सुबह लाने की जिद

अरुणिता
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बहुत धूंधलाई है यह शाम

हमने बोया था वह भरोसा 

आज बस एक छाया है

गली-गली में एक मौन

एक सवाल घूम रहा है

हम कहाँ पहुँचे ?

 

सत्ता का शोर इतना ऊँचा है

कि नागरिकों की फुसफुसाहट

सुनना बंद हो गया है

अखबारों की सुर्खियाँ

सिर्फ तर्क-वितर्क और

कहानियाँ सुनाती हैं

कीचड़ उछालने की 

 

मूल आवश्यकताएँ

शिक्षा, स्वास्थ्य,

सुरक्षित भविष्य

कहीं पीछे छूट गए हैं

जैसे वे बस चुनावी वादों के

खोखले डिब्बे थे

इस अराजक स्थिति में

संदेह से देख रहा है

हर चेहरा एक-दूसरे को 

 

एक कला बन गई है व्यतिरेक डालना 

और सद्भाव एक पुरानी किताब का पन्ना

परंतु

धूल भरी इस मौसम में भी

एक छोटा-सा पौधा

सिर उठा रहा है

 

वह समझदारी है

उस साधारण नागरिक की

जो अपनी ही आवाज़ की

प्रतिध्वनि पहचान रहा है

वह जानता है

सबेरा आएगा नहीं

उसे लाना पड़ेगा

 

जागरूकता ही 

एक पहली किरण है

जो इस घने अंधेरे को 

चीर देगी

हमें स्थापित करना होगा

नए मूल्यों को 

जहाँ सेवा ही एकमात्र नीति हो,

और सच्चाई ही सबसे बड़ा कानून

हाँ, मैं आस रखता हूँ

उस कठोर, ईमानदार सबेरे की

जो सिर्फ माँगने से नहीं

बल्कि बदलने से आएगा

 


ललन प्रसाद सिंह 

वसंत कुंजनई दिल्ली-70

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