ग़ज़ल

अरुणिता
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एक झिझक सी मुझे इजहार में आ जाती है।

हर वक़्त ये क़सक़ मेरे प्यार में आ जाती है।।

 

सोच कर तुमको जब भी कहता हूँ गज़ल।

खुश्बू भीनी सी मेरे अशआर में आ जाती है।।

 

तू गुजरता है जब भी मेरे ज़हन के दरीचों से।

अजब सी चमक मेरे क़िरदार में आ जाती है।।

 

उम्मीद तुझे पाने की जो ख्वाब में आ जाए।

हया एक रंग लेकर रुखसार में आ जाती है।।

 

तेरी बोली जब मेरे कानों को छुआ करती है।

थोड़ी तेजी सांसों की रफ्तार में आ जाती है।।

 

रख के सोता हूँ तेरी तस्वीर सिरहाने जब से।

नींद मुझको भी तब से क़रार में आ जाती है।।

 

जो बात छुपा रखी है दिल में तुमने 'अमित'

वो बात भी कहाँ से अखबार में आ जाती है।।

 

 

अमित मिश्रा 

45 मानस नगर कृष्णा नगर लखनऊ.  

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