क्या बिगडा मर्द जात का

अरुणिता
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कच्ची दिवार में चुने कांच में खुद को निहारती कामिनी जडवत खडी रह गइ थी । आईने से झांकता चेहरा कहीं से भी उसके कामिनी नाम को परिभाषित नहीं कर पा रहा था । अब कहां रही वो कामिनी जो पिछले सात सालों से डा. दयाल की हेल्पर उनके क्लीनिक की सर्वेसर्वा ,उनके हर काम में हाथ बंटाती जिंदादिल मस्त अल्हड युवती जो उनके दिल पर भी राज करती थी और उनके जेब पर भी ।  डा. साहब ने ही तो उसका नाम कमली से बदल कर कामिनी रखा था । लेकिन अब उसकी सारी कमनियता जाने कहां खो चुकि थी । चेहरे का धुंधलाता नूर शरीर की बेडोलता और मानसिक अवसाद उसके स्थाइ साथी बन चुके थे । डाक्टर की उपेक्षा और भविष्य की चिन्ता ने उसको कामिनी से वापस कमली बना दिया था । लेकिन अब तो वो कमली भी कहां रही ? कमली जो 18-19 साल की सांवली सलोनी कसे बदन की आकर्षक यौवन और दपदपाते कौमार्य से भरपुर थी , वही कमली जो जिला मुख्यालय से 15 की.मी. दुर गांव में रहने वाले एक गरीब किसान की मासुम सी बेटी थी जो हायर सेकेंडरी करते करते डा. दयाल के क्लीनिक पर नौकरी करने लगी थी । जहां वो कमली से कामिनी बनी और एक लम्बे अन्तराल के बाद वापस कमली बनकर अब अपने गांव लौट आई थी । अब शायद वो कामिनी तो नही ही थी ,कमली भी नहीं रही थी ।

 आईने में खुद को खोजती कामिनी ,( नहीं , अब उसे कमली कहना ही ठीक होगा । ) आईने में आंखे गडाये कमली को आज से सात साल पहलें की जुलाई माह की उस बरसाती सुबह की य़ाद आने लगी जब जिला मुख्यालय से आई अस्पताल की टीम ने गांव में स्वास्थ्य शिविर लगाया था । इलाके में हेजा फेलने की आशंका से प्रशासन ने गांव के घर घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य परिक्षण का अभियान चलाया था । कमली का बाप रामौतार पिछले चार दिन से उल्टी दस्त का शिकार था कमली अपने बापु को दही चावल खिला ही रही थी कि उसके टुटे फुटे टापरे में डा. दयाल ने अपने सहायकों के साथ प्रवेश किया । खाट पर लेटे मरीज और उसके नजदिक बैठी कमली दोनों ने डा. को चौंका दिया । अब डा. के हाथ तो मरीज की नब्ज टटोल रहे थे लेकिन आंखें कमली के अनगढ देहाती सोन्दर्य पर टिक गई थी । कमली भी फिल्मी हिरो जैसे इस गौरे चिट्टे शानदार शहरी साहब को एकटक निहारे जा रही थी . रामौतार को दवाइयां और जरुरी निर्देश देकर बडे बेमन से डा. दयाल अपनी टीम के साथ वापसी को मुडे कि उन पर बारिश मेहरबान हो गई  । अचानक तेज होती बारिश के कारण डा. दयाल को 20-25 मिनीट कमली के टापरे में गुजारने पडे । और इतना समय काफी था उस टापरे मे दो अन्जान अपरिचित लेकिन जवान व्यक्तित्वों को एक दुसरे से प्रभावित होने के लिए | हालांकि कमली प्रभावित हुइ थी उस भव्य प्रभावी शहरी साहब को इतनी देर तक इतने नजदिक महसुस करने से जबकि शहरी सोन्दर्य के आदी डा. दयाल शिकार हुए उस कमसिन  निर्दोष अनगढ देहाती उफनते यौवन से ।  इन 20-25 मिनिट में डाक्टर ने कमली के परिवार का उसकी समस्या और आवश्यकता का पुरा जायजा लेकर उन्हे हर तरह की मदद का भरोसा भी दे दिया था। नतीजतन अगले कुछ दिनों में ही कमली शहर जाकर सुबह 10 से 2 बजे तक का स्कुल पुरा कर 2 से 4-5 बजे तक डा. के क्लीनिक पर काम करने लगी ।  कमली को याद आये वो शुरुआती अच्छे दिन । डा. दयाल और उनकी बहुत ही सीधी सादी देवी स्वरुप पत्नी डा. सरोज और उनकी नन्ही सी प्यारी बेटी खुशबु इन तीनों का हर बात में ध्यान रखती कमली ने सबका दिल जीत लिया था । जब दोनो पति पत्नी ड्युटी पर होते  तो खुशबु का और सारे घर का ध्यान रखती कमली ।थके हारे  ड्युटी से आते पति पत्नी को तत्काल चाय नाश्ता देती कमली । क्लिनिक में मरिजों के  चेकअप में उन्हे दवाईयां देने समझाने में डा दयाल का पुरा पुरा साथ दे रही थी कमली । और यही वक्त था जब कमली का नया जन्म हो चुका था कामिनी के रुप में ।                               खुद डा. दयाल ने एक दिन पत्नी के सामने ही बडे अपनत्व से कमली पर लाड जताते हुए उसकी बहुत सराहना की और घोषित किया कि ऐसी  योग्य पढी लिखी लडकी का नाम कमली नहीं कामिनी होना चाहिये । और अपनी उम्र के 21वें साल को पार करती  कामिनी का शरीर सौष्ठव अपने नाम को सार्थक कर रहा था । । कामिनी अब इंजेक्शन लगाना स्लाईन चढाना बुखार चेक करना एसे सभी प्रायमरी काम करने लगी थी । उसके काम के बदले कामिनी को अच्छा मासिक वेतन भी मिल रहा था ।  गांव मे रहने वाला रामौतार अपनी गरीबी के दिन भुलने लगा था , बडा खुश था ऐसी बेटी पा कर ।

