आओ बातें करें

अरुणिता
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नदियाँ केवल बहते हुए जल का स्रोत नहीं हैं; वे हमारी सभ्यताओं का पालना रही हैं। भारतीय संस्कृति में तो नदियों को 'माता' का दर्जा दिया गया है। लेकिन आज जब हम अपनी इन माताओं की ओर देखते हैं, तो यथार्थ बहुत पीड़ादायक लगता है। विकास की अंधी दौड़, औद्योगीकरण और हमारी व्यक्तिगत उदासीनता ने नदियों को अमृतधारा से बदलकर अपशिष्ट और प्लास्टिक ढोने वाले नालों में तब्दील कर दिया है। नदियों की स्वच्छता अब केवल एक सरकारी ज़िम्मेदारी नहीं रह गई है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व को बचाने की सबसे बड़ी और प्राथमिक आवश्यकता है। यदि आज हम नहीं जागे, तो कल हमारे पास अपनी पीढ़ियों को देने के लिए केवल सूखी और जहरीली तलहटियाँ ही बचेंगी।

अक्सर हम समस्याओं को देखकर सरकार या व्यवस्था को कोसते हैं और अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ लेते हैं। लेकिन समाज में कुछ ऐसे भी कर्मवीर होते हैं, जो अँधेरे को कोसने के बजाय खुद एक दीया जलाने में विश्वास रखते हैं। ऐसे ही एक प्रेरणास्रोत हैं—आकाश गुप्ता।

जब अधिकांश लोग नदियों की दुर्दशा पर केवल अफ़सोस जता रहे थे, तब आकाश ने ज़मीनी स्तर पर उतरकर काम करने का संकल्प लिया। आकाश गुप्ता के प्रयास हमें यह बताते हैं कि यदि नीयत साफ हो और इरादे मज़बूत हों, तो एक अकेला व्यक्ति भी समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। हमें आकाश के इन प्रयासों को केवल पढ़कर सराहना नहीं है, बल्कि इसे अपने जीवन में उतारना है। जैसे उन्होंने ‘मनोरमा की सेवा की है वैसे ही हमें भी अपने आस-पास के जलस्रोतों और नदियों पर कार्य करने की आवश्यकता है |अगर कुछ अधिक भी नहीं कर सकते तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि कभी भी नदियों या किसी भी जलस्रोत में प्लास्टिक या अन्य अपशिष्ट नहीं फेंकें। अपने घर, परिवार और समाज में लोगों को नदियों के महत्व के प्रति जागरूक करें। जब भी अवसर मिले, अपने आस-पास के जलस्रोतों की सफाई में प्रत्यक्ष रूप से श्रमदान करें। नदियों को माता का स्थान देने का हमारे पूर्वजों का मन्तव्य अब हम सबकी समझ में आ ही जाना चाहिए |

नदी बचेगी, तो जीवन बचेगा। आइए, इस अंक के साथ हम यह प्रण लें कि हम अपनी नदियों को फिर से उनकी वही पवित्रता और निर्मलता लौटाएंगे, जिसकी वे अधिकारी हैं। आकाश गुप्ता जैसे युवाओं के कदम से कदम मिलाकर चलने का समय आ गया है।

 

 

                                                                                जय कुमार

षष्ठी, कृष्णपक्ष, आषाढ़, विक्रम सम्वत् २०८३                            प्रधान-सम्पादक

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