आओ एडमिन-एडमिन खेले

अरुणिता
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मिसेज राय मेरी पुरानी जानकार हैं। अरे साहबचौंकिए मतजानकार का मतलब बस उतना ही है, यानि साहित्यिक जानकारअब ये भी मत समझ लीजिए कि ‘पुरानी जान-पहचान’ का कोई लव-एंगल ही होता है। नहीं हुज़ूरऐसा कुछ भी नहीं है। बात बस इतनी-सी है कि साहित्य के कुछ पुराने मंचों से अपना संपर्क जुड़ा रहा था और मिसेज राय उनमें सक्रिय सदस्य हुआ करती थीं। ये बात अलग है कि उनके मिस्टर उनके हर पुरुष मित्र से दोस्ती को एक ही एंगल से देखते और नापते थे। मिसेज राय की एक परम शिष्या ने हमसे पूछा भी था- “लेखक महोदय सुना है आप भी उस कतार में थेजिसमें मिसेज राय के मिस्टर राय अपनी पत्नी के प्रेमी खोजा करते हैं? हालाकि किस्सा कुछ यूँ बयां किया गया- मिसेज राय पहले आपके साथ प्रेम में थीफिर आपने भाव नहीं दिया तो बहाव ने जोर मारा और वे शिवेंद्र के साथ साहित्यिक भविष्य तलाशने लगी और उनकी ये तलाश लगातर चलते हुए अशोक राठी पर जाकर थोड़े समय के लिए ठहर गयी। हमें उनकी परम शिष्या के वक्तव्य पर जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ, जबकि उन्हें अपेक्षा थी कि आश्चर्य होना ही चाहिए था।

अब मेरा भी जवाब सुनिए- “देखिये, इस पुरे किस्से में एक ही दिलचस्प पहलु है- कि जितने भी नामचीन धुरंदरों के नाम अपने गिनाये हैंये मुझसे पहले से साहित्य पर कुंडली मारे बैठे हैंऔर बात सिर्फ इतनी ही मजेदार है कि अगर मेरे और मिसेज राय के प्रेम- प्रस्नाग में रत्ती भर भी सच्चाई होती तो मैं दावे से कह सकता था कि ये धुरंदर मेरी जूठी पत्तल चाट रह हैं। यह बात मैंने इतने अलग अंदाज में कही कि परम शिष्या भी घंटों विचार मग्न रही। वैसे एक बार मिसेज राय ने परम शिष्या को सोशल मिडिया के चैट बॉक्स के कुछ स्क्रीनशॉट भेज यहाँ कहा- देखना इन सबसे कहीं साबित तो नहीं होता कि मेरे और ज्योतिप्रसाद साहब के बीच कोई प्रेम-प्रसंग भी है?

बहराल पिछले कुछ वर्षों से मिसेज राय के मन में साहित्यिक तरंगें कुछ ज़्यादा ही मचल रही थीं। हर हफ्ते कोई न कोई कविताकहानीसंस्मरण या व्यथा-कथा लेकर उपस्थित हो जाती थीं। लेखन में भावुकता तो थीलेकिन गहराई और शिल्प से उनका रिश्ता उतना ही था जितना ड्राफ्टिंग की स्याही का बारिश से बहता हुआ और मिटता हुआ। अब आप कहेंगे, “क्वालिटी?” तो हुज़ूरआजकल क्वालिटी का क्या कामअब तो बस क्वांटिटीकनेक्शन और कमेंट ही साहित्य की कसौटी हैं।

मिसेज राय स्टबलिश होने के हर दांव चलने की जुगत लगाती और मुझसे चर्चा भी करती। उनकी एक बड़ी पीड़ा थी—पहचान कहाँ है?” वे पहचान को लेकर उतनी ही बेचैन रहती, जितनी बोतल का ढक्कन खुलने के बाद शराब के गिलाश में डलने तक शराबी बेचैन हो उठता है।

पत्र-पत्रिकाओं में भेजा तो हर जगह से “आपकी रचना इस बार की पत्रिका के अनुरूप नहीं है”— जैसे ‘सॉरीनो एंट्री’ की पट्टी लगाकर लौटा दिया गया। जब उन्होंने मुझसे इस बाबत चर्चा की तो मैंने पहला धन्यवाद तो संपादकों को ही दिया— “चलिएकुछ लोग तो अभी भी स्त्री-लेखन को सिर्फ स्त्री होने की वजह से नहीं छापतेये राहत की बात है।”

चूँकि जानकार थींसो मैंने भी अपने कर्तव्यों की गठरी उठाई और उन्हें प्रसिद्धि की एक आजमूदा युक्ति बताई— “मिसेज रायआजकल कौन पत्रिकाओं को पूछता हैअब तो साहित्य भी 'डिजिटलहो गया है। सोशल मीडिया का ज़माना है। वहीं जाइएवहीं छपिएवहीं चमकिए, स्व-छपास से बेहतरीन युक्ति कुछ हो ही नहीं सकती।”

उन्होंने आँखें फैला दींजैसे मैं उन्हें किसी काली विद्या की दीक्षा दे रहा हूँ— “सोशल मीडियावहाँ क्या होता है?”

मैंने उत्साह से जवाब दिया— “पूछिए क्या नहीं होता! वहाँ सरकारें बनती हैंगिरती हैंनेताओं के भाषण वायरल होते हैं और साहित्यिक खेमे पलक झपकते बनते-बिगड़ते हैं। वहाँ तो कब कौन किस जातकिस धर्मकिस विचारधारा से है— यह भी फेसबुक तय करता है।”

हमें भी सिखाइए नज्योतिप्रसाद जी। हम भी एक दिन में फेमस होना चाहते हैं।”
उनकी आँखों में वही चमक थी जो किसी प्रतियोगी शो में पहले ऑडिशन देने वाले गायक की होती है।

मैंने अपना ताज़ा-ताज़ा खरीदा स्मार्टफोन जेब से निकाला मानो ये मोबाइल नहींकिसी साधु का चिमटा हो। मैंने उनका फेसबुक का खाता बनवायाप्रोफ़ाइल फोटो से लेकर कवर फोटो तकबायो में “साहित्य प्रेमीभावनाओं की अभिव्यक्ति की साधिका” जैसी पंक्तियाँ डलवाईं और फिर उन्हें तमाम ग्रुपों में जोड़ना शुरू किया।

दो दिन के अंदर उन्होंने फेसबुक का ककहरा सीख लिया। जैसे कोई बच्चा 'से 'अक्षरसे सीधा 'ज्ञानतक पहुँच जाए।

फिर एक दिन मेरे पास आ धमकीं— “ज्योतिप्रसाद जीअब फेसबुक समझ आ गयाअब फेमस होने के फंडे भी बता दीजिए।”

मैंने उन्हें अपने बनाए हुए साहित्यिक समूह में जोड़ा और उन्हें प्रेरणा दी— “अब आप यहाँ अपना साहित्य प्रकाशित किया कीजिए। न कोई संपादकन कोई रिजेक्शनन कोई प्रतीक्षा सूची। जो लिखावह पोस्ट। ये मंच लोकतांत्रिक हैऔर यहाँ हर कोई अपना संपादक है।”

वह हर्षित हुईं। मैंने गुरु मुद्रा में गर्दन ऊँची की— “एक और आत्मा को प्रकाश मिला।”

अब उनकी कविताएँ और रचनाएँ ग्रुप में आने लगीं। मैं उन्हें अप्रूव कर देताकमेन्ट और लिखे का दौर शुरू हुआ लेकिन महत्वाकांक्षा तो अजायबघर की बिल्ली थी— हर गेट खोल लेती थी। कुछ ही दिन में उन्हें ये नागवार गुजरने लगा कि उन्हें भी अपनी रचना को 'एप्रूवके लिए भेजना पड़ रहा है।

हमसे पूछे बिना कोई कैसे तय कर सकता है कि हमारी रचना पढ़ने योग्य है या नहीं?”
ये सवाल लेकर वह फिर उपस्थित हुईं। मैंने संतोष की साँस ली, मौका आ गया था उन्हें ‘अमृत’ पिलाने का।

मैंने उन्हें ग्रुप का एडमिन बना दिया। और कहा- “अब आप खुद फैसला लेंगी कि कौन-सी और किसकी रचना छपेगी और कौन नहीं।”

उन्होंने आह्लादित होकर कहा—“मतलब हम अब संपादक हुए?”

जी बिल्कुलऔर स्वघोषित भी,” मैंने मुस्कराकर कहा।

अब मैं राहत में था। कोई और ग्रंथ-समीक्षा करेहमें क्यों झंझट उठाना?

पर ये चैन ज्यादा दिन कहाँ टिकता है साहबकुछ ही सप्ताहों में मैंने देखा— ग्रुप में एडमिनों की एक फौज तैनात हो गई है। कोई एक नहींपाँचछहदस।

मैंने पूछा— “मोहतरमाये क्याइतने एडमिन?”

उन्होंने मुस्कराकर कहा—“ ज्योतिप्रसाद जीहमने काम बाँट दिया है। कोई कमेंट मॉडरेट करेगाकोई लाइक बढ़ाएगाकोई आलोचना रोकने की ज़िम्मेदारी लेगाऔर कुछ विशेष सदस्य बनाये हैं जो बस मेरी तारीफ ही करेंगे!”

“...”

किराये के टट्टू नहीं हैंसब वालंटियर हैं”—वह खिलखिला दीं।

मैंने भीतर ही भीतर माथा पीट लिया— “गुरु बनकर चेला ने ही गद्दी हथिया ली।”

अब ग्रुप में अजब लोकतंत्र था। कभी कोई एडमिन बनताकभी हटता। जो भी मोहतरमा के खिलाफ बोलेया तटस्थ टिप्पणी करे, उसे ग्रुप से बाहर! जो भी कसीदे पढ़े बस वह अगला एडमिन! हमारे देखते-देखते एक पूरा साहित्यिक साम्राज्य ‘लाइक एंड लायल्टी’ पर टिका हुआ था।

फिर एक दिन ग्रुप में एक ‘नोटिस’ आया: सभी सदस्यों से अनुरोध है कि केवल पढ़ने से काम नहीं चलेगा। कृपया नियमित कमेंट और लाइक करें। निष्क्रिय सदस्य एडमिन की नजर में हैं। मैंने टोका— "कृपया लोगों पर दबाव न डालें। साहित्य पाठ से उपजता हैभय से नहीं।"

अगले दिन देखा— मैं एडमिन नहीं था। मुझे ग्रुप से नहीं निकाला गया, बस यही मेरी पुरानी सेवाओं का सम्मान था। लेकिन अब मैं खुद के बनाए घर में किरायेदार की तरह था।

फिर एक दिन मैंने मिसेज राय की एक रचना पर टिप्पणी कर दी, सीधी-सादी लेकिन आलोचनात्मक—  “भाव अच्छे हैंलेकिन शिल्प में सुधार की गुंजाइश है।”

इतना कहना था कि मिस्टर सहाय (नए एडमिन) गरजे: “आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। साहित्य की समझ आपको नहीं है।”

मैंने शांत स्वर में कहा— “साहित्य न कोई मंत्र हैन कोई मोक्ष। इसमें आलोचना भी उपासना का ही हिस्सा है।”

वो भड़के— “हम ग्रुप एडमिन हैंहमसे अदब से पेश आइए।”

मैंने मुस्कुराकर कहा— “बिल्कुलआप आज हैंकल कोई और होगा। मैंने इस कुर्सी को घूमते देखा है। इसका कोई स्थायी वासी नहीं होता।”

मुझे पता था कि अब बहस का कोई मतलब नहीं। एडमिन-एडमिन का ये खेल चलता रहेगा।

हम अब भी वहीं हैंटिप्पणियाँ करते हुए। बस फ़र्क इतना है कि पहले मंच हमारे नीचे थाअब सिर के ऊपर से गुजर जाता है।

और मिसेज रायवो अब भी ग्रुप चला रही हैं। शायद नए एडमिन ढूँढ रही हैं।
हम बस इतना कह सकते हैं— “साथी दिल पे न लेले भी ले तो दिल की धड़कनें मत रोके। मीठी मुस्कान के साथ हमारे संग "एडमिन-एडमिन" खेले, कभी न कभी आपकी भी बारी आएगी!”

 

सन्दीप तोमर 

नयी दिल्ली- 110059

89377875009

 

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