी। इस तमाम त्रासदी को डा मीन केतन प्रधान ने अपनी कविताओं के जरिए अभिव्यक्त किया है।

जिजीविषा को बनाए रखने की भी जद्दोजहद कोई कम नहीं है और ऐसी कविताएं हैं।

पिता पुस्तक में सौ कविताएं संकलित हैं और सारी कविताएं पिता के इर्द गिर्द घूमती हैं लेकिन और भी जीवनगत बातों पर सही से रौशनी डालती हैं। कवि की माता का तो पहले ही देहावसान हो गया और माता की जगह पुत्र ही बीमार पिता की सही से देखभाल करता है और हमेशा यही सदिच्छा है कि वह स्वस्थ हो जाएं। पिता की इलाज में कभी कमी नहीं की गयी , बावजूद इसके दवाएं बेअसर ही साबित हुई।

लिखा हैं उन्होंने

पिता का आधा शरीर बेकार हो गया

दवाएं बेअसर

पिता की सेवा करने वाला बेटा बहुत बातें सोचता है और आशंकाओं के कारण भयभीत भी होता है ।

कविता देखिए

पिता की सांस सुनता रहा

बगल में बैठा रहा

पिता से दूर हटता नहीं अब मैं

बना रहता एक डर

मृत्यु का डर सचमुच आदमी को कितना हलकान करता है।

और कविताएं देखिए ---

पिता के न होने से हलकान है परिवार

जब पिता की मौत हुई उस पर ये कविता है।

इससे पहले की कविता

उन्हें जिलाए रखने की कोशिश भी नाकाम हो रही है कितनी विवशता है

और इसी विवशता को वह लिखते हैं

अब गायब हो गयी है नींद उनकी

ठीक से पहचानते नहीं किसी को

ऐसे बीमार व्यक्ति के हाव भाव और हरकतों पर ही नजर रखी जाती है और ये नज़र बड़ी पैनी है ।‌

कविता पुस्तक में पिता से संबंधित बहुत सी बातें हैं और घटनाएं भी हैं। खासकर महत्वपूर्ण बातों पर कविताएं

सृजित हुई हैं। एक बड़ी जरूरत जिंदगी बचाने के लिए है और महत्त्वपूर्ण यही कि संवेदना और करूणा स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त हुई है और ये कोई सायासिक नहीं लगता। तीमारदारी करते पुत्र के जितने भी मनोभाव हैं उनका चित्रण कविताओं में हुआ है।

पिता गांव में रहे थे और आज शहर में रहते हुए भी उनमें गांव के प्रति आत्यंतिक लगाव हैं और इस लगाव वाली कविताएं भी हैं।

 पिता का गांव घर छूटा जमीन जायदाद छोड़ कर

आ गये थे शहर

वहां का सब कुछ अब भी वैसा ही है

 और देखिए---

पिता जी की सोच में रहता था हमारा गांव

वहां के खेतों की तरह देखते रहते थे

ये गांव भी प्रकृति लिए देदीप्यमान है और खास संपृक्ति।

पिता की कथा कहानियां खत्म नहीं होती थीं और इनमें गांव होता था।

पिता से समझ सका

टूटती जब प्रकृति की जड़ता

तब धूप हवा पानी से

सृजन का नया रूप उभर आता

सृजन पक्ष को अच्छा खासा कविता के जरिए प्रश्रय मिला है।

पिता की छाया और माता की माया

सिर पर होती कवच की तरह

कवि ही नहीं प्रत्युत और भी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है माता पिता की छत्रछाया।

पिता के न होने से घर में बहुत बड़ा फर्क पड़ा है

जंजाल सारे फैल गए

चीजें बिखर पड़ी मिलते नहीं खोजने से

ये पिता की सही वाली देखभाल और भूमिका को ही प्रदर्शित करता है। उनको सब कुछ पता होता था और आज ये गायब है । पुत्र इसलिए परेशान है। 

