ग़ज़ल

अरुणिता
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1

अंधियारों से तो ये डर बोलेगा जाकर

दरबारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

ये बोलेगा इससे, उससे वो बोलेगा

सरकारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

तू भी है उस पार कहीं, इस पार कहीं मैं 

दीवारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

चांद, समंदर, साजिश, कश्ती, ख़ामोशी है

मछुआरों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

जंगल-जंगल आग लगी है, बुझना होगा 

अंगारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

थोड़ा चूल्हा सुलगाओ कुछ धुआं दिखे तो

बंजारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

क्या लिखना है, क्या लिखते हो, शर्म करो कुछ

अख़बारों से कौन मगर बोलेगा जाकर

 

 

2

लाचारी के दौर में कोई लाचारों के साथ नहीं था

तूफ़ानों के डर से कोई मछुआरों के साथ नहीं था

 

जंगल, बस्ती जहां कहीं भी आग लगाई थी जिस दिन भी

उस दिन कोई भी अंगारा अंगारों के साथ नहीं था 

 

हर युग में लड़ने वाला हर सैनिक ख़ूब लड़ा था, पर वो

हथियारों के बीच में रहकर हथियारों के साथ नहीं था

 

सच्चाई के नाम पे जब-जब झूठ छपा था अख़बारों में

अख़बारों का अक्षर-अक्षर अख़बारों के साथ नहीं था

 

बिकने वाले की कीमत तो तय कर दी बाज़ारों ने, पर

बिकने वाला माल कभी भी बाज़ारों के साथ नहीं था 

 

जंगल-जंगल, पर्वत-पर्वत, भटका लेकिन क्या जानूं मैं

क्यों बंजारा होकर भी मैं बंजारों के साथ नहीं था

 

  

डॉ. राकेश जोशी

प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष

अंग्रेज़ी विभाग

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला

देहरादून, उत्तराखंड

मोबाइल: 9411154939

 

 

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