सैन्य व्यथा

अरुणिता
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सरहद पर खड़ा जवान,

दिल की व्यथा नहीं कहता,

आतंकवाद ,अलगाववाद,

सरहद पर कड़ी नजर रखता,

भूख प्यास और नींद त्याग

है उनसे रोज उलझा रहता।

भारत  को रोज सुलाता है।


तड़क तड़कती गोली हो

या मशीनगन उगलते गोले,

राजस्थान रेत की गर्मी हो,

या सीयाचीन के पड़ते ओले,

दिन में ड्यूटी रात में पहरा,

भारत  को रोज सुलाता है।


गुमनाम जगह में सेवा दे कर,

जंगल पहाडों में आश्रय लेकर 

अरमानों की चिता जलाकर,

स्वाभिमान की रक्षा कर कर,

अपने आप शहादत दे कर,

भारत  को रोज सुलाता है।


वीरता की कसम खाकर,

सदा रहते अपनों से दूर,

जीत खातिर उसकी नींद

हर रात अधूरी रह जाती,

आंखों में नमी छुपाकर,

हिम्मत से बारुद चलकर,

भारत  को रोज सुलाता है।


हर गोली की आवाज़

उसे स्वाभिमानी बनाता,

वीरता की कसम खिलाता,

दूश्मनों की पदचाप सुनता,

शहादत के सपने दिखता,

फिर भी अपनों से दूर रह,

भारत  को रोज सुलाता है।


घर परिवार से दूर रहता,

हर पल है वो बिछड़ता,

मां मिट्टी की याद सताता,

यादें धड़कनों को तोड़ता,

एक दिन तिरंगे में लिपटा 

अपने घर लौटा और चैन से 

भारत  को रोज सुलाता है।



ललन प्रसाद सिंह 

वसंत कुंज नई दिल्ली-70 

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