बेड़ियाँ

अरुणिता
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मन मचलता है उड़ने को लेकिन,

मुझसे पंखों को फड़फड़ाया नहीं जाता।

सजी हैं कुछ बेड़ियाँ मेरे पंखों पर
हीरे मोती से सजी, चमकदार और कीमती,
इसलिए पंखों का बोझ मुझसे उठाया नहीं जाता

सजाया था इन्हें मेरे जन्मदाता ने मेरे पंखों पर,
बड़े लाड़ से, और साथ ही कहा था मुझसे कि,
इन बेड़ियों को कभी हटाया नहीं जाता।

बन गई हूँ मैं एक सामान सजावट का,
सुंदर, महंगा और चमकदार पंखों वाला,
लेकिन मुझे किसी के सामने लाया नहीं जाता।

मैं तड़पती हूँ, सिसकती हूँ, बिलखती हूँ,
खोलने के लिए अपने कोमल, सफेद पंखों को
लेकिन ये सुनहरा बोझ मुझसे घटाया नहीं जाता।

 

कमलेश चौहान,

गुरुग्राम, हरियाणा  

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