मुस्कान

अरुणिता
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सजाकर मुस्कान लबों पर,कितने ग़म छुपाते हैं।

जीवन की तन्हाई में फिर,बीते दिन याद आतें हैं ।।

 

हमने सीख लिया हुनर, सबसे ग़म छिपाने का।

आंखों में आंसू नहीं आते,बस लब थरथराते हैं।।

 

दिल में खलिश हो गर, रंजोगम की परछाई सी

अहसास को अक्सर,लफ्ज़ों में कह नहीं पाते हैं 

 

लबादा ओढ़कर मुस्कान का,खामोशी को संवारा।

कोई पहचान ले आंसू हमारे,नहीं हम मौका देते हैं।।

 

ज़ख्म जमाने को दिखाने से,फायदा नहीं जानिब।

यही सोचकर हम तन्हाई में,बस आंसू बहा लेते हैं।।

 

ना जाने कितने दर्द यहां,गहराई में जाके बैठ गए।

दर्द ए समंदर की गहराई को,कम आंक जो बैठे हैं।।

 

जो अपना हो समझ जाए, आंखों की कहानी को।

तभी मुस्कान के पीछे आंसू ,वही पहचान पाते है।।

 

देखकर मुस्कान हमारी,धोखा खा जाते लोग यहां।

दर्द भरी इस दुनिया में,हम कैसे खिलखिलाते है।।

 

बहुत से अफसाने दिल में,दफ़न होकर रह जाएंगे।

बड़े बेतकल्लुफ़ होकर, इल्जाम हम पर लगाते हैं।।

 

भरी दुनिया में किसको, यहां पर किसका सहारा है।

चंद लम्हों की फुरसत में, क्यों हमको आजमाते हैं ।।

 

अलका शर्मा

शामली, उत्तर प्रदेश

 

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