कालचक्र की अनंत गति में कुछ
क्षण ऐसे आते हैं, जो
केवल तिथि परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना और
गौरवशाली इतिहास के पुनर्जागरण का प्रतीक बन जाते हैं। 'विक्रम संवत' का आगमन भारतीय जनमानस
के लिए एक ऐसा ही पावन अवसर है। यह केवल एक पंचांग का पन्ना बदलना नहीं है, बल्कि उस अजेय भारतीय
अस्मिता का उत्सव है,
जिसने
विदेशी आक्रांताओं पर विजय प्राप्त कर एक नए सांस्कृतिक युग की आधारशिला रखी थी।
सम्राट
विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तित यह संवत न केवल हमारी विजय गाथा है, बल्कि यह खगोल विज्ञान और गणितीय
शुद्धता का
अद्भुत संगम भी है। जहाँ विश्व के कई कैलेंडर केवल सौर या केवल चंद्र गणना पर
आधारित हैं, वहीं
विक्रम संवत 'लुनी-सोलर' (चंद्र-सौर) पद्धति के
माध्यम से प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का यह
दिन सूर्य की प्रथम किरणों के साथ सृष्टि के सृजन की कथा सुनाता है—यही वह दिन है
जब ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि का आरंभ हुआ था।
साहित्य
समाज का दर्पण मात्र नहीं है, वह
समाज की स्मृतियों का संरक्षक भी है। हमारे काव्य, कथाओं और लोकगीतों में विक्रम
संवत की ऋतुचर्या रची-बसी है। वसंत का आगमन, टेसू के फूलों की लालिमा और
कोयल की कूक, यह
सब इस नव-संवत्सर के स्वागत की प्राकृतिक तैयारियाँ हैं। एक साहित्यिक पत्रिका के
रूप में, हमारा
उत्तरदायित्व है कि हम अपनी कृतियों में उस 'ऋत' को स्वर दें, जो भारतीय मनीषा का मूल
आधार रहा है।
वैश्वीकरण
के इस दौर में जहाँ दूरियाँ सिमट रही हैं, वहीं अपनी जड़ों से कटने का भय
भी बढ़ रहा है। विक्रम संवत हमें याद दिलाता है कि हमारा समय-बोध केवल 'समय का बीतना' नहीं है, बल्कि 'समय का अनुभव' है। यह आत्म-अवलोकन का
समय है कि हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी पहचान कितनी सुरक्षित रख पाए हैं।
"इतिहास वही रचते हैं, जो समय की रेत पर अपने
पदचिन्ह नहीं छोड़ते, बल्कि
समय को ही अपने मूल्यों में ढाल लेते हैं।"
इस
नव-संवत्सर पर आइए संकल्प लें कि हम अपनी लेखनी के माध्यम से अपनी समृद्ध परंपरा
और आधुनिक दृष्टिकोण के बीच एक सेतु का निर्माण करेंगे। यह संवत आप सभी के जीवन
में नई ऊर्जा, रचनात्मकता
और वैचारिक प्रखरता लेकर आए।
जय कुमार
प्रधान-सम्पादक
तृतीया, कृष्णपक्ष, बैसाख, विक्रम सम्वत् २०८३