पुराने कपड़ों कपड़े फटे चिथड़े चिथड़े

वाली कविता भी अच्छी है।

 मीन केतन जी की कविताएं जिंदगी के मानीखेज पहलुओं को भी चित्रित करती हैं।

यथा --

ऐसी बदलती दुनिया

कहीं सपने टूटते

कहीं जागते

 होती सुबह

गुजरती शाम

 बीतती रात

उम्मीदों और सपनों को टूटते हुए देखता है आदमी। आदमी का खुद अपना वश नहीं चलता और अप्रत्याशित परिवर्तनों को देखते रहने और फिर स्वीकारने की आदमी की विवशता अजीबोगरीब होती है।

कड़वे, तिक्त अनुभवों पर भी इनकी कविताओं के प्रबल भाव बोध हैं। अवांछित समय और समय का कड़वापन ही वास्तव में करू है ,कवि का ये  शाब्दिक संबोधन सटीक है।

यथा -- पिता जी को मालूम था

इस करूं काल का ऐसा छल

किसी का किसी से नहीं रहते मतलब

कड़वापन ही है जो एक मतलबपरस्ती और स्वार्थपरता को इंगित करता है। समाज और देश में आज भी वो महाभारत कालीन अश्वत्थामा सरीखे दुष्पात्र मौजूद हैं जो जिनकी रग रग में दुष्टता भरी होती है। दुष्टता में ही अश्वत्थामा ने पांडव वंश का ही नाश कर दिया। उनकी कविता देखिए

पिता जी अश्वत्थामा की कथा

सुनाते

कविता पेड़ों पहाड़ों खंभों खूंटों पर

टंगे हुए युगों तक

ऐसा है लहूलुहान रोता हुआ

शाप से कभी मुक्त नहीं होगा

अभिशापित हुआ था अश्वत्थामा और आज के ऐसे अश्वत्थामाओं को भी समय ही अभिशापित करता है । माथे पर कलंक का टीका लगा रहता है।‌ कविताओं में पिता के जरिए जीवनगत उतार चढ़ावों को उल्लेखित किया गया है । साथ ही ,सुख- दुख हर्ष- विषाद और राग- विराग आदि को स्पर्शित करती कविताएं भी अच्छी लिखी गयी हैं। पिता के लिए अगाध स्नेह , निष्ठा और एक मार्गदर्शक के रूप में मार्मिक और चित्रण पुस्तक की विशिष्टता है।‌

देखिए उनकी कविताएं

पिता संबल , मार्गदर्शक थे

वह लंबे राग में गाया करते थे

कथा पुराण

तब गाया करती थी

महानदी भी साथ साथ घर के पास

पिता ने देखे थे क ई बार

दरबदर होने के दुख

जिंदगी के उतार चढ़ाव में

नहीं मिला ठहराव

ठहराव न मिलने का अर्थ स्पष्ट है कि पिता की कर्मठता अक्षुण्ण बनी रही और संघर्ष करते रहे।

इन तमाम कविताओं की मूल केंदीय चेतना बड़ी और अर्थमयी है। सामाजिक चेतना और सरोकारों की बात की जाए तो केवल यहां मीन केतन प्रधान जी के पिता की गहन पीड़ा नहीं है अपितु और भी भारी दुख से अति संतप्त बहुत से ऐसे पिताओं की अपरिमित पीड़ा है जिनके भागीदार संतान हुआ ही नहीं करती हैं। आस, पड़ोस और समाज के स्वनाम धन्य लोगों में भी ऐसे वृद्ध जनों के लिए दुःख का संचार ही नहीं होता है। घर के बेकार और निष्प्रयोज्य सामान की तरह ही ऐसे दुख संतप्तों को देखा जाता है। मीन केतन सरीखे बेटे बेटियां नहीं होते जो रात भर जाग जाग कर भी अपने बीमार और लाचार पिता की तन्मयता से सेवा सुश्रुषा कर सकें।

उनकी एक और कविता है

 पिता के नाम पर इतना ही है अब

पोटली में बाकी सब बहाए महानदी में

होता जहां पुरखों का उद्धार

 दूसरी भी है

 पिता की याद दिलाता दीए का उजाला

मन में सीधे उतरता दीए का जलना

अपनी परम्पराओं से जुड़े रहता है।‌

 उल्लेखनीय है कि पुरखों और परम्पराओं के यहां मतलब इसलिए बड़े हैं कि पिता के बाद पुत्र की ही भूमिका निभती है और यही पितृसत्तात्मक है। यहां हम पितृसत्तात्मक पहलुओं पर भी दृष्टिपात करना चाहते हैं। दरअसल सही मायने में एक सही मार्गदर्शक के रूप में ही पिता को देखा जाए।

