एक झिझक सी मुझे
इजहार में आ जाती है।
हर वक़्त ये क़सक़ मेरे
प्यार में आ जाती है।।
सोच कर तुमको जब भी
कहता हूँ गज़ल।
खुश्बू भीनी सी मेरे
अशआर में आ जाती है।।
तू गुजरता है जब भी
मेरे ज़हन के दरीचों से।
अजब सी चमक मेरे
क़िरदार में आ जाती है।।
उम्मीद तुझे पाने की
जो ख्वाब में आ जाए।
हया एक रंग लेकर
रुखसार में आ जाती है।।
तेरी बोली जब मेरे
कानों को छुआ करती है।
थोड़ी तेजी सांसों की
रफ्तार में आ जाती है।।
रख के सोता हूँ तेरी
तस्वीर सिरहाने जब से।
नींद मुझको भी तब से
क़रार में आ जाती है।।
जो बात छुपा रखी है
दिल में तुमने 'अमित'।
वो बात भी कहाँ से
अखबार में आ जाती है।।
अमित मिश्रा
45 मानस नगर कृष्णा नगर लखनऊ.
