ख्बाव सा तुम्हारी आंख में
बसने लगा हूं
फूल के सौंदर्य सा
मुस्कराने लगा हूं
तुम सुबह की पहली किरण सी
उतरी हो जब से मेरे आंगन में
मैं धूप में भी मुस्कराने लगा हूं।
देखता हूं खाली आकाश को जब भी
मैं बादल सा उमड़ने लगा हूं
चाहता हूं कि बरसूं तुम्हारे गेसुओं पर
मैं नटखट थोड़ा मुस्कराने लगा हूं
तुम देखती हो मुझे छिपकर
यह मैं जानता हूं
तुम्हारी चाहते पा
मन ही मन मुस्कराने लगा हूं।
मेरे चेहरे पर खिली रहती है ताजगी
अब मैं सबसे
हंस हंस कर मिलने लगा हूं।
दूर से ही देखकर तुम्हें एक नजर
जैसे मैं जन्नत में रहने लगा हूं
नहीं कोई कामना कि गलबहियां करुं
बस तुझे मुस्कराता देखना चाहता हूं
रहो हर वक्त सामने
यह भी नहीं चाहता
बस एक बार देख लूं चाहने लगा हूं
ऐसा ही खूबसूरत सपना देखने लगा हूं।
सुधा गोयल
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