कवि की माता का निधन पिता से दस साल पहले हो जाता है।‌ पहले पिता की साज संभाल ,देखभाल आदि उनकी माता ने की और मां भी पिता के अनुसार चलती रही।‌ पूर्व के दशकों में अनुगामी बनने वाली स्त्री पुरुष की इच्छाओं और आज्ञाओं को अधिक मानती थी और आज परिवेश‌ बदला है और स्त्रियों के आदेशों को पुरूष मानने तो लगे हैं लेकिन प्रभुत्व और वर्चस्व पुरूषों का ही प्रबल होता है। परम्परागत भाव और प्रवृत्ति बनी ही रहती है। जीवनगत सफलताओं के लिए प्रतिबद्ध पिता होता है। संतानों में यही गुण और संस्कार भरने के ही सकारात्मक यत्न करते हैं। पिता के पास संतानों को देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है। धैर्य ,संयम अनुशासन गंभीरता व प्रेम आदि कारक काम करते हैं। सहनशीलता के  चलते पिता का एक बड़ा दिल हो जाता है और वे तकलीफ नहीं बताते।‌ सच यह है कि इस धरती पर पिता बच्चों के लिए ईश्वर का साक्षात रूप हैं।‌ कवि को पिता की ओर से अच्छे संस्कार और गुण मिले और पिता की बीमारी में ऐसे ही गुण और भावों के अंतर्गत प्राणप्रण से सेवा अपने पिता की करता है। मगर जहां ये भाव शक्तियां काम नहीं करती हैं तो पिता की सही ढंग से परवरिश और इलाज आदि नहीं हो पाती। बहरहाल,

डॉ० मीन केतन की कविताओं में गहन संवेदना है और पिता के मनोभावों को चित्रित जिस तरह से किया है उससे भोगा हुआ यथार्थ ही सामने आता है।

उनकी कविता है --

पिता के जगने - सोने में नहीं रहा अब फर्क

अकचक देखते तो सूनी आंखें

 डरे डरे होंठ उनके

 नवजात की तरह लग रहे कुछ समझने की हालत नहीं

पीड़ा में डूबे पिता की हरकतों पर भी पैनी दृष्टि है ।

पिता जी जब गहरी नींद में होते

तो बेहोशी का डर लगता

पता नहीं चलता

मन और तन का क्रियाकलाप

ऐसी हालत में कोई कुछ सोच नहीं सकता

सोलह संख्या वाली ये कविता भी कुछ सोचने और महसूस करने को बाध्य करती है ।

सत्रह नंबर की कविता--

पिता मेरे नहीं रहे आज

डर यही था

बही आंखों की कोर

अकेले में ज्यादा जोर

अंतिम बार देखा

करते प्रणाम

मुंह ढंक दिया

 सच पूछिए तो ऐसी अनुभूति उन व्यक्तियों में ही होती है जिनके पिता का निधन हो जाता है और वे ही खासे मर्माहत होते हैं। प्रायः संवेदनहीनता तो उनमें होती है जो माता पिता को महज सामान की मानिंद समझते हैं। कवि की तो यहां खासी संवेदनशीलता ही उजागर हो रही है।

