शब्द है जैसे नभ के तारे,
भाव है जैसे चाँद की चांदनी।
शब्दों से सजती है भाषा,
भावों से मिलती है रवानी।
शब्दों में छिपी होती
ध्वनि,
भावों में छिपा होता
प्राण।
दोनों मिलकर रच
देते है,
मन के मधुरतम गान।
शब्द बिना भाव अधूरे हैं,
जौसे वीणा बिना कोई तान।
भाव बिना शब्द सूने लगते,
जैसे बगिया बिना मुस्कान।
जब मन की गहराई
बोलती,
भाव उमड़ते सागर
जैसे।
शब्द बन जाते मोती,
झिलमिल करते अम्बर
जैसे।
कवि के अंतस में उठती,
भावों की कोमल लहरें।
शब्दों का रूप धारण करके,
कवितायें बन जाती पहरे।
कभी प्रेम की
मधुर कहानी,
कभी विरह की गहरी
पीड़ा।
शब्द और भाव
मिलकर लिखते,
जीवन की हर छोटी
क्रीड़ा।
शब्द दीप है राह दिखाने,
भाव उनकी उजली लौ।
दोनों से आलोकित होता,
जीवन का हर एक क्षण हो।
जहाँ भाव की
सच्ची धारा,
वहाँ शब्द स्वतः
ही आते।
मन के कोमल फूलों
जैसे,
कविता बन
मुस्काते।
शब्द और भाव का संगम ही,
साहित्य का सुन्दर सार।
इन्हीं से जन्मे गीत, गाथा,
इन्ही से जग का सिंगार।।
डॉ० पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश

