चक्रव्यूह के भीतर

अरुणिता
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गाँव का नाम था बरखेड़ा। मिट्टी की खुशबू, कच्चे घर, और लोगों की आँखों में उतनी ही उम्मीद, जितनी उनकी ज़िंदगी में जगह नहीं होती।

उसी गाँव में रहता था— अभिमन्यु।

माँ उसे “अभि” कहती थी।,जब भी वह खेत से लौटता, माँ उसके माथे का पसीना पोंछते हुए कहती—

“मेरा अभि अफसर बनेगा… देखना।”

अभिमन्यु हँस देता— “माँ, इतना आसान नहीं होता…”

माँ बिना सोचे कहती— “मेहनत करने वालों के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होता।”

पिता चुप रहते। उनकी हथेलियों में दरारें थीं— जैसे हर रेखा में एक अधूरी फसल उगी हो।

एक दिन अभिमन्यु ने पूछा— “बाबा, आप कुछ कहते क्यों नहीं?”

पिता हल रोककर बोले— “हम कहते नहीं बेटा… बस करते हैं।”

“क्या?”

“तेरे लिए रास्ता…”

शहर जाते समय माँ ने बैग में रोटियाँ रखीं— “भूख लगे तो खा लेना…”

पिता ने जेब में कुछ नोट डाले— “बस इतने ही हैं… काम चला लेना…”

 अभिमन्यु ने पूछा आप कैसे चलाओगे?”

पिता हँसे— “हम तो सालों से चला रहे हैं…”

शहर ने उसे जगह दी— अपनापन नहीं। एक छोटा कमरा, तीन लोग, एक पंखा—जो हवा से ज़्यादा आवाज़ करता था।

पहली रात एक लड़के ने पूछा— “कहाँ से आया?”

“गाँव से…”

“पहली बार?”

“हाँ…”

वह मुस्कराया— “फिर तो अभी बहुत कुछ टूटना बाकी है…”

रात को माँ का फोन आया— “अभि, आज मैंने सपना देखा…”

“क्या माँ?”

“तू कुर्सी पर बैठा है… लोग तुझे ‘साहब’ कह रहे हैं…”

अभिमन्यु चुप हो गया। “थकता तो नहीं न?”

“नहीं माँ…”

फोन कट गया।

पहली परीक्षा— नहीं निकली। दूसरी— फिर नहीं। तीसरी— बस दो नंबर से रह गया।

उस दिन उसने धीरे से कहा— “इतना पास आकर भी… क्यों नहीं?”

पिता का फोन आया— “क्या हुआ?”

“रह गया…”

कुछ देर चुप्पी रही।

पिता बोले— “कोई बात नहीं… हम खेत में भी हर बार फसल नहीं उगा पाते… पर खेत छोड़ते नहीं…”

धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा— यह सिर्फ परीक्षा नहीं है।

एक दिन उसने सुना— “भाई, सेटिंग लग गई…”

उसने पूछा— “और जिनके पास सेटिंग नहीं?”

जवाब आया— “वो कोशिश करते रहते हैं…”

रात को उसने किताब खोली— पर अक्षर धुंधले थे।

“शायद मुझसे नहीं होगा…”

उसने कहा। रूममेट बोला— “सबको लगता है…

फिर भी लगे रहना पड़ता है…”

“कब तक?”

कोई जवाब नहीं था।

अब उसे हर चीज़ घेरा लगती— फॉर्म, फीस, परीक्षा, कटऑफ, रिजल्ट। हर बार वह उसमें जाता, और हर बार थोड़ा और फँसता जाता। एक दिन वह गाँव लौट गया।

माँ ने दरवाज़ा खोला— “अभि! इतनी जल्दी आ गया?”

“हाँ…”

“सब ठीक है न?”

“हाँ…”

पर उसकी आँखें सच नहीं छुपा पाईं। पिता खेत में थे।

“बाबा…”

“हाँ बेटा…”

“अगर… नहीं हुआ तो?”

पिता ने हल रोक दिया। “तू बता… क्या नहीं होगा?”

अभिमन्यु की आवाज़ काँप गई—

“सब…”

कुछ देर चुप्पी रही।

फिर पिता बोले— “हमने कभी तुझसे कहा था कि तू बड़ा आदमी ही बने?”

“नहीं…”

“तो फिर?”

पिता धीरे से बोले— “बस इतना कहा था—

खुद के पैरों पर खड़ा हो जाना…”

रात को माँ ने पूछा— “अभि… थक गया है न?”

इस बार उसने झूठ नहीं बोला— “हाँ माँ…”

माँ ने उसे गले लगा लिया—

“थकना गलत नहीं है… पर खुद से हारना गलत है…”

अगली सुबह वह फिर शहर लौट गया।

कमरा वही था। दीवार वही। वह देर तक बैठा रहा।

फिर धीरे से मोबाइल उठाया— और एक नया फॉर्म भर दिया।

उसकी उँगलियाँ चल रही थीं, पर आँखों में पानी था।

कहानी का अभिमन्यु चक्रव्यूह में मारा गया था। आज का अभि उसमें जीता है—

हर बार थोड़ा टूटकर, हर बार थोड़ा संभलकर।

और सबसे ज्यादा उन सपनों के बोझ से जो उसने नहीं, उसके अपने लोगों ने देखे हैं। कभी-कभी

वह लड़ाई नहीं हारता— बस उम्मीद थोड़ी-थोड़ी हारती है।

 

श्योजी राम हवलदार


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