कविता का जायजा लें --

 पश्चिम में सूरज का आकार

बड़ा हुआ

फिर डूबते डूबते फक्क से डूब गया

अंतिम संस्कार हुआ

सूरज का यहां बढ़िया प्रतीक है। कविताओं से सम्बद्ध

प्रतीक और बिम्ब विधान भी बढ़िया है।‌ इनकी कविताओं में सुंदर और निश्छल भाव हैं जो दुनियावी चीजों की सत्यता को सही से अभिव्यक्त करते हैं। कवि की ये स्वीकार्यता भी है और आपने लिखा भी है कि कविताएं जीवन की वे हकीकतें हैं जिन्हें जिया और भोगा गया है । आरम्भ में जिन बातों का जिक्र अपनी बात की परिधि में रहकर करना चाहिए था वो लीक से हटकर आत्म कथ्य के रूप में पर्यवसित हो गयी है। दोनों में कुछ फर्क तो है पर मुझे इसलिए ऐसा करना पड़ा क्योंकि यही सब इन कविताओं की मूल संवेदनाएं हैं। अब अहसास होता है -- 'कविता में आत्मा बोलती है ,क्लास रूम में चेतना और दुनियादारी में भावना ।' इसलिए इन कविताओं के बारे में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है । जिंदगी में इतने पैबंद लग चुके हैं कि किसी नामी गिरामी से इन कविताओं के बारे में बतौर पैबंद कुछ लिख नहीं सका । पाठकों की राय सर्वोपरि है।

दरअसल,कवि मीन केतन प्रधान के समीक्षकों और आलोचकों आदि के प्रति उदासीन से भाव हैं जबकि पाठकों के विचारों को अधिमान देते हुए अपनी पुस्तक के लिए यही बेहतर समझते हैं।

अपनी पिता पुस्तक के माध्यम से मीन केतन प्रधान ने विभिन्न भावों को अभिव्यक्त करते हैं। किसी भी सामान्य व्यक्ति की भांति जीवन के विविध परिप्रेक्ष्य में अपनी लेखनी सुघड़ता से चलायी है और सेवारत और कर्तव्य निष्ठ होने का प्रबल अहसास कराया है। अविस्मरणीय पलों को बड़ी ही सहजता और सरलता से पिरोया है। कवि का रचना संसार भावों के पटल पर अद्भुत आयाम देता हुआ प्रतीत होता है।‌ जीवनगत सच्चाई का बोध कराने वाली रचनाएं हैं जो मानवीय सरोकारों को बल देती हैं।

तिहत्तर संख्या वाली रचना में दुनिया की बेहतरी पर जोर दिया गया है।

बदल जाती दिशाएं दूर कहीं

जिनको तराशने की जरूरत है

तराशना पड़ सकता है

दुनिया की बेहतरी के लिए

शाम कभी अंधेरा नहीं लाती

 चांदनी भी आती है

जिससे नजर आता है एक रास्ता

ये एक रास्ता आशावाद है और बदलाव का द्योतक भी है।

 और भी दूसरी कविता पंक्तियां हैं --

 यूं एक जगह बैठे बैठे

आसमान नहीं छुआ जाता

दिल से कोई अगर चाहे आसमान उतर आता (पृष्ठ 116)

असंभाव्यता संभाव्यता हो सकती है बशर्ते कि सशक्त चाहना शक्ति और बुलंद हौसले हों और कर्मठ व कर्मवीर व्यक्ति अपने लिए सही जमीन तराश ही लेता है और मुकम्मल आसमान भी अपने करीब पाता है।

इन बातों से इतर भी इस पुस्तक में और भी ऐसी कविताएं हैं जो मन को छूती हैं, कुछ सोचने को आत्यंतिक विवश करती हैं।

पृष्ठ 136 की कविता की कुछ पंक्तियां काबिले गौर हैं--

बदलती रहती हैं परिभाषाएं

दांव पेंच

दोनों पक्षों में होते

अपने हितों के मुताबिक

व्याख्या करते लोग 

आज जो हो रहा

दुनिया के भीतर बाहर

युद्ध, आक्रमण,उठापटक

उसमें क्या सही , क्या ग़लत

नहीं मानता कोई किसी का अभिमत

सबक सिखाता इतिहास

अपने दायरे से

जब कोई जाता बाहर

होता तब विनाश

इसका ,उसका सबका

 वास्तव में आज सामाजिक शास्त्र और 

जीवन के व्याकरण ही बदल रहे हैं, स्वार्थपरता ही नहीं अपितु झगड़े, फसाद और हिंसा को इधर, उधर प्रश्रय मिल रहा है। देश में घरेलू हिंसा की  घटनाएं बढ़ी हैं और विनाशकारी प्रवृत्ति की रोकथाम हो नहीं पा रही है।  इस सब पर कवि की गहन चिंता है और अत्यावश्यक है कि एक सही दायरा और परिवेश निर्मित हो ।

