अरावली: संत्रास

अरुणिता
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 रहा खड़ा जो सदियों से, मरुभूमि को रोके सीने पर,

आज कराह रहा प्रहरी , अपनों के ही धोखे पर।

दुनिया की यह अति प्राचीन, गौरवमयी गाथा थी,

वो अरावली आज खड़ी, विवश झुकाए माथा थी।

सीने को छलनी कर डाला, गहरे घाव खदानों के,

पहाड़ निगलते जाते हैं, लालच इन इंसानों के।

जहाँ गूँजती थी कभी, खग-मृग मधुकर की तान,

वहाँ शोर  मशीनों का अब, माँग रहा है जीवन की श्वास।

मिटा दिया अस्तित्व अगर, इन ऊँची-नीची ढालों का,

तो स्वागत करना सीखो तुम, बढ़ते हुए अकालों का।

रुक न सकेगा मरुस्थल फिर, दिल्ली की दहलीज़ों पर,

धूल उड़ेगी शहरों में, और जमेगी प्यास ज़बानो पर।

उठो! वक्त अभी भी है , थाम लो हाथ धरोहर की,

सिर्फ कागज़ों पर नहीं, धरा पर इसका नाम धरो ।

सौ मीटर की परिभाषा में, मत बांधों इन ऊँचाइयों को,

जीवन की संजीवनी दो, इन वीरान तन्हाइयों को।

एक दीवार खड़ी करनी है, पेड़ों की हरियाली की,

मिटानी है वो लकीर काली,जो हमने खुद ही खींची थी।

पत्थर नहींजीवन है ये, यह आने वाला कल है,

अरावली बचाना ही, हर संकट का हल है।

चलो शपथ ले हम सब, हर  पर्वत चोटी के संरक्षण की,

इस बूढ़े पर्वत के आँचल में, फिर हरियाली लहराएंगे ।

जैवविविधता अगर बचेगी, तब मानव  अस्तित्व सफ़ल होगा ,

  समदर्शी प्रकृति संरक्षण , हो परम कर्तव्य हमारा ।

                         डॉ० विवेक कुमार समदर्शी (प्रवक्ता)

                        जीआईसी अर्जुनपुर गढ़ा फतेहपुर 

 

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