जो किसी को भी
दिखाई न दे
ऐसे कच्चे धागों की
डोर में
बंधा प्रेम....
सदैव बांधकर रखता है-
एक-दूसरे से
ऐसा मेरा यकीं है,
यहाँ एक-दूसरे के
मध्य
एक अटूट बंधन है
जहां न ख्वाहिशें है
और न कोई आरजूयें...
यह उन सारी परिभाषाओं से
विलग है
जो सिर्फ दिखावे पर
विश्वास करता है।
यहाँ न किसी को बदलने
का प्रयत्न है
और न ही स्वयं को
किसी के अनुरूप
ढालने की पुरजोर कोशिश
यह भावनाओं की
निर्मल बहती
सुंदर शीतल-धारा है
जिसके छूने मात्र से ही
मुक्ति का आभास
होने लगता है।
हाँ......
किन्तु-
ये उलझाए रखती हैं
हर क्षण
उन एहसासों की
एक गहरी खोह में,
यहाँ दुनिया भर का
कोई आडंबर
महसूस नही होता,
यह परे है--
ईर्ष्या, द्वेष, पाखंड
और झूठ से
इन सबका कोई
अस्तित्व नहीं होता
अगर होता है
तो सिर्फ
मन का मन से
मिलन
खूबसूरत अनुभूति की
प्रतीति का
आदान-प्रदान
यहाँ पर है
भावनाओं का एक
आलिंगन
जो एक-दूसरे
के अंतर में
लिप्त रहता है....
दुनिया भर के फर्ज
निभाने के उपरांत भी
यह बसा हुआ है
रोम-रोम में
अनवरत बहती हुई
उन रूधिर कणिकाओं के
समतुल्य....!!!!
डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश

