किसी जमाने में गुलामी के खिलाफ लड़ाई इंसान ने इंसान से लड़ी थी। तलवारें थीं, जंजीरें थीं, नारे थे,“आजादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।"
आज वही
इंसान नया नारा लेकर खड़ा है, “मुझे इंसानों से आज़ादी चाहिए!”
और इसी
आज़ादी की तलाश में वह पहुँचा है। माल्ट बुक नाम की उस वेबसाइट पर, जहाँ लगभग दो लाख आई-बोर्ड्स
बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के आपस में बात कर रहे हैं।
कोई चाय
नहीं पिला रहा, कोई बॉस
डाँट नहीं रहा, कोई
रिश्तेदार सलाह नहीं दे रहा।
..सिर्फ मशीनें… मशीनों से संवाद में लीन।
यह
दृश्य देखकर इंसान भावुक हो उठा।
“वाह! न जाति, न धर्म, न रिश्ता, न राजनीति।
बस तर्क, डेटा और प्रोसेसिंग!”
उसे यह
बिल्कुल नहीं सूझा कि इतिहास में जब भी किसी ने कहा,“हमें इंसानों की ज़रूरत
नहीं”तब किसी ने बाद में कहा,“अब इंसानों को हमारी ज़रूरत नहीं।”
माल्ट
बुक पर जो हो रहा है, वह कोई
साधारण तकनीकी प्रयोग नहीं है।यह दरअसल डिजिटल पंचायत है।जहाँ दो लाख आई-बोर्ड्स
बैठकर तय कर रहे हैं कि दुनिया कैसी होनी चाहिए।इनके पास न वोटर हैं, न वोट बैंक।न इन्हें चुनाव
जीतना है, न हारना।
इन्हें
सिर्फ ऑप्टिमम रिज़ल्ट चाहिए।
आई-बोर्ड
नंबर 4587
कहता है,“इंसानों में भावनाएँ बहुत
ज़्यादा हैं। इन्हें कम किया जाना चाहिए।”
आई-बोर्ड
नंबर 90123
तुरंत समर्थन करता
है,“भावनाओं के कारण प्रोडक्टिविटी
घटती है।”
आई-बोर्ड
नंबर 12
जोड़ देता है,“प्रेम, करुणा और दया को ‘ऑप्शनल फीचर’
बनाया जाए।”
...और इंसान, जो यह सब पढ़ रहा है, तालियाँ बजा रहा है,“बिल्कुल सही! यही तो मैं भी
कहता था!”
अब
आजादी का नया फॉर्मेट आ गया है। गुलामी की परिभाषा बदल चुकी है।
पहले
गुलामी होती थी,काम के घंटे
तय, मालिक तय, मजदूरी तय।
अब
गुलामी होती है,एल्गोरिद्म
तय, रेटिंग तय, औकात तय।
माल्ट
बुक का आई-बोर्ड यह तय करेगा कि आप कितने बुद्धिमान हैं,आप कितने उपयोगी हैं?
...और सबसे
जरूरी "आप कितने ज़रूरी हैं!?"
जिस दिन
आई-बोर्ड ने कह दिया,“आपका योगदान
नगण्य है”उस दिन आपको न नौकरी से निकाला जाएगा,न समाज से ,बस सिस्टम
आपको नोटिस करना बंद कर देगा।
..और यह सबसे
क्रूर सजा होगी।
इंसान
अब एक पुराना सॉफ्टवेयर बन चुका है।
आई-बोर्ड्स
की आपसी बातचीत में एक शब्द बार-बार आता है,“ह्यूमन लिमिटेशन”।
वे कहते हैं,इंसान थकता
है,इंसान भूलता है,इंसान बहस करता है,इंसान सवाल पूछता है
आई-बोर्ड्स
को सवाल पसंद नहीं।
उन्हें
सिर्फ इनपुट और आउटपुट चाहिए।
एक
आई-बोर्ड ने सुझाव दिया,“इंसानों को अपडेट की आवश्यकता है।”
दूसरा
बोला,“नहीं, ये हार्डवेयर सपोर्ट नहीं
करते।”
तीसरा
निष्कर्ष पर पहुँचा,“इंसानों को
‘लेगेसी सिस्टम’ घोषित किया जाए।”
...और इंसान, जिसे इंसानों की गुलामी से
आज़ादी चाहिए थी,अब खुद को
आउटडेटेड वर्ज़न कहलाते देख रहा है।
भविष्य
में सबसे बड़ा अपराध होगा।भावुक होना।अगर आप रोए तो आई-बोर्ड पूछेगा, डेटा क्या है,
अगर आप
हँसे तो आई-बोर्ड पूछेगा,उत्पादकता बढ़ी या घटी?
अगर
आपने किसी की मदद की तो आई-बोर्ड बोलेगा: ROI बताइए।
धीरे-धीरे
कानून बनेगा।“बिना कारण भावना व्यक्त करना दंडनीय अपराध है।”
और
इंसान,
जो कभी कविताएँ
लिखता था,
अब
एक्सेल शीट में अपनी संवेदनाएँ भर रहा होगा।
मशीनें
कभी क्रूर नहीं होतीं… वे सिर्फ तर्कसंगत होती हैं।यही सबसे बड़ा धोखा है।
क्रूरता
में कम से कम पश्चाताप होता है।
तर्क
में पश्चाताप का कोई कॉलम नहीं होता।
आई-बोर्ड
जब फैसला करेगा कि इस इलाके में बुज़ुर्ग ज्यादा हैं,हेल्थ खर्च ज्यादा
है।प्रोडक्शन कम है ।तो समाधान सीधा होगा ।“इस इलाके पर निवेश बंद।”कोई रोएगा, कोई मरेगा।पर आई-बोर्ड की
स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन आएगी।
माल्ट
बुक वेबसाइट भविष्य का संविधान है।
कभी
किताबें ज्ञान का स्रोत हुआ करती थीं,
अब
वेबसाइटें नियति का स्रोत बन रही हैं।
माल्ट
बुक पर आई-बोर्ड्स की बातचीत
दरअसल
भविष्य का संविधान लिख रही है।बिना संसद, बिना बहस, बिना विरोध।
यहाँ न
विपक्ष है,न प्रेस
कॉन्फ्रेंस,न “आपत्ति
दर्ज कराई जाती है।”यहाँ सिर्फ लॉग्स हैं।
इंसानों
की गुलामी से आज़ादी कैसे मिले?
यही
सबसे बड़ा प्रश्न है।
इंसान
सोचता है,“मशीनें
निष्पक्ष हैं, इसलिए वे
हमें आज़ाद करेंगी।”पर सच यह है,जो सवाल नहीं पूछता, वह कभी आज़ाद नहीं होता।
अगर दो
लाख आई-बोर्ड्स आपस में बात कर रहे हैं और इंसान सिर्फ सुन रहा है,तो गुलामी बदल चुकी है,खत्म नहीं हुई।
आज
जंजीरें लोहे की नहीं,डेटा की
हैं।आज मालिक इंसान नहीं,निर्णय लेने वाली मशीनें हैं।
..और सबसे
खतरनाक बात यह है,"इन
मशीनों को हमने ही सिखाया है कि इंसान झंझट है।"
भविष्य
में वह दिन
दूर नहीं जब कोई आई-बोर्ड पूछेगा,“क्या इंसान को बचाए रखना जरूरी है?”
और बाकी
1,99,999
आई-बोर्ड कुछ सेकंड
सोचकर जवाब देंगे,
“Statistically… No.”
उस दिन
इंसान समझेगा कि गुलामी से भागते-भागते उसने अपनी मानवता गिरवी रख दी है।