  कामिनी का रहन सहन पहनावा काफी बदल चुका था । कामिनी में आ रहे परिवर्तन से जहां डाक्टर दयाल बहुत मुग्ध हो रहा था वहीं पत्नी डा. सरोज कुछ कुछ संशय महसुस करने लगी थी । लेकिन डा. सरोज स्वभाव से बहुत शान्त सीधी और संकोची थी इसके पीछे  बचपन से ही मां का साया ना होना , मायके में केवल बिमार वृद्ध पिता का होना भी एक कारण था । डा. दयाल सरोज के इस सीधे और कमजोर स्वभाव से वाकिफ थे और पुरा फायदा उठाना जानते थे ।

   कहते हैं आग और फूस  ज्यादा देर तक का साथ रहे तो परिणाम विनाश ही होता है । अब डा. दयाल और कामिनी में कौन आग था और कौन फुस ये तो सोचना होगा पर हां वातावरण का ताप बढने लगा था | जिसकी आंच डा. सरोज भी महसुस करने लगी थी । लेकिन केवल अनुमान और संदेह के आधार पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता ।  डा.दयाल के हर काम में सहायता करने वाली उनका हर बात में ध्यान रखने वाली उन्मुक्त योवन की ओर अग्रसर कामिनी अब डा दयाल के दिलोदिमाग पर पुरी तरह छा चुकी थी । मरीजों के उपचार के दौरान आपसी शारीरिक स्पर्श दोनो के दिमाग में तीव्र उद्वेग पैदा करता था ।आंखें मटकाते हुए मुस्कराते हुए कामिनी डा दयाल के शरीर मे आग सी लगा रही थी । अब डा. दयाल दिन भर में यही मौका देखते रहते जब वे कामिनी के उद्दाम  यौवन से परिपुर्ण शरीर के खास अंगो का स्पर्श सुख प्राप्त करें । और कामिनी भी प्रयास करती उन्हे एसे अवसर उपलब्ध कराने को । ऐसे मे अक्सर ये होने लगा कि कई  बार डा. दयाल एकान्त पाते ही कामिनी को चुम लेते , उसे बांहों में भर लेते बल्कि कई  बार कामिनी के सुपुष्ट अंगो का मर्दन भी कर लेते ।

  अब दोनो के बिच उस चरम काम सुख को प्राप्त करने में बहुत हल्का सा अवसर नामक अवरोध ही बचा था । और यह अवसर दिया खुद डा. सरोज ने । वो भी बेचारी क्या करती । देहरादुन में अकेले रहते वृद्ध पिता ने बेटी से मिलने की तीव्र इच्छा जताई  तो सरोज रोक ना पाई  खुद को और चल दी बेटी को लेकर संशय , असमंजस और तनाव के साथ । इधर कामिनी ने गांव में बापु को खबर भेजी क्लीनिक में काम ज्यादा होने से अगले 4 – 5 दिन वो घर नहीं आयेगी । गरीबी से संपन्नता की ओर बढते रामौतार को इस खबर से कोई  फरक नहीं पडा ।

 और अन्ततः आ ही गई  वो ऱात जो  दो प्यासे शरीरों की पिछले दो सालों से जाग्रत आग को शान्त करने वाली थी । वो रात जो डा. सरोज के जीवन को अन्धकारमय बनाने वाली थी । और जमकर भोगा डा.दयाल और कामिनी ने उस रात को । सुबह देर से उठ कर डा. दयाल ने जैसे तैसे  अपनी दिन की ड्युटी पुरी की और कामिनी तो दिन भऱ सोती रही जगती रही य़ाद करती रही उस अलभ्य अनिर्वचनीय कामसुख को जो उसे जीवन में पहली बार जी भर के मिला । दोपहर बितते बितते पिछली रात की थकान जा चुकी थी और फिर आने वाली रात की कल्पना में मन की उत्तेजना चरम पर थी ।

  कामिनी ने बडे प्यार से , जतन से रात के लिये खाना बनाकर रखा । और डा. दयाल ने रतिसुख को बढावा देने के लिये इन्तजाम किया अंग्रेजी शराब का । कमजोर सी ना नुकुर करते कामिनी ने जीवन में पहली बार स्वाद लिया उस सोमरस का जिसे सदियों से सही गलत  की मान्यताओं में उलझे क्या देवता क्या शैतान और क्या मनुष्य सभी पी रहें हैं ।  पीने के  बाद कामिनी ने नशे की उन्मुक्तता में डा. दयाल के सामने खुलकर यह  शर्त रख दी कि मुझे भोगना है तो मुझसे शादी करो ।

दुनियादारी में कुशल डा. चौंके उन्हे गुस्सा भी  आया कामिनी की इस जुर्रत पर , लेकिन बड़ी कुशलता से उन्होंने कामिनी को पुरा आश्वस्त किया कि शीघ्र ही वो उससे शादी कर लेगा और भोली , मासुम लेकिन चालाक होती कामिनी समझ रही थी कि इतना आसान नहीं है ये सब , फिर भी उसका अब यही एक सपना था मिसेज डा. दयाल बन जाने का किसी भी कीमत पर किसी भी हालत में ।

 दूसरी  रात भी अभिसार की रात थी , दोनो विषयासक्त देह रात भर  एक दुसरे में  समाती रही अलग होती रही फिर समाती रही । और अगली तीन रातें भी एसी ही गुलजार रही । आज डा.सरोज की वापसी का दिन था । कामिनी ने सारा घर व्यवस्थित कर दिया था | सरोज की वापसी से दोनो खिन्न थे | असुविधा महसुस कर रहे थे लेकिन भयभीत जरा भी नहीं थे । किसी भी अनैतिक कार्य को प्रथम बार करने में ही पाप की अनुभुति होती है और दिल में भय पैदा होता है | फिर तो ये सब सहज और जरुरी होता जाता है । डा. सरोज ने पता किया कि उसकी अनुपस्थिति में कामिनी पुरे पांचो दिन गांव नहीं गई  बल्कि सारा समय क्लीनिक पर भी  न बिताते हुए घर पर ही रही ।

    काफी विवाद हुआ पति पत्नी के बीच । खुब रोई डा सरोज ,पति से केफियत भी मांगी कामिनी को घर पर सुलाने की । डा. दयाल ने बडी सहजता से लिया सरोज के विलाप को ,कहा पांच दिन से घर के और क्लीनिक के सारे काम कर रही हे कामिनी ।   “ कौन कौन से काम कर रही थी कामिनी तू म पांच दिनो तक ?   सरोज ने कामिनी से डा. दयाल के सामने ही जोर देकर पुछा । एक क्षण ठिठकी कामिनी फिर एक नजर डा. दयाल की ओर देखा और पुनः सरोज से आंखें मिलाते हुए जवाब दिया , जो जो भी काम डाक्टर साब ने बताये वो सारे काम किये । सरोज हतप्रभ थी ऐसे जवाब से । मगरुर लडकी !  सरोज का हाथ उठा कामिनी पर तभी डा. दयाल ने हाथ पकड लिया सरोज का ।

   निकल जा मेरे घर से बदचलन , पांव मत रखना आज के बाद मेरे घर में  सरोज ने चिखते ङुए कामिनी को बाहर जाने का इशारा किया । कामिनी खडी रही तभी डा. दयाल ने कामिनी को आंखों का इशारा करते हुए कहा , कामिनी तुम क्लीनिक पर जाओ मैं आ रहा हुं । पैर पटकती हुइ कामिनी के जाते ही सरोज रो पडी जोरों से, प्लीज इसको आज ही इसके गांव रवाना करो । मैं इसे एक पल भी नहीं देखना चाहती । सरोज की निगाहें डा.दयाल के  चेहरे पर आते जाते भावों पर गौर कर रही थी मानो वो डा. के चेहरे के भावों  से अपना मुल्यांकन कर रही थी ।                                                         

