माँ ….बस माँ
याद आता है मुझे …
जैसे ही ….!
गाड़ी को पार्किंग में लगाया
बिन डोर बेल बजाए……
माँ को दरवाज़े पर खड़ा पाया।
कैसे.. सुनाई दे जाती थी माँ को आहट !
वो…दिल को छू लेने वाली चाहत।
देख कर उसका चेहरा …
हो जाती थी दूर पल भर में सारी थकावट।
अपने सारे ग़म ….
पता नहीं…. कौन से ताले में रखती थी बंद !
देख कर हमारे कुम्हलाए चेहरे
ढूँढ लाती थी वो कहीं से भी मुस्कुराहट।
याद आता है मुझे ….
मेरा वो दफ़्तर से बचा कर लाया हुआ खाना।
आँखों में ग़ुस्सा ,हाथ से थप्पड़ दिखाना।
देखकर माँ का यह रूप बना देता था कोई बहाना।
और फिर……!
प्यार से माँ को गले लगाना।
लगता है जैसे गुज़र गया हो जमाना।
कर दिया माँ ने ख़ुद को मुझसे दूर
बना रहे मेरा आशियाना… शायद नहीं ..!
बचा रहे मेरा आशियाना ।
अब ना वो संस्कार ,ना इंतज़ार।
परिस्थितियों ने कर दिया दूर वो घर-द्वार।
कैसे मैं सब ये भूल जाऊँ …!
वो…माँ जैसी जन्नत कहाँ से लाऊँ !
नई दिल्ली
