ग़ज़ल

अरुणिता
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1

बात   नहीं   हैरानी   की।

अक़्सर जीत जवानी  की।

 

सीधे  दिखने  वालों  की,

आदत   है  शैतानी  की।

 

जब तक बचपन ठहरा है,

फ़ितरत  है  नादानी  की। 

 

दिल का हर जज़्बा अपना,

ताकत  है  आसानी  की।

 

चिंता   जतला    देती  है,

सलवट इक  पेशानी  की।

 

रखती  हैं   थोथे  मतलब,

रस्में   सब    बेमानी  की।

2

जब कभी भी लगाम दूँगा तुझे।

चाल अपनी  तमाम दूँगा  तुझे।

 

मैं लड़ूँगा  यहाँ  अर्जुन की तरह,

जीत  का  एहतराम दूँगा तुझे।

 

देखकर दिल ख़ुशी से झूम उठे,

कोई  ऐसा  ईनाम   दूँगा  तुझे ।

 

जब मिलेगा कहीं सफ़र में मुझे,

पास  रुककर सलाम दूँगा तुझे ।

 

और पहले कभी मिला न सुना,

एक   ऐसा  पयाम  दूँगा  तुझे।


नवीन माथुर पंचोली

      अमझेरा जिला धार मप्र

            पिन 454441

          मो ,98993119724

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