“देखो सरोज अनावश्यक जिद ना करो । कामिनी के बिना हमारे क्लिनिक और घर का सारा काम बिगड जायेगा । उसे अब नहीं हटाया जा सकता ।“

इतनी महत्वपुर्ण हो गई  है वो अब आपके लिये  ? मुझसे भी ज्यादा ?                                                  

हां कुछ मामलों में तुमसे भी ज्यादा।                                                       

कौन से मामले हैं वो जो ऐसी आवारा बदचलन लडकी को हमारे यहां रखना इतना जरुरी है ?                                                                      तुम सब समझती हो सरोज ,में इसका जवाब देना जरुरी नहीं समझता । यह कहते हुए डा. दयाल रोती बिलखती सरोज को छोड क्लीनिक पर पहुंच गये जहां बिफरी शेरनी की तरह बैचेन कामिनी डा. का इन्तजार कर रही थी ।   डा. दयाल को देखते ही गुर्राई ,मुझे क्या करना है अब डा. साब ?

कुछ नहीं कामिनी तुम अब घर का कोई काम नहीं करोगी । तुम्हे क्लीनिक ही सम्हालना है ।          

क्यों ? ऐसा क्यों ?                                                                          

मेरी बात को समझो , कुछ ही दिन में सब ठिक हो जायेगा । तुम कुछ दिन तक शाम को गांव चली जाया करो और यहीं रात रुकना हो तो मैं क्लीनिक का पिछला कमरा साफ करवा देता हुं । में तुमसे रोज ही मिलता रहुंगा ।

पर ऐसा कब तक चलेगा डा. साब  मैं अब तुम्हारे बिना एक दिन भी नहीं रह सकती । कामिनी रुआंसी हो उठी ।  “ प्लीज थोडा धीरज धरो ,हम सब ठीक कर लेगें ।“

    अन्ततः ऐसा ही हुआ । कामिनी अब डा. दयाल के घर नहीं जाती अपितु क्लीनिक पर ही रहती . शाम को कभी घर चली जाती कभी वहीं रात रुक जाती । डा. दयाल का ज्यादातर समय अब क्लीनिक पर ही बितने लगा । शाम को भी देर तक डा. क्लीनिक पर  ही रहते इस बिच मौका मिलते ही दोनो का मिलन हो जाता । प्यास बुझ जाती । लेकिन इस प्यास का यह भी उसुल है कि सहज उपलब्धता प्यास को कम करती है जबकि रुकावटें प्यास को जबरदस्त ढंग से भडकाती है । दोनो कामपीडित देह चाहती थी पुर्ण स्वतंत्रता, निर्बाध मिलन , अनवरत संलग्नता ।

डा सरोज काफी लड झगड कर , डा दयाल को टोक टोक कर ताने मार मार कर थक चुकी थी । कई दिनो  तक दोनो के बिच अबोला रहा । डा दयाल ने अफसोस जता  कर वातावरण को नार्मल करने का प्रयास किया । डा सरोज का इस तरह के गृहस्थ जीवन से मोह भंग होने लगा था । लड झगड कर अपना प्यार पाने का विचार उसे बिलकुल गवारा ना था , ऐसे कुसमय में याद आई  उसे अपने गुरु स्वामी आत्मानन्द की । स्वामी आत्मानन्द का हरिद्वार में विशाल आश्रम था । वर्ष में एक बार स्वामीजी के प्रवचन का आयोजन नगर में अथवा इस क्षेत्र में  होता रहता था । सरोज ने इस सारी घटना का विस्तार से ना सिर्फ जिक्र ही  स्वामी आत्मानन्द से किया था बल्कि उन्हें यहां तक कह दिया था कि बेटी के कारण ही उसे रुकना पड रहा है अन्यथा अब उसे जीवन से कोई  मोह नहीं रहा । स्वामीजी ने उसे समझाया था कि सब ठीक हो जायेगा और यह भी कहा कि जरा भी दिमागी विचलन हो तो सीधे आश्रम ही चली आना कोई  गलत कदम मत उठाना । डा. दंपत्ति का जीवन युं ही तनावपुर्ण चल रहा था । डा.दयाल कुशलता से बिलकुल गुप्त ढंग से अपनी अय्याशी के मौके निकाल ही लेता था जबकि सरोज का ज्यादातर समय अब धार्मिक क्रियाकलाप ,पुजापाठ में बितने लगा था । ऐसे में आई  वह एक बरसाती शाम जिसने सरोज के जीवन की धारा ही बदल दी ।

