मार्मिक पल

अरुणिता
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         हैदराबाद की ट्रेन ​स्टेशन पर आने वाली थी। आलम हैदराबाद के एक युनिवर्सिटी में प्रोफेसर था। उसने  जाते-जाते शिवेंद्र के हाथ में एक छोटा सा, पुराना मखमली डिब्बा थमाया।

          शिवेंद्र चौंकते हुए बोला, "यह क्या है आलम? मैंने कहा था न..."

          ​गले लगाते हुए आलम धीरे से कहा,"यह मदद नहीं है मित्र शिवेंद्र, एक कर्ज है। याद है जब हमारे पास स्नातक की परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए पैसे नहीं थे,तब तुमने अपनी मां के कंगन गिरवी रखकर मेरी फीस भरी थी और कहा था कि 'जब बड़े आदमी बन जाओ, तो लौटा देना'। आज मैं वही लौटा रहा हूँ। इसमें जो है, वह तुम्हारी मेहनत का हिस्सा है, मेरी दया का नहीं।"

          ​ट्रेन चल दी। शिवेंद्र ने कांपते हाथों से डिब्बा खोला। उसमें कोई पैसे या गहने नहीं थे, बल्कि आलम की यूनिवर्सिटी का एक आधिकारिक 'प्रस्ताव पत्र' था, जिसमें लिखा था:

          ​"हमें अपने रिसर्च सेंटर के लिए 'प्राकृतिक खेती और ग्रामीण मृदा' के विशेषज्ञ सलाहकार के रूप में आपकी आवश्यकता है। आपका अनुभव हमारे छात्रों के लिए अमूल्य है। इसके लिए युनिवर्सिटी से जो मानदेय दिया जाएगा,वह आपके ज्ञान का सम्मान है।"

          ​पत्र के नीचे एक छोटी सी पर्ची थी, जिस पर लिखा था— "मित्र, तुम्हारी खुद्दारी को सलाम, पर मिट्टी का ये हुनर दुनिया को सिखाना भी तो तुम्हारी जिम्मेदारी है।" शिवेंद्र की आँखों से आंसू गिरकर उस कागज़ पर लगे मिट्टी के निशान को और गहरा कर गए। उसने मुड़कर भागती हुई ट्रेन को देखा, जहाँ से प्रिय मित्र आलम हाथ हिला रहा था। और शिवेंद्र अपनी गीली आंखों को रुमाल से बार-बार पोंछे जा रहा था।

           आज एक स्वाभिमानी किसान के साथ ही एक मित्र के प्रेम की भी जीत हुई थी।

ललन प्रसाद सिंह

वसंत कुंज, नई दिल्ली-70

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