सुकून

अरुणिता
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मैं भीड़ के पीछे भागती रही,

भागती रही झूठ और फ़रेब के पीछे।

सबने मुझे शाबाशी दी,

रोका किसी ने भी नहीं।

मुझे दौलत मिली, शोहरत मिले...

पर, मिल न सकी सच्ची ख़ुशी।

सुकून पाने की चाह में,

मैं भटकती रही गली-गली।

 

फ़िर, मैंने अपनी राह बदल डाली...

मैंने सच को अपना हमराही चुना।

मुझे दुर्गम पथ मिले...

पथ में विघ्न हज़ार मिले।

मेरे साथ मेरा अंतर्मन खड़ा था,

आत्मविश्वास और धैर्य का सहारा था।

मुझे दिव्य अनुभूति मिले,

मुझे भीड़ नहीं, पर मेरा सुकून मिल गया।

© अनिता सिंह (शिक्षिका)

    देवघर, झारखंड।

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