जल कहता मैं
भ्रमणशील हूँ
कभी ठोस हिम कभी तरल
हूँ।
कभी वाष्प बन नील-
गगन में
बनता मेघ, सरल अविरल हूँ।।
पञ्च तत्व में सर्व
सुलभ मैं
भू से लेकर भू-तल तक
मैं।
रत्नाकर से आसमान तक
पर्वत- निर्झर- नदी
-ताल मैं।।
मानव तेरा संस्कार
मैं
आधार सभी तीर्थों का मैं।
क्यों मैला करता
मुझको है
साफ स्वच्छ सुन्दर
विचार मैं।।
सबके भीतर मैं ही
प्राणि !
मुझसे ही चलती है
नाड़ी।
अधिक कहूँ क्या जीवन
मैं ही
सृष्टि रची है मैंने
सारी।।
सागर -पर्वत- जंगल-
नदियाँ
परोक्ष रुप में
जुड़ती कड़ियाँ।
इन कड़ियों को पुनः
सँजोएँ
इनसे मिलती सबको
खुशियाँ।।
जल अमूल्य उपहार धरा
पर
इसका कभी अपव्यय मत
कर ।
आवश्यकता भर करना
दोहन
धन की भांति करो
व्यय मोहन।।
मोती प्रसाद साहू
अल्मोड़ा