डॉ० दंपत्ति को एक पारिवारिक मित्र के यहां विवाह समारोह का निमंत्रण आया था , विवाह स्थल  25-30 किलोमीटर दुर था । दोनो पति पत्नी दोपहर होते होते वहां पहुंच गये थे और देर रात तक लौटने का प्लान था । अचानक क्लीनिक से एक सिरियस केस का फोन आने से डा.दयाल सरोज से वापस लौटने का कह कर चल दिये । क्लीनिक पहुंचे , नया मरीज भर्ती अवश्य हुआ था लेकिन ज्यादा सिरियस नहीं था । उसे आवश्यक ट्रीटमेन्ट देकर डा.दयाल वापस फंक्शन में जाने को घर पर तैयार हो रहे थे कि मौका देखकर कामिनी घर पर आ गई  दोनो बेताब थे मोके का फायदा उठाने को , रोक ना सके कुद पडे वासना के गहराते सागर में । महिनों बाद आजादी का अहसास हो रहा था । आधे घंटे बाद ही डा.दयाल ने जाना चाहा लेकिन कामिनी छोडने को तैयार नहीं थी ,लिपटी थी जैसे अब कभी नहीं छोडेगी उसकी प्यास बढती ही जा रही थी । अन्ततः डा.दयाल ने सरोज को फोन लगा ही दिया कि वो हास्पीटल में उलझ गया है देर हो जायेगी हो सकता हे न आ सके, फंक्शन पुरा करके डॉ०माथुर की गाडी से सरोज आ सकती है । सरोज चिन्तित थी जल्दी घर पहुंचने के लिये उसे पुरा सन्देह था कि इस तरह जाना और रुक जाना एक प्लान ही हो सकता हे। वह इसी प्रयास में थी कि किसी साधन से जल्दी घर पहुंचे ।

  डॉ० दयाल को अन्दाजा था  कि सरोज किन्ही साधनो से जल्दी भी आना चाहेगी तो भी विवाह समारोह के कारण उसे तीन से चार घंटे तो लगेंगे ही और इतना समय पर्याप्त था दोनो की भुख प्यास मिटाने के लिये । दोनो शरीर एक दुसरे में समाने लगे थे । इन्ही रंगरेलियों के चलते अचानक बाहर हुई  कुछ आहट से दोनो चोंके | सम्हलते तब तक सरोज अन्दर आ चुकी थी ।  वस्त्रहीन डा दयाल ने लपक कर बेडरुम का दरवाजा बन्द किया और दोनो शीघ्रता से कपडे पहनने लगे । सरोज दोनो हाथों से ठोकती रही दरवाजा लेकिन पुरे कपडे पहन कर ही डा.दयाल ने दरवाजा खोला और दरवाजा खोलते ही कामिनी तेजी से निकल कर बाहर चली गई । डॉ०दयाल आगबबुला होती चिखती चिल्लाती सरोज को शान्त करते रहे । अचानक सरोज चुप हो गइ दुसरे कमरे में जाकर दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया | तभी सरोज को बाहर सोती बेटी का ध्यान आया पुनः दरवाजा खोलकर बेटी को लेकर कमरे में बन्द हो गई  । घंटो डॉ०दयाल दरवाजा बजाते रहे लेकिन दरवाजा नहीं खुला । अन्ततः डॉ०दयाल देर रात थक कर , दो पेग चढा कर हाल मे ही सो चुके थे । रात भर की जगी सरोज काफी सोच विचार कर निर्णय ले चुकी थी । खुद के और बेटी के कुछ कपडे और कुछ रुपये पर्स में रख सुरज निकलने के पहले ही डॉ०दयाल को हाल में सोता छोड एक विरक्त नजर डालते हुए निकल कर पहुंच चुकी थी रेल्वे स्टेशन । उसका लक्ष्य था स्वामी आत्मानन्द का आश्रम हरिद्वार ।

  क्लीनिक के पिछले कमरे में बेड पर रात भर करवटें बदलती, सोती जगती कामिनी बेचेन थी अब क्या होगा ? क्या उसे अब गांव जाना होगा , हमेशा के लिये ? बडी मुश्कील से सुबह सुबह नींद लगी होगी कि डॉ०दयाल ने उसे जगाया , “ वो चली गई  कामिनी ।                             

कौन  ? कामिनी हडबडाकर उठ बैठी                                                           

“सरोज” , डॉ०दयाल ने जवाब दिया ।  अब क्या होगा डॉ०साब ? मेडम ने तो सब कुछ देख लिया है , बडी बात हो गई  ना ?            

देखो किसी से भी ये सब कहने की जरुरत नहीं हे । मेडम अपने मायके गई  है  कुछ दिनों के लिये । तुम बिलकुल नार्मल ही रहना , बाकी मैं सम्हाल लुंगा ।

पर मुझे मत छोड देना तुम , मैं अब बिलकुल नहीं रह सकती तुम्हारे बिना प्लीज ।                      

हां हां ठीक हे तुम जरा धीरज रखो डॉ०दयाल ने कामिनी की पीठ सहलाई 

हम शादी कब करेंगे डॉ०साब कामिनी ने डॉ०के गले में बांहे डालते हुए लिपट जाना चाहा । डॉ० दयाल ने उसे झिडकते हुए एक तरफ किया , “ तुम्हे शादी की पडी है  यहां सब उलझता जा रहा है । तुम ऐसा करो कुछ दिन गांव चली जाओ । “

“ नहीं में अब दुर नहीं रहुंगी । मुझे यहीं रहने दो मैं कुछ नहीं बोलुंगी प्लीज । “  डा दयाल कुछ जवाब दिये बिना वापस अपने क्वार्टर की ओर चल दिये थे । उनका दिमाग समस्या की गंभीरता को तोल रहा था । घर के हाल में घुसते ही उनकी नजर पडी सेन्ट्रल टेबल पर रखे कापी के एक पन्ने पर , बिना संबोधन के सरोज ने दो पंक्तियां लिखी थी,, जा रही हुं में हमेशा के लिये , अब मुझसे मिलने की मुझे खोजने की कोशीश मत करना ,,  डा . दयाल के दिमाग मे एक साथ दो बातें कोंधी पहली तो यह कि सरोज कोई  लफडा खडा नहीं कर रही है  उसका मन का भय कुछ कम हुआ । दुसरे नया भय , क्या सचमुच सरोज अब वापस नहीं आयेगी ? सिर पकड के आधे घंटे से बेठे डा.दयाल अभी तक तय नहीं कर पाये थे कि ये अच्छा हुआ य़ा बुरा हुआ।

  तभी उनके बालों में ङाथ फेरती कामिनी की आवाज सुनाई  दी खाना बना दुं ?

डा.दयाल  ने जवाब दिये बिना आलमारी में रखी व्हीस्की की बाटल की ओर इशारा किया कामिनी लपक कर बाटल और दो ग्लास ले आई  । दोनो मिलकर सारी परेशानी भुलने की कोशीश करने लगे । अब कोई  अवरोध नहीं था दोनो के बिच । कोई  रोकने वाला नहीं ,कोई  टोकने वाला नहीं । । स्टाफ वालों और आसपास वालों से छुपते छुपाते दोनो स्वच्छंद अय्याशियों में डुब गये । नित नये तरिके से रोज रोज मजे लेने लगे ।लेकिन अति कहीं भी हो किसी भी क्षेत्र में हो अन्ततः हानिकारक ही होती है ।                  

डा.दयाल वो भंवरा था जिसे किसी एक फुल के पराग कण बांध नहीं सकते थे । कुछ ही दिनों में डॉ० को कामिनी से उक्ताहट होने लगी वैसे भी कामिनी से खेलते खेलते  डॉ० को 3 साल होने को आये थे इस बिच बढती उम्र और तीन चार बार कराये एबार्शन से कामिनी के शरीर का आकषर्ण  फिका पडता जा रहा था चेहरे की चमक अब पहले सी नहीं रह गई  थी । मदमाती मस्त आंखों के निचे स्याह काले धारे पडने लगे थे।

डॉ० दयाल का ज्यादा समय अब शासकिय असपताल में गुजरने लगा था । कामिनी क्लीनिक पर ही रहती उसे अस्पताल आने की परमिशन नहीं थी । जब तब कामिनी द्वारा शादी की जिद किये जाने पर डॉ० का एक ही जवाब होता कि पहले सरोज से तलाक की कार्यवाही हो जाने दो । मजबुर असहाय कामिनी कुछ न कर पाती उसकी बोखलाहट , चिडचिडापन बढता जा रहा था । इसी बिच कामिनी को आया बुखार  टाइफाइड में बदल गया . उसी क्लीनिक में पुरे एक माह भरती रही कामिनी . य़द्यपि डा.दयाल ने कामिनी के इलाज में कोई  कमी नहीं रखी लेकिन बुखार के बाद आराम करने के नाम पर कामिनी को गांव भेज दिया । कामिनी के ना नुकुर करने के बावजुद उसे पुरे दो माह गांव रहने की हिदायत दे डाली । कामिनी ने डॉ० को गांव आकर मिलते रहने की बहुत कसमें डाली लेकिन डॉ० कुछ भी बहाने बना कर टालता रहा ।

गांव में रहते हुए कामिनी का एक एक दिन पहाड सा गुजरता वह बिमार हालत में भी कई  बार शहर आने की सोचती पर डॉ० दयाल जाते जाते उसके बापु के कान में क्या मंत्र फुंक गया था कि उसके बापु ने उसकी एक ना सुनी । दुखी कामिनी घर में अकेली पडी  पडोस की रमली काकी को अपने सारे सुख दुख सुनाकर जी हलका करती । रमली काकी उसे धीरज तो बंधाती पर चेतावनी भी देती उसे कमली कह कर ही बात करती । रमली काकी के अनुसार “ मरद जात तो कुतरा से जरा कम नी हे झां खुल्लो मिल्यो कि मुं मारियो “ लेकिन कामिनी को डॉ० पर पुरा भरोसा था वो सपने देख रही थी तबियत ठीक होते ही शहर जाकर डॉ० का घरबार  सम्हालने के ।

जैसे तैसे  एक आध महीना बिता होगा कि कामिनी को मौका मिला शहर जाने का । रामौतार कहीं बाहर गया था और कामिनी की तबियत भी ठीक हो रही थी । भर दोपहरी में कामिनी रमली काकी से बोलकर निकल पडी और पहुंची सीधे क्लीनिक । वहां डॉ० दयाल तो नहीं थे पर स्टाफ के रामसिंह ने मुस्कराते हुए बताया ,,डॉ० साब तो घर पर आराम करने गये हैं,, कामिनी जब डॉ० के घर की ओर मुडी तो रामसिंह ने रोका अभी मत जा , थोडी देर यहीं रुक , डा.साब ने किसी को भी घर आने का मना किया है । कामिनी की त्योरियां चढ गई ,”  मेरे लिये कोई  मनाही नहीं है  , मेरा ही घर है                                       “ अरे उनके मेहमान आये हुए हें अभी मत जा ।“  कामिनी बिना रुके डॉ० के घर की ओर चल दी । घर के बाहर जरा रुकी , अन्दर से हंसी मजाक की आवाजें आ रही थी , निश्चित रुप से उसमें एक आवाज किसी स्त्री की भी थी । कामिनी को काटो तो खुन नहीं । कालबेल बजाई  कोई  जवाब नहीं लेकिन हसीं मजाक की आवाजें बन्द हो चुकी थी ।

    कामिनी लगी जोरों से दरवाजा ठोकने । कुछ क्षणों मे ही डॉ० दयाल ने  दरवाजा खोला , कामिनी तुम ? इस वक्त यहां ? कामिनी ने कुछ ना सुना डॉ० को धकेलते हुए सीधे बेडरुम में पहुंच गई  और वहां का नजारा देखते ही  खडी रह गई  । बिस्तर पर शरीर पर चादर डाले अधनंगी सी लेटी सकुचाती हुइ एक 17-18 साल की लडकी को देखा । घुमकर डॉ० की ओर देखा और झपट पडी डॉ० पर , धोखेबाज कमीन बदमाश अब में समझी क्यों तू मुझको गांव से लाना नहीं चाहता था । तुने मेरी जिन्दगी बरबाद करदी , अब इसको बरबाद करेगा ।

डॉ० ने उसे अपनी बांहो मे जकडते हुए चुप करने की कोशीश की , लेकिन कामिनी तो शेरनी की तरह गुर्राती हुइ बेकाबु हो रही थी , आज के आज ही मुझसे शादी कर वरना सारे शहर में  तुझे बदनाम कर दुंगी , पुलिस में रिपोर्ट कर दुंगी ।

   ठीक है  जो तू कहेगी वह सब होगा तू चुप रह । डॉ० ने समझाया । तब तक बिस्तर पर अधनंगी पडी लडकी तेजी से उठी और अपने कपडे पहन कर बाहर भाग चुकी थी । उसकी ड्रेस देख कर कामिनी ने जाना वो भी एक नर्स ही थी । डॉ० ने समझाया कामिनी को , चल गांव चलते हें तेरे बापु से बात करने । बेकाबु होंशोहवास में कामिनी डॉ० की गाडी मे बैठी  यही सोच रही थी कि पहले शादी हो जाये फिर उस चुडेल से निपटुंगी जो डॉ० के बिस्तर में मेरी जगह सो रही थी ।

 गांव पहुंच कर डॉ० ने कामिनी को उसके टापरे पर उतारकर रामौतार को गाडी में बिठाया और वापस शहर की ओर गाडी घुमा दी । कामिनी को बस यही बताया कि अभी आते हें शादी के कागज तैयार करके । बदहवास कामिनी  रात भर इन्तजार करती रही बापु का और डॉ० का । कोई  नहीं आया । रमली काकी उसे कमली , कमली कह कर  समझाती रही बडे लोगों की बदमाशी का , मरद जात की लुच्चई का कोई  अन्त नहीं  है  कमली उसे भुल जा । रोती रही कामिनी रात भर और भ्रमित होती रही कि वो कामिनी है या कमली .  रात भर संताप करते करते सुबह सुबह नींद लगी होगी कामिनी की ( ओफ अब इसे कामिनी कहा जाये या कमली ) कि अचानक बाहर से आने वाली आवाज से कामिनी उर्फ कमली चौंक कर उठी । देखा तो बापु गिरते पडते , लडखडाते आ रहे थे शरीर पर चोंटो के भी निशान थे । कमली चिल्ला पडी क्या हुआ बापु ? कैसे हुआ ये सब,  डॉ० साब कहां है ?

कराहते हुए रामौतार बोला मत पुछ बेटी । डॉ० का ही किया धरा है ये सब ।

क्या कह रहे हो बापु ? डा.साब ने पिटवाया तुमको ? कमली चीख उठी ।मुझे सब सच सच बताओ ।

मैं सब बता दुंगा बेटी पर पहले तू एक सोगन खा मेरे सामने ।                                       

 क्या बापु ? कमली विचलीत हो रही थी ।                                                        

तू आज के बाद उस कमीन डॉ० का नाम भी नहीं लेगी ,उस के घर पांव भी नही रखेगी । बोल बेटी मानेगी मेरी बात ? कमली तो मानो आकाश से जमीन पर गिरी वो भी काटो भरी जमीन पर । क्यों बापू ऐसा क्यों ? वो तो मेरे से ब्याह रचाने को तैयार बैठा है ।

“ नहीं बेटी तू भरम में जी रही है  वो एक नंबर का बदमाश  है  उसी ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी है कि कमली नाम की उसकी नौकरानी उसके घर से सोने के कडे और नगद रुपे दस हजार की चोरी करके गांव भाग गई  है  ।“ कमली बेहोश सी होने लगी उसे विश्वास नहीं हो रहा था  जो वो सुन रही थी , रामौतार बोले जा रहा था , मुझे थाने पर बन्द कर दिया था और पुलिस ने बहुत मारा फिर डॉ० ने ही छुडाया वो भी इस शर्त पर कि आज के बाद मैं या तू उसके घर कभी भी नहीं जायेंगे वरना वो हम दोनो को जेल में बन्द कर देंगे । बेटी तू डॉ० को भुल जा  

बापु ऐसा मत बोल , रो पडी कमली, मैं बरबाद हो जाउंगी , मै जी नहीं पाउंगी उसके बिना कमली विलाप करने लगी । तभी पडोस से रमली काकी भी आ गई  उसने कमली को अपनी बाथ मे भर लिया , चुप कर चुप कर कमली रो मत “ ई  तो सबइ मरद लुच्चेइ होत हैं मेरी फुल सी बिटिया को बिगाड के बरबाद कर दिया । पहले अपनी घरवाली को त्रास दिया उसे बेघर किया , फिर तुझे पुरा निचोड के फेंक दिया . अब किसी और को बरबाद करेगा । ई  तीन तीन औरतन का जीवन नरक करने वाले मरद का तो कुछ नही बिगडा । या दुनिया एसीज हे बेटी । तू धीरज धर ।“

लेकिन कमली को धीरज कहां था उसके तो सारे सपने घराशाई हो गये थे । क्या क्या सोचा था उसने । रामौतार तो अद्धा पी के बेहोश होता सो गया लेकिन काकी की गोद मे कमली सारी रात रोती रही । सुबह देर को जागी कमली एक घंटे से टापरे की कच्ची दिवार में लगे आईने में खुद को निहारती खोज रही थी उस मासुम अल्हड कमसिन कमली को या मदमाते यौवन और खुबसुरत जिस्म वाली उस कामिनी को जिसने डॉ० दयाल को दिवाना बना दिया था उसका । लेकिन उसे आईने में ना तो वो कमली मिली और ना ही वो कामिनी , हां उस आईने में उसे दुखी होती रोती कलपती डॉ० सरोज जरुर दिखी । कमली के कानो में रमली काकी के स्वर गुंज रहे थे , तीन तीन औरतन का जीवन नरक बनाने वाले इ मरद जात का क्या बिगडा? लेकिन कमली जो डॉ० की संगत मे रह कर कुछ कुछ पढे लिखे लोगों जैसा भी दिमाग रखती थी , ये भी सोच रही थी कि ,”  हर औरत का जीवन बिगाडने में मरद के साथ किसी ना किसी औरत का भी हाथ रहता जरुर है ।“

महेश शर्मा

धार, मध्य प्रदेश 


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