परिवेशगत चित्रण भी सफलतापूर्वक हुआं है। इस तरह के परिप्रेक्ष्य में पात्रों के व्यवहार (सामाजिक) और घटनाओं को दर्शा कर कविताओं को गहराई और प्रामाणिकता देने का प्रयास सराहनीय है। ये संवेदनशील कवि समाज, संस्कृति और वर्तमान परिस्थितियों को चित्रित

करता है जिससे रचनाओं को व्यापक अर्थ मिला है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से परिवेश का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

पिता पुस्तक से सम्बद्ध मीन केतन की जीवनानुभूति भी (अनुभवों की आंतरिक अनुभूति) और अनुभव (बाहरी जीवन की घटनाएं) एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं, कवि ने अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों ही नहीं, प्रत्युत समाज से मिली अनुभूतियों को कलात्मक रूप दिया है जो पाठकों को अपने अनुभव से जोड़कर जीवन का यथार्थ, समस्याएं और मानवीय संवेदनाएं समझने में मदद करता है, जिससे साहित्य जीवन का दर्पण और मार्गदर्शक बनता है।

कविताओं में जीवनानुभूति और अनुभव की भूमिका और

आधारभूत तत्वों की खासी अहमियत है। कवि के जीवन में घटने वाली घटनाएं, सामाजिक परिस्थितियां ,सांस्कृतिक प्रभाव और व्यक्तिगत जीवन संबंधी  स्वानुभूति) उसके लेखन को प्रामाणिकता देते हैं।

जीवनानुभूति  का आंतरिक, भावनात्मक और दार्शनिक पक्ष भी है। यह सुख-दुख, भय-उत्साह या किसी गहरे रहस्य को महसूस करने की अवस्था है, जिसे कवि या लेखक अपनी रचना में ढालता है।

पिता पुस्तक में पिता की बीमारी,  पुत्र

की निष्ठापूर्वक सेवा से इतर भी समाज और दुनिया से संबंधित एक बड़ा यथार्थ पक्ष है। पुस्तक जीवन के अच्छे-बुरे पहलुओं को दर्शाती है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि 'हम कौन थे, कौन हैं और क्या बन सकते हैं'। कविताओं के माध्यम से पाठक अन्य लोगों के जीवन और भावनाओं से जुड़ता है, जिससे सहानुभूति विकसित होती है। 

यहां कविता सामाजिक समस्याओं, मनोविज्ञान और मानवीय रिश्तों को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन है, जो सामाजिक चेतना के प्रवाह में सहायक है। नैतिक और आध्यात्मिक दिशा भी देती है। यह न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि मानवीय मूल्यों को स्थापित करती है और जीवन को एक नई दृष्टि देती है।‌ कवि की स्वानुभूति प्रशंसा योग्य है।

जीवनानुभूति वह कलात्मक प्रक्रिया है जो उस सामग्री को सुंदर, प्रासंगिक और मानव-उपयोगी बनाती है, जिससे साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का सार बन जाता है।

बहरहाल, मीन केतन प्रधान के रचना संसार को पूर्णतः आत्मसात करना आसान कार्य नहीं है। यद्यपि, इस आत्मसात करने वाली प्रक्रिया से गुजरना पाठकों के लिए अति रूचिकर है। एक ओर संवेदनशीलता है तो दूसरी ओर जीवन की कितनी ही अर्थ छवियां देदीप्यमान हैं। यथार्थ पक्ष की दृष्टि से मानवीय मनोभावों को छूने और पकड़ने की ईमानदार कोशिश और जीवनगत अहम् पहलुओं को परत दर परत खोलने वाली मानसिकता अति सराहनीय है। निसंदेह पिता पुस्तक का प्रभावी अर्थ और स्तर प्रतिमान है। नये भाषा एवं शिल्प विन्यास और नये विचार सोचने और समझने योग्य हैं। माता पिता की अतीव उपेक्षा और असम्मान करने वाली संततियों के लिए भी ये पुस्तक मील का पत्थर सदृश है। मीन केतन प्रधान के स्तुत्य प्रयासों का पाठक जगत में यथेष्ट स्वागत होना चाहिए।

प्रमोद झा 

मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश 

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