हे धन्य श्रमिक!

अरुणिता
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 हे धन्य श्रमिक! तुम स्वेद - स्नेह दे

जीवन - दीप जलाते हो। 

धरती माँ के सच्चे सपूत

श्रम का शुभ चक्र चलाते हो। 

 

कंधों पर सपनों को ढोते

अंतस में दृढ विश्वास लिये। 

पत्थर को सोना कर देते

अधरों पर अमृत - प्यास लिये। 

भोर की प्रथम किरणों के सँग

कर्तव्य - पंथ अपनाते हो। 

 

थक - हार भला तुम कब बैठे

संघर्षों से ही नाता है। 

नवगीत सृजन के रच - रचकर

मृदु कण्ठ तुम्हारा गाता है। 

हर विपदा से सिर टकराकर

तुम सदा विजयश्री पाते हो। 

 

बल, कौशल और कला से ही

बंजर में फूल खिला देते। 

पतझड़, मधुऋतु की प्रकृति साथ

जीवन - संयोग मिला लेते। 

सीमित पूँजी. संसाधन में

प्रिय बच्चों को दुलराते हो। 

 

राष्ट्र की प्रगति के संपोषक

करते हो सतत कर्म - पूजा। 

तुम संस्कृति के रक्षक महान

तुम - सा न कोई तपसी दूजा। 

जग सुख - वैभव से सज जाता

जब तुम निश्छल मुस्काते हो। 

 

-गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर 

लखनऊ 226022 

दूरभाष 09956087585 

ईमेल - gsvaish51@gmail.com 

 

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