ऐंठी-चपटी हुई सी
अँतड़यों वाली फगनू की नोनी ने
अपनी कमर से चिपकाए नानुक को,
चाँद को धीमी आँच में पकी फुली हुई,
रोटी कहकर चुप कराया-
'भगवान
करे ! कभी सुबह न हो।'
पूरनमासी रात के आँगन में
अल्हड़ जवानी से कसमसाता,
खिलखिलाता चाँद को देख
हिमांशी ने अरूण से कहा-
'प्रिये ! तू खड़ा रह। मैं तुझे देखती रहूँ।'
अपनी हमउम्र रात को
अलसाते-कुम्हलाते चाँद की ओर
सर उठा कर अघनी बाई ने,
कमर पर हाथ रखा और
ढूँढने लग गयी अपनी लउठी,
फिर बाँस की एक टोकरी लिये
निकल पड़ी- 'अबड़ टपकत होही महुआ हा'।
टीकेश्वर सिन्हा 'गब्दीवाला'
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)
सम्पर्क : 9753